निष्काम कर्म ही सच्ची आध्यात्मिकता है

निष्काम कर्म ही सच्ची आध्यात्मिकता है

हमें विरासत में जो भी मिला है उसे न केवल अक्षुण्ण रखना अनिवार्य है अपितु उसे आगे बढ़ाना भी ज़रूरी है और यही संस्कृति का पोषण है। यदि हम स्वतंत्रता की बात करें तो अनेक लोगों के बलिदान और त्याग से जो स्वतंत्रता मिली है उसकी, रक्षा करना और उसे चिरस्थायी और अधिक व्यापक बनाना ही वास्तविक सांस्कृतिक उत्थान है।
संस्कृति का पोषण वास्तव में हमारे लिए ज़रूरी भी है क्योंकि यह हमारे अस्तित्व और विकास से जुड़ा है। जहाँ तक मनुष्य के अस्तित्व और विकास का प्रश्न है, वह केवल सकारात्मकता से ही संबद्ध हो सकता है अत: वास्तविक संस्कृति में नकारात्मकता का कोई स्थान नहीं।
अमेरिका के कर्नल ऑल्कार्ट के साथ मिलकर थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना करने वाली रूसी महिला हेलन पेत्रोव्ना ब्लावात्स्की ने पूरी दुनियां की सैर की और इस घुमक्कड़ी में एक थैला हमेशा उनके साथ होता था। इस थैले में भरे होते थे रंग-बिरंगे, ख़ुशबूदार फूलों के बीज।
मेडम ब्लावात्स्की जहाँ कहीं से भी गुज़रतीं और खाली ज़मीन पातीं, वहीं वे फूलों के कुछ बीज मिट्टी में दबा देतीं। लोग उनसे पूछते कि जब ये बीज उगेंगे तथा पौधे बड़े होकर फूलों से लद जाएँगे, तब आप तो यहाँ नहीं होंगी। आप उन फूलों की ख़ुशबू और रंगों का आनंद नहीं ले पाएँगी तो फिर क्यों जगह-जगह फूलों के बीज बोती फिरती हैं?
मेडम ब्लावात्स्की जवाब देतीं, 'यदि मैं इन फूलों को देखकर आनन्दित नहीं हो पाऊँगी तो क्या? आप सब तो इन फूलों को देखकर अवश्य प्रसन्न होंगे। अन्य जो लोग उस समय यहाँ आएँगे, वे तो आनन्दित होंगे। फूल तो सब लोगों के लिए खिलेंगे और अपनी सुगंध बिखेरेंगे।
सच जो लोग दूसरों के जीवन में आनंद भर देने का प्रयास करते हैं, वही महान हैं। ऐसा निष्काम कर्म ही सच्ची आध्यात्मिकता है। ऐसे नेक कार्यों को आगे बढ़ाना ही वास्तविक संस्कृति है।
- सीताराम गुप्ता

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