गरीबी के दुष्चक्र में इतनी बड़ी आबादी क्यों?

गरीबी के दुष्चक्र में इतनी बड़ी आबादी क्यों?

क्या इन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए अथवा नहीं। यदि हाँ तो फिर।... प्रश्न अत्यधिक जटिल है। कौन, कब, और कैसे। आज हम आधुनिकता की बात कर रहे हैं, आधुनिक युग की रूप रेखा तैयार कर रहे हैं परंतु यह कैसे सफल एवं गतिमान होगा, इस पर चिंतन एवं मंथन गहनता से करने की आवश्यकता है, इसलिए कि पूरे समाज के दो छोर हैं जिसके पहले छोर पर विराजमान लोग हवाई जहाज से यात्रा ही नहीं करते, अपितु हवाई जहाज के स्वयं स्वामी भी होते हैं। समाज के दूसरे छोर पर खड़े लोग वह हैं जो आज भी जीवन की मूल भूत सुविधाओं से वंचित हैं, आधुनिकता तो उनसे बहुत दूर है। यह लोग जीवन के मुख्य आधार पर संघर्ष करने को मजबूर एवं बाध्य हैं। रोटी कपड़ा और मकान जैसी मूल भूत सुविधाओं के लिए संघर्ष। दूसरी ओर आधुनिक समाज की रूप रेखा है।
यह अत्यधिक जटिल प्रश्न है। एक छोर आकाश में उड़ता हुआ नजर आता तो दूसरा छोर धरती पर मजबूती से खड़े होने के लिए संघर्ष कर रहा है। क्या इतनी बड़ी आबादी को नजर अन्दाज करके हम आधुनिकता के क्षेत्र में सफल हो सकते हैं। क्या इतनी बड़ी आबादी को सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। क्या गरीबी के दुष्चक्र में फंसे लोगों को जीवन की मुख्य जीवन रेखा से जोडऩे के लिए हमारी नैतिकता नहीं है? क्या यह सभी लोग भूतकाल से लेकर वर्तमान तक पीढ़ी दर पीढ़ी इसी दल-दल में फँसे रहेंगे? और हम ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर बैठकर विकास की बातें कागज पर मात्र दो बड़ी लकीरें खींचकर ही करते रहेंगे?
क्या कागज पर बने हुए नियम एवं कानून धरातल पर सम्पूर्ण रूप से प्रतिशत उतर रहे हैं? क्या संसद भवन में बैठ करके मात्र आदेश दे देने और संविधान में मात्र संशोधन कर देने या मात्र एक लाइन और बढ़ाकर लिख देने से जिम्मेदारी पूर्ण हो जाती है। क्या इससे हमारी जिम्मेदारी का निर्वाह हो जाता है? उदाहरणता यदि ट्रेन का इंजन सर्व शक्तिमान है, तेज गति से दौडऩे में सक्षम है तो हमें उन कोचों का भी ध्यान रखना होगा जो उस इंजन के हिस्से हैं। यदि कोच की रूप रेखा इंजन की रूप रेखा से भिन्न हो और चल पाने की आशा की जाए तो यह कदापि सम्भव नहीं हो सकता। जिस मार्ग पर इंजन चलेगा उसी मार्ग पर कोच 'डिब्बा' भी चलेगा, इंजन का पहिया जितनी गति से अपनी धुरी के चारों ओर चक्कर लगाएगा, उतनी ही तीव्रता से उसके पीछे-पीछे डिब्बा भी गतिमान होगा।... इंजन की गति से गति मिलाकर डिब्बा भी तभी चल पाएगा जब उसके भी पग एवं चरण दृढ़ एवं शक्तिशाली होंगें। जब तक उसके पहिए शक्तिशाली एवं प्रबल नहीं होंगे, वह इंजन की गति से गति मिलाकर चलने में कैसे सक्षम होगा, कल्पना कीजिए, गहनता से सोचिए।
यदि ट्रेन को अविराम गति देनी है तो उसके जमीनी आधार को मजबूत एवं प्रबल बनाना होगा। चरण एवं पग रूपी पहिए से लेकर उसकी रूप रेखा को निश्चित शशक्त बनाना होगा। बोगी एंव डिब्बे को शक्तिशाली बनाना पड़ेगा अन्यथा इंजन अलग दिशा में चला जाएगा और डिब्बा मार्ग में ही रह जाएगा और मार्ग बाधित हो जाएगा और सारी गति धरी की धरी रह जाएगी। मात्र इंजन को शक्ति प्रदान करने से कार्य सफल हो जाए, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह एक कडुआ सत्य है।
आज शायद यही हो रहा है। हम दिशाहीन शैली एवं दिशाहीन मार्ग पर कार्य कर रहे हैं जिसके परिणाम आज यह दिखाई दे रहे हैं। एक लम्बी लाइन खिंची हुई है। एक तरफ धनाढ्î एवं सम्पन्न व्यक्तियों की टोली एवं दूसरी तरफ गरीबों,दुर्बलों, मजलूमों की भयंकर भीड़।... मात्र कुछ लोगों की संपन्नता को आधार मानकर यदि हम देश की रूप रेखा को खींचना आरम्भ करते हैं तो यह देश एवं देश की जनता के प्रति शायद न्याय नहीं होगा।... इसका प्रतिरूप एवं प्रतिमान उसी ट्रेन की भाँति होगा जो मात्र इंजन की प्रबलता पर ध्यान केंन्द्रित करके किया गया।... इंजन ने अभी गति पकडऩे का प्रयास ही किया था कि सारी बोगियों के पहिए इंजन से अलग हो गए। इंजन अलग दिशा में चला गया एवं बोगियाँ अलग दिशा में।
आज यही स्थित देश के चतुर्मुखी विकास के कार्यों को प्रस्तुत करती हुई दिखाई दे रही है। आम जन-मानस को योजना के आधार पर कितना लाभ हुआ। कितना उत्थान हुआ उसकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थित स्पष्ट रूप से प्रमाण दे रही है। जीवन की मूल-भूत सुविधाएँ जैसे रोटी, कपड़ा, मकान के लिए आज के इस आधुनिक युग में अधिकतर लोग संघर्षरत हैं। अपने आप में बहुत कुछ बंद जुबानों एवं कंठस्थों से कह रहा है।
परन्तु एक प्रश्न बहुत ही जटिल है कि जो व्यक्ति जनता की सेवा करने के लिए आता है और जनता के बीच लोकतंत्र का सहारा लेकर के चुनाव लड़ता है, जनता उसे अपना प्रतिनिधि स्वीकार कर लेती है, उसे विजयी बनाकर विधान सभा अथवा लोकसभा भेज देती है अपने क्षेत्र का भविष्य एवं भाग्य बदलने के लिए परंतु परिणाम ठीक विपरीत दिशा में दिखाई देते हैं। क्षेत्र का विकास तो नहीं हो पाता परंतुु जिसपर जनता ने भरोसा किया था, विजयी बनाकर विधानसभा अथवा लोकसभा भेजा था, वह अपना विकास करना आरम्भ कर देता है। आजादी से लेकर आजतक की तस्वीर लगभग कमोबेश यही दर्शाती है। अधिकतर लोग सत्ता की छ्त्र छाया में फर्श से लेकर के अर्श तक की यात्रा कर रहे हैं। यह कैसा नियम है, यह कैसा कानून है।
आय के संसाधन नहीं हैं परंतु धन असीमित है जिसकी सीमा ही नही है। यह धन कहाँ से आया, इसका स्रोत क्या है, कौन पूछेगा। किसकी हिम्मत है जो आवाज उठा सके। यदि किसी ने साहस भी किया तो जेल की हवा खानी पड़ती है। फर्जी मुकदमों में उसे फँसा करके जेल भेज दिया जाता है, इसलिए कि सत्ता है अथवा सत्ता के समीप है तथा सत्ता का संरक्षण प्राप्त है परन्तु गरीब व्यक्ति दिन-प्रति दिन समस्याओं से और ग्रसित होता चला जाता है। भोजन से लेकर वस्त्र तक एवं वस्त्र से लेकर चिकित्सा एवं उपचार तक संघर्ष करता रहता है और जीवन इन्हीं चक्रों में सिमटकर समाप्त हो जाता है।
इसके लिए कौन सोचेगा। इसके लिए कौन जिम्मेदार है। क्या आजादी की परिभाषा सचमुच यही है। क्या आजादी का अर्थ यही है। क्या आजादी इसे ही कहते हैं। समझना पड़ेगा। महापुरुषों ने फाँसी के फंदों को गले लगाया, अपने प्राणों की कुर्बनी दे दी, क्या इसीलिए?
अब एक मुद्दा और अत्यंत गम्भीर है। कम समय में सत्ता को प्राप्त करने की नई रूप रेखा। समाज को बाँटकर भेदभाव फैलाकर शांति को छिन्न भिन्न करके अपने मतलब को साध लिया जाए, गरीबों को और दलदल में फँसा दिया जाए। मूलभूत समस्याओं से मुक्ति दिलाने के लिए कार्य न करके मुद्दों से ध्यान भटकाने का कार्य किया जाना उचित है अथवा अनुचित। इसका निर्णय कौन करेगा। क्या इससे देश की गरीबी समाप्त हो जाएगी। क्या इससे भूखे को भोजन, वस्त्र विहीनों को वस्त्र एवं मरीजों को चिकित्सा तथा बालक एवं बालिकाओं को शिक्षा और युवाओं को रोजगार प्राप्त हो जाएगा जिससे हम विश्व के सामने आर्थिक एवं शिक्षित तथा स्वस्थ रूप से मजबूती से खड़े हो सकें। शायद इसकी अधिक आवश्यकता है और यह सत्य है। यदि हमें विश्व के सामने अपने आपको मजबूत एवं आत्म निर्भर के रूप में प्रस्तुत करना है, एक सक्षम एवं सशक्त भारत बनाना है तो आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में कार्य करना पड़ेगा। हमारे देश के अन्दर प्रतिभावान व्यक्तियों की कमी नहीं है। हम विश्व की रूप रेखा को बदलने की सम्पूर्ण रूप से क्षमता रखते हैं। हमारे देश के बच्चे एवं युवा रीढ़ की हड्डी हैं। बालिकाओं के अंदर गजब की प्रतिभा है। बस सही समय पर सही दिशा में कदम रखने की आवश्यकता है।
- एम.एच. बाबू

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