नौनिहाल स्कूलों में न हों हलाल

नौनिहाल स्कूलों में न हों हलाल

केंद्रीय विद्यालय संगठन के द्वारा स्कूली बस्ते का बोझ कम करने के लिए किया गया प्रथम प्रयास एवं प्रस्ताव सराहनीय है बशर्ते यह भी यशपाल कमेटी द्वारा दी गई अनुशंसा की भांति धूल खाती पड़ा न रह जाए। आज का स्कूली विद्यार्थी एवं देश का भावी कर्णधार नाना प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक मुसीबतों से परेशान है एवं हलाल हो रहा है।
शिक्षा के मामले में भारत बड़ा विचित्र देश है। यहां की शिक्षा प्रणाली में वैविधता है। एकरूपता व संभावना का अभाव है। स्कूल दर स्कूल पढ़ाई में अंतर है, कहीं अफसरों, इंजीनियरों, डाक्टरों की पौध पढ़ रही है तो कहीं चपरासी व आम नागरिक बनने बच्चे बढ़ रहे हैं। पढ़े-लिखे धनपति परिवारों के बच्चों को मनमाफिक शिक्षा मिल सकती है पर संवैधानिक अधिकार के बाद भी निर्धनों के बच्चों को सरकार अनिवार्य घोषित शिक्षा भी नहीं मिल सकती। शिक्षा के क्षेत्र में देश में समस्याएं अपरंपार हैं।
न इसका कोई ओर छोर है और न निराकरण करने के कारगर उपाय या प्रयास है। निजी स्कूलों में इसीलिए मनमानी फीस ली जाती है और हर सुविधा शुल्क लेकर दी जाती है जबकि शासकीय स्कूलों में अरबों-खर्च के बाद भी किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं है। शासकीय स्कूलों में हर प्रकार की समस्या विद्यमान है। इस सबमें पिसता देश का भावी नागरिक है।
शिक्षा के क्षेत्र में आए दिन तरह-तरह के प्रयोग होते हैं किंतु किसी भी प्रयोग को मुकम्मल मुकाम नहीं मिल पाता। योजनाएं बनती हैं पर अमली जामे के अभाव में हकीकत के धरातल पर शून्य रहते हैं। स्कूल की समस्या हो, पाठयक्रम का बोझ हो, बस्ते का भार हो अथवा परीक्षा का तनाव या प्रतिस्पर्धा के चलते दबाव हो पर सबके बीच में हलाल होता है स्कूली बच्चा। निजी स्कूल के बच्चों को मां-बाप का ऊंचा लक्ष्य पूरा करने हेतु दबाव से सतत जूझना पड़ता है जबकि शासकीय स्कूलों के बच्चों को विषम परिस्थिति में किसी भी तरह पढ़ाई करनी पड़ती है।
स्थिति परिस्थिति जैसी भी हो पर सभी स्कूली बच्चों के कंधों पर बस्ते का भारी बोझ अवश्य नजर आता है। जितनी ऊंची पढ़ाई, उतना भारी बस्ता रहता है। तनाव व दबाव उतना ही रहता है। सख्त अनुशासन और होमवर्क पूरा न करने पर या पूछ गए प्रश्न का उत्तर न देने पर कठोर सजा, अमानवीय यातना हर जगह है। यशपाल कमेटी ने बरसों पहले दिए अपने निर्णय में अनेकों सुधारात्मक अनुशंसाएं की थीं जो आज धूल खाती कहीं पड़ी हैं।
हाल ही केंद्रीय विद्यालय समूह के द्वारा स्कूली बस्ते का बोझ बच्चों पर से कम करने सराहनीय पहल सामने आया है। बस्ते का बोझ कम करने के समय लगे हाथ यशपाल कमेटी की रिपोर्ट पर से धूल साफ कर दी जाए एवं उस पर नजर डाल दी जाए तो और बेहतर होगा।
संविधान को दृष्टिगत रख यदि देश भर में सबके लिए एक समान शिक्षा व्यवस्था लागू की जाए तभी समानता का भाव आएगा नहीं तो असमानता की जो खाई बचपन से बनती जा रही है, उसे किसी भी तरह पार पाना मुश्किल होगा। यह खाई और गहराती जाएगी।
- नीलिमा द्विवेदी

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