परम त्याग की महामूर्ति शिक्षा के अवधूूत पूज्य स्वामी कल्याण देव जी की 15वीं पुण्य तिथि पर शत-शत नमन

परम त्याग की महामूर्ति शिक्षा के अवधूूत पूज्य स्वामी कल्याण देव जी की 15वीं पुण्य तिथि पर शत-शत नमन

स्वामी कल्याण देव महाराज का जन्म वर्ष 1876 मे जिला बागपत के गांव कोताना मे उनकी ननिहाल मे हुआ था। उन्होनें वर्ष 1900 मे मुनी की रेती ऋषिकेश मे गुरूदेव स्वामी पूर्णानन्द जी से सन्यास की दीक्षा ली। अपने संयासी जीवन मे स्वामी जी ने 300 शिक्षण संस्थाओं का निर्माण कराया। साथ ही कृषि केन्द्रों, वृ़द्ध आश्रमों, चिकित्सालय, आदि का निर्माण कराकर समाज मे अपनी उत्कृष्ट छाप छोडी। स्वामी जी गांधीवादी सिद्धान्त अर्थात अहिंसा के पुजारी थे। वे किसी गरीब की आंखों मे आंसू नही देख पाते और जितना उनसे बनता उसकी मदद करते। गरीबों की बदहाली, पीडा व पूंजीपतियों द्वारा उनका शोषण स्वामी जी को बडा ही पीडा देता था। इन सब पीडा से गरीबों को निजात दिलाने का स्वामी जी ने बीडा उठाया। और उन्होंने कहा कि एक मात्र शिक्षा ही गरीबों की पीडा हर सकती है। यह इसका स्थाई समाधान है। इस लिए स्वामी जी ने अपने जीवन का आधार बिन्दु व अपने जीवन का उद्देश्य शिक्षा को बना लिया। और पूरी तत्परता से स्कूल, कॉलेजों की स्थापना के लिए अपनी कमर कस ली। स्वामी जी कहा करते थे कि यदि गरीब शिक्षित होगा, जागरूक होगा और अपने पैरो पर खडा होगा तो उसे कभी किसी के पास मदद मांगने नहीं जाना पडेगा, उसका कोई शोषण नही कर पायेगा।

स्वामी जी अपने जीवन काल में सदा गरीब व जरूरतमंदों की मदद किया करते थे। वे कहा करते थे कि अपनी जरूरत कम करों और जरूरतमंदों की हर संभव मदद करों। परोपकार व मानव सेवा को ही वे परमात्मा की सच्ची ईबादत मानते थे। वे कहते थे कि सभी में उसी का नूर है। वे अपने सारे जीवन काल में कभी रिक्शा में नहीं बैठे शहर से बाहर जाने पर वे सदा पैदल ही सफर किया करते थे। वे कहते थे कि रिक्शा के माध्यम से आदमी आदमी को खीचता है। यह पाप है। वे पांच घरों में रोटी की भिक्षा लेते उसमे से एक रोटी गाय को, एक रोटी कुत्ते को और एक रोटी छत पर परिंदों के लिए डालते इस बीच यदि कोई भूखा आ जाता तो वे उसे अपनी हिस्से की राटी भी दे देते और जल पीकर हरि नाम का रसपान कर सो जातेेे। स्वामी जी की इसी त्यागी प्रवृति का परिणाम था कि बडे-बडे गददी पर बैठे खादी के नेता और खाकी के अफसरान सदा उनके चरणों मे नतमस्तक रहते। उनका उद्देश्य बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी प्रदान करना था। इस लिए स्वामी जी ने शिक्षा के साथ-साथ बच्चों के संस्कार पर भी बडा बल दिया। वे कहा करते थे कि बिना संस्कार के शिक्षा कभी सार्थक नही हो सकती। जब तक बच्चा अपने अध्यापकों का सम्मान नहीं करेगा, अपने गुरू के प्रति सम्र्पण नहीं करेगा, उसकी शिक्षा कभी सार्थक नहीं हो सकती। पढाने वाले गुरू के प्रति आदर सत्कार कर बच्चा एकलव्य की भाति अपने क्षेत्र में निपुणता हासिल कर लेता है। 20 मार्च 1982 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने स्वामी जी को सम्मानार्थ पद्मश्री से सम्मानित किया। स्वामी जी को समाज कल्याण का जो उददेश्य रहा उसमें कभी किसी से प्रतिष्ठा प्राप्त करना नहीं रहा, उन्हें जो पदमश्री से सम्मानित किया गया उसकी भी स्वामी जी को कभी कोई लालसा नही रही।

कुछ बुद्धिजीवी बताते है, कि स्वामी जी ने अपना शरीर छोडने से एक वर्ष पूर्व ही अपने परम शिष्य ओमानन्द जी महाराज को अपनी समाधि का स्थान बता दिया था। अपनी मृत्यु से दस मिनट पहले स्वामी जी ने वटवृक्ष की परिक्रमा की ईच्छा अपने शिष्यों को ईशारा कर जाहिर की। स्वामी जी को गोद मे उठाकर ऊपर वटवृक्ष के समीप ले जाया गया। वहा स्वामी जी ने भगवत चिंतन करते हुए वटवृक्ष की परिक्रमा करते हुए अपने प्राण त्याग दिये। कहा जाता है कि व्यक्ति के मुख से अंतिम समय राम नाम भगवत चिंतन नहीं निकलता। लाखों में बहुत ही बिरला संत होते है जो अपने अंतिम क्षणों मे भगवत चिंतन करते है। ऐसा ही कुछ बापू के बारे में कहा जाता है कि जब इनको गोली मारी गई तो इनके मुख से अन्त में हे राम शब्द निकला। स्वामी जी का जीवन एक विस्तृत महाकाव्य है, जिसके प्रत्येक पृष्ठ पर त्याग, सरलता, स्नेह, दया, क्षमा व अनन्त शिक्षा दान की प्रेरणा मिलती है। स्वामी जी ने अपने संयम, परोपकार, आध्यात्मिक साधन व शिक्षा दान के आधार बिन्दु के कारण स्वामी जी सामान्य जीवन की 100 वर्ष की अवधि को पार कर आगे निकल गयें। स्वामी जी की एक खास बात यह भी थी, कि वे एक बार जिस से मिल लेतेे उसे जल्दी से भूलते नहीं। स्वामी जी की एक खूबी यह भी थी कि कोई उनके द्वार से कभी खाली हाथ निराश नहीं लौटा जो भी मदद उन से बन पाती वे करते। वे सच्चाई के परम पुजारी थे। वे कहा करते थे कि सब में रब बसता है। लोक कल्याण ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। उन्होंने गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा भी प्रदान कराई वे कहा करते थे राम नाम भजना तब सार्थक होता है जब राम के गुणों को अपने अन्दर धारण कर राम की भॉति लोक कल्याण में अपना जीवन अर्पित किया जाये। वास्तव में हमें स्वामी जी के जीवन से प्रेरणा लेकर उनके दिखाये मार्ग पर चलना चाहिए तभी हम उन्हें उनकी पुण्य तिथि पर नमन कर सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते है।

स्वामी जी का व्यक्तित्व बहुमुखी व बहुआयामी रहा। स्वामी जी ख्याति, प्रशंसा, कीर्ति और पद की महत्वकांक्षा से यथा सम्भव दूर रहकर व्यक्तिगत सुख -सुविधा को तिलांजलि देकर लोभ, मोह और स्वार्थ के सहज आकर्षण को त्याग कर अति सरल और अत्यन्त सात्विक जीवन व्यतीत करते। भौतिक सुख-समृ़िद्ध के इस युग में उनकी वेश-भूषा और सादगी उनकी अंतिम सांस तक गांधीवादी ही रही। वे समाज से जो भी लेते उसे कभी अपने लिए नहीं रखते वे उसे गरीब व असहायों को बांट दिया करते। सादा जीवन उच्च विचार का भाव रखते हुए सदा लोक कल्याण की भावना करते रहना ही उनकी महत्ता व लोकप्रियता का परम गोपनीय रहस्य है। आज के आधुनिक परिपेक्ष में स्वामी जी जैसे चरित्र का साधु लाखों में कोई एक बिरला ही मिलता है। इसी गांधीवादी सिद्धांत को स्वामी जी अपने जीवन का हथियार बनाया और जितनी हो सके लोक कल्याण की मंगल कामना करते रहे। प्रो० रामपाल सिंह (भूतपूर्व प्राचार्य गांधी पॅालीटैक्निक कालेज) ने बताया कि स्वामी जी के जब तक हाथ-पाव सही काम करते रहे उन्होंने कभी किसी से अपना काम नहीं कराया, वे गांधी जी की भांति अपना कार्य स्वंय ही करते थे। वे कहा करते थे कि इस शरीर को आरामतलबी का आदि मत बनाओ, अपनी सुख सुविधा के लिए दूसरों को कष्ट मत दो। शीत काल में वे जल्दी उठते और अपनी कुटिया के आगे झाडू लगाते जो भी सूखी लकडी, सूखे पत्ते मिलते उनका ढेर बनाकर उसमें आग लगाकर अपना पानी गरम करते, जबिक स्वामी जी के कई भगत उनकी सेवा करने के लिए हर समय तत्पर रहते थे। वे भ्रष्टचाार के काफी खिलाफ थे। समाज में फैले भ्रष्ट तंत्र पर स्वामी जी को बहुत पीडा होती थी।

जब हृदय का संबंध गुरू से बन जाता है, तब आत्मा का संबंध गुरू से हो जाता है। गुरू और शिष्य का संबंध ही परम सत्य का संबंध होता है। जो प्राणी को भवसागर से पार ले जाता है। बाकी के सारे संबंध चाहे कितने गहरे क्यों न हो वे केवल मन व शरीर के होते हैै। हमारे आस्तित्व के तीन तल है- शरीर का तल, मन का तल, सबसे सूक्ष्म आत्मा का तल। किन्तु गुरू का संबंध हृदय से होता हुआ आत्मा में प्रवेश करता है, जो मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होता। गुरू चाहता है कि उसके शिष्य को उसकी सारी आध्यात्मिक सम्पदा मिल जाये। उसके लिए आवश्यकता है कि शिष्य का गुरू के प्रति प्रेम व समर्पण शिष्य को चाहिए कि वह बिल्ली का बच्चा बन जाये। जिस प्रकार बिल्ली अपने बच्चों को जहा चाहे अपने मुहं में पकडकर बिठा देती है बच्चा कुछ नहीं करता बस पूर्ण सम्पर्ण बिल्ली को कर देता है। वहीं दूसरी और बंदर का बच्चा अपना सम्पर्ण नहीं करता उसे बंदर को पकडना पडता है। जहा बंदर के बच्चे का हाथ छूटा व गिरा। स्वामी जी ने अपने जीवन काल में सुखदेव मंदिर में साधु-संतों व आम जन के लिए एक अन्न क्षेत्र की स्थापना कराई, भागवत कथा के लिए सुचारू बडे हवादार कक्षों का निर्माण कराया, ताकि लोग भगवत रस पान कर सके। आज स्वामी जी के परम प्रिय शिष्य स्वामी ओमानन्द जी गुरू परम्परा को कायम रख उसी प्रकार शुकदेव मंदिर में प्रसाद का वितरण कराते है और दूर-दूर से आये भक्तो के लिए भागवत कथा की, रहन-सहन की सम्पूर्ण वयवस्था कराते है। आज स्वामी जी के सपनों को साकार करने का बेडा उठाया उनके प्रिय शिष्य स्वामी ओमानन्द जी महाराज ने वे भी स्वामी जी की भांति ही लोक कल्याण में लगे रहते हैं। आज वे स्वामी जी के दिखाये कल्याण मार्ग पर चलकर परोपकार, ज्ञान और शिक्षा क्षेत्र में स्वामी कल्याण देव जी महाराज की भांति ही अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे है। गुरू परम्परा को शिष्य द्वारा आगे चलाना ही सच्चे शिष्य की पहचान होती है। आज स्वामी ओमानन्द जी जिस तत्परता से अपने गुरू के दिखाये कल्याण मार्ग पर चलकर अपने गुरू के सपनो को साकार कर रहे है, तो गुरू कृपा उन पर हमेशा बनी ही रहेगी। स्वामी ओमानन्द जी की अपने गुरू के प्रति समपर्ण व प्रेम इसी बात से झलकता है कि वे आज उनका रहन सहन, खान-पहन सब कुछ स्वामी जी की भाति ही है। जो भी कोई साधू संत ओमानन्द जी के पास अपनी समस्या को लेकर जाते वे उसका तत्काल निराकरण करते हैं। स्वामी जी की भॉति ही उनका आज भी सादा जीवन उच्च विचार और सब पर परोपकार की भावना है, लगता है कि स्वामी ओमानन्द के भेष में स्वामी कल्याण देव जी ही विराजमान है। सादा जीवन उच्च विचार का भाव रखते हुए सदा लोक कल्याण की भावना करते रहना ही उनकी महत्ता व लोकप्रियता का परम गोपनीय रहस्य है। स्वामी जी की पुण्य तिथि पर ऐसे परम त्यागी बिरला संत को कोटी-कोटी नमन।

-अवतोष शर्मा (स्वतंत्र पत्रकार)

Share it
Top