व्यंग्य: कास्टिंग काउच..नो कमेंट्स

व्यंग्य: कास्टिंग काउच..नो कमेंट्स

परिपक्व व्यक्तित्व का तकाजा होता है कि विवादास्पद मुद्दों पर मुस्कुराते हुये नो कमेंट्स की प्रतिक्रि या मात्र दी जाये। यदि फिर भी कोई परिचित षोडषी पत्रकार जबरन माइक ही मुंह में ठूंसने लगे तो आप कह सकते हैं 'प्लीज स्टिक टु एजेण्डा', या फिर नो इण्डिविजुएल आर पर्सनल कमेंटस।
कास्टिंग काउच का मुद्दा भी पिछले दिनों कुछ ऐसा ही बखेड़ा ले कर उभरा कि कई लोग नो कमेंट्स की मुद्रा में आ गये। यह और बात है कि इससे कई गुमशुदा होते चेहरों को लाइम लाइट में आने का मौका मिल गया। ऐसे लोग ट्वीट करके अपनी प्रतिक्रि यायें देने में जुट गये। कुछ टी आर पी के प्रति संवेदनशील चैनल्स को बढिय़ा मसाला मिल गया हाट डिस्कशन के लिये। जो एक्सपर्ट पैनल उन्होंने बैठाला, उसमें कास्टिंग गुरू, सदा समाज का हित चाहने वाले समाजसेवी संस्थाओं के विशेषज्ञ, सायकोलाजी के प्रोफेसर्स बिना मेहनत क्विक सफलता के रास्ते ढ़ूंढऩे वाली भुक्तभोगियों ने सरगर्म चर्चाये कीं। उनकी प्रतिक्रि या थोड़ी डिप्लोमेटिक और साहित्यिक रही। उन्होंने सीधे ही कास्टिंग काउच को संस्कृति से जोड़ दिया। उनका कहना था कि कास्टिंग काउच का हिन्दी शब्द बतलाइये ? हम सिर खुजलाते हुये बगलें झांकने लगे, हमें हिन्दी की कमजोर शब्द सामर्थ्य पर थोड़ा गुस्सा भी आया। उन्होंने भांप लिया, मुस्कुराते हुये बोले, दरअसल कास्टिंग काउच हमारी संस्कृति का हिस्सा ही नहीं है, इसलिये हमारी भाषा में इसके लिये कोई शब्द ही नहीं है। यह पाश्चात्य अपसंस्कृति है। पल भर पहले मुझे हिन्दी पर गुस्सा आ रहा था, उनके उत्तर से तत्काल प्रभाव से हिन्दी और अपनी संस्कृति पर गर्व होने लगा। बाद में मुझे थोड़ा सा गर्व उनके उत्तर देने की कला पर भी हुआ। सवाल का बेहतरीन तरीके से जवाब दिया जाये तो चुनाव जीते जा सकते हैं। चुनावी दंगल में एक सभा से सवाल होते हैं, दूसरी सभा में किसी और शहर में उसका जवाब दिया जाता है। कर्नाटक चुनावों में तो उन्होंने बहुत बड़प्पन का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि मैं देश के अपने प्रधानमंत्री पर कोई कमेंट नहीं करूंगा। नो कमेंट की उनकी यह शैली चुनाव में बराबरी का मुकाबला तो नहीं हुई। चुनाव आयोग को इसका संज्ञान लेना चाहिये। आखिर जब एक तरफ प्रधानमंत्री हों तो दूसरा क्या करे ?

इसी तरह सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के बीच भी भला कहां बराबरी का चुनावी मुकाबला हो पाता है? लोकतांत्रिक प्रणाली में सुधार का मेरा सुझाव विचारार्थ प्रस्तुत है। आदर्श आचार संहिता लगते ही सरकारें भंग कर दी जानी चाहिये। वैसे भी सरकार नेता नहीं, अफसर ही चलाते दिखते हैं। राजनीति में जो पंच सरपंच महिला आरक्षण के चलते अपनी पत्नियों को चुनाव लड़वा देते हैं, वे सरपंच पति बनकर राजनीति करने के प्रयत्न करते हैं। दरअसल मेरी ऐसे पतियों के साथ पूरी संवेदना है। मैं उन्हें पुरस्कृत करने का सुझाव मन की बात में देना चाहता हूं क्योंकि ऐसे सरपंच पति अपनी पत्नियों को कास्टिंग काउच से बचाने का ही यत्न कर रहे होते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अयोग्यता होते हुये भी कुछ पा लेने की अभिलाषा ही कास्टिंग काउच की जननी है। अत: शार्ट कट से कुछ पाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की लालसा पर विजय मिल जाये योग्यता अर्जित करके ही उपलब्धि पाने के प्रयत्न हों तो कास्टिंग काउच, सम्मान जनक सोफे में तब्दील हो सकते हैं।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव

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