राष्ट्ररंग: जिन्ना की तस्वीर और तदबीर दोनों डरावनी हैं

राष्ट्ररंग: जिन्ना की तस्वीर और तदबीर दोनों डरावनी हैं

भारत विभाजन के जिम्मेवार और पाकिस्तान के पैरोकार दिवंगत राजनेता मोहम्मद अली जिन्ना एक बार फिर चर्चा में हैं। दरअसल, उनकी तस्वीर और तदबीर से जुड़ीं स्मृतियां इतनी भयावह हैं कि भारत के बहुसंख्यक लोग अब भी उनकी बात छिड़ते ही खौफजदा हो जाते हैं। गत दिनों अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रसंघ कार्यालय में उनकी टंगी तस्वीर पर एक बीजेपी सांसद ने सवाल क्या उठाया, चारों तरफ बवाल मच गया। इस मसले पर खुद बीजेपी भी दो फाड़ हो गई। जब उसके अंदर से समर्थन और विरोध दोनों तरह के स्वर सुनाई पड़े तो औरों की बात छोड़ ही दी जाए तो अच्छा है।
अटकलें हैं कि जब जब जिन्ना की चर्चा भारतीय राजनीति में चलती है तो किसी न किसी को उसकी भारी कीमत भी अदा करनी पड़ती है। एक दफे अपनी पाक यात्र के दौरान वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जब कायदे आजम जिन्ना की तारीफ की तो उन्हें न केवल संघ का कोप झेलना पड़ा बल्कि अपनी राजनैतिक हैसियत भी गंवानी पड़ी। इसलिए अब यदि बीजेपी नेता और योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने खुलकर जिन्ना की तारीफ करने का जोखिम लिया है तो आगे उनको कौन सी कीमत चुकानी पड़ेगी, यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है क्योंकि उनकी सियासी हैसियत आडवाणी के मुकाबले कुछ भी नहीं है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारत में कहीं भी टंगी जिन्ना की तस्वीर और तदबीर से ही नहीं बल्कि उनके जैसी खतरनाक प्रवृत्ति रखने वालों से भी किसी को डर लगना चाहिए क्योंकि उनके विषैले सांप्रदायिक विचारों से संक्र मित पाकिस्तान भी जब खुद को अखंड नहीं रख सका और बंगलादेश का निर्माण हो गया तो फिर लकीर के फकीर बने लोगों की क्या औकात? यही वजह है कि जिन्ना पाकिस्तान के और उनके स्वघोषित मानस पुत्रों के तो महापुरुष हो सकते हैं लेकिन एक अरब तैंतीस करोड़ भारतीयों के आदर्श कतई नहीं।
हमलोग यह नहीं भुला सकते कि जिन्ना की रुग्ण सोच और जाहिल जिद्द की वजह से ही हिंदुस्तान का न केवल विभाजन हुआ बल्कि रोंगटे खड़े कर देने वाले सांप्रदायिक दंगे भी उस पार हुए थे और इस पार भी। यह भुलाया नहीं जा सकता कि आजादी के आंदोलन के दौरान जिन्ना ने व्यक्तिगत स्वार्थवश जिस सांप्रदायिक मानसिकता को बढ़ावा दिया उससे भारत का भारी अहित हुआ जिससे आजतक भी मुक्ति नहीं मिली है और न ही भविष्य में मिलने के आसार दिखाई दे रहे हैं।
यही वजह है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष मशकूर अहमद उस्मानी की इस दलील से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि जिन्ना को जब वर्ष 1938 में छात्रसंघ की आजीवन सदस्यता दी गई थी, तब भारत-पाक एक थे, इसलिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास को संजोकर रखा जाता है। मशकूर को यह नहीं भूलना चाहिए कि भले ही इतिहास मनुष्य को बुद्धिमान बनाता है लेकिन काल प्रवाह में वह खुद को दोहराता भी है और 1947 में हुए विभाजन और फिर भड़के सांप्रदायिक दंगों के इतिहास को शायद वो भी दुहराना नहीं चाहेंगे एक भारतीय मुसलमान होने के नाते क्योंकि भारत से विस्थापित होकर पाकिस्तान गए मुसलमानों की दुर्दशा से शायद वो भी नावाकिफ नहीं होंगे।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि अब वहां से जिन्ना की तस्वीर हटा लेनी चाहिए। यह बात सिर्फ मैं नहीं बल्कि करोड़ों लोग कह रहे हैं। सोशल मीडिया हो या परम्परागत मीडिया, सभी जगह ऐसी ही सार्थक बहस चल रही है। खुद इस विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति जनरल जमीरुद्दीन शाह ने भी दो टूक कहा है कि यूनियन ने अपने हाल में काफी तस्वीरें लगा रखी हैं जिनमें जिन्ना भी एक हैं और उनकी फोटो लगाना अब शोभा नहीं देता लिहाजा जिन्ना की फोटो को अब हटा देना चाहिए। सिर्फ वही नहीं, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जनसम्पर्क विभाग के मेंबर इंचार्ज प्रो शाफे किदवई ने भी स्पष्ट कर दिया है कि जिन्ना की तस्वीर से विश्वविद्यालय का आधिकारिक तौर पर कुछ भी लेना देना नहीं है भले ही 7० साल पहले उन्हें आजीवन सदस्यता क्यों न दी गई थी।
सच कहा जाए तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अपरिवर्तित नाम स्वतंत्र भारत के कथित धर्मनिरपेक्ष प्रशासन के निष्पक्ष चरित्र के बारे में बहुत कुछ चुगली करते हैं लेकिन कथित राष्ट्रवादी सरकारों के नुमाइंदे भी जब बेतुके तर्क-वितर्क पर उतर आएं तो किसी को भी हैरत हो सकती है। यदि ये दोनों सुप्रसिद्ध शैक्षणिक प्रतिष्ठान किसी भी तरह के सांप्रदायिक विचारों के वाहक बनें तो उन्हें वहीं रोक देना चाहिए।
इसलिए सिर्फ इतनी ही दलील देना चाहूंगा कि हिन्दू राष्ट्र बनने के कगार पर पहुंचकर अपने ही नीति-नियंताओं की कथित उदारता से फिसल चुके भारत देश को अब जिन्ना की छवि से ही नहीं, बल्कि उनकी और उनके जैसों की हर उस प्रवृत्ति से डर लगता है जिसके पैरोकारों की अब भी भारत में कोई कमी नहीं है क्योंकि बहुमत के लोकतंत्र की यह भी एक बड़ी लाचारी है।
आखिर आप इस ऐतिहासिक तथ्य को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं कि जिन्ना के कुतर्कों के भंवर में फंसकर देश में जो सांप्रदायिक दंगे हुए, उससे न जाने कितनी ही बार इंसानियत लहूलुहान हुई और मानवता शर्मसार। क्योंकि देश विभाजन के बाद सिर्फ भूगोल बदला, निर्लज्ज सांप्रदायिक इतिहास तो आज भी रह रह कर खुद को दोहरा जाता है जिससे अमनपसंद लोगों की टीस बढ़ जाती है। हद तो यह कि इन्हें काबू में करने के लिए जिस प्रशासनिक नैतिकता की जरूरत तब महसूस की जाती थी, उसकी किल्लत आज भी महसूस हो रही है।
- कमलेश पांडे

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