बाल कथा: मूर्ख की परेशानी

बाल कथा: मूर्ख की परेशानी

एक गांव में एक बहुत मूर्ख व्यक्ति रहता था।
एक बार वह बीमार पड़ा तो अपना इलाज कराने एक दूर के कस्बे में पहुंचा। वैद्यराज ने उसे उचित औषधि देकर केवल Óखिचड़ी ही खाने की सलाह दी।
वह पक्का भुलक्कड़ भी था। जब वह अपने गांव वापस जा रहा था, इस डर के मारे कि कहीं वह खिचड़ी का नाम न भूल जाये अत: जोर-जोर से खिचड़ी-खिचड़ी रटता जा रहा था पर रटते रटते वह खिचड़ी के बदले 'खा-चिड़ीÓ, खा-चिड़ी कहने लगा।
पास ही के एक खेत में किसान अपनी फसल की रक्षा चिडिय़ों से करने के लिये उन्हें उड़ा रहा था। जब उसने उस व्यक्ति को 'खा-चिड़ी' अर्थात् चिडिय़ा दाना खाओ कहते सुना तो उसे अपने पास बुलाया और दो चांटे रसीद करते हुए कहा-
बोलो, 'उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी' अर्थात् चिडिय़ा उड़ जाओ। मूर्ख हट्टे-कट्टे किसान का भला क्या बिगाड़ सकता था। उसने सोचा मेरी ही भूल है अत वह अपने गाल को सहलाता हुआ तथा-'उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी रटता हुआ आगे बढऩे लगा।
वह 'उड़ चिड़ी, उड़ चिडड़ी' कहता जा ही रहा था कि पास की झाडिय़ों में छिपे एक बहेलिये ने उसे पकड़ लिया और कहा, 'मैं चिडिय़ों को पकडऩे के लिये घण्टे भर से बैठा हूंÓ और तुम 'चिडिय़ा उड़ जाओÓ, चिडिय़ा उड़ जाओ कहकर उन्हें भगा रहे हो 'खबरदार जो आगे एक बार भी ऐसा कहा तो मार-मारकर बुरा हाल कर दूंगा।Ó
मूर्ख घबरा गया उसने पूछा-'मुझे क्या कहना चाहिये, वही बता दो भाई।Ó
बहेलिया ने कहा, बोलो-
'आते जाओ, फंसते जाओ।'
मूर्ख यही वाक्य रटते रटते आगे बढ़ा ही था कि रास्ते में उसे 5 चोर मिले। चोरों ने उसे 'आते जाओ, फंसते जाओÓ कहते सुना तो उसे पकड़कर 1० चांटें रसीद किये और कहा-'ऐसा दिन किसी का न आये', कहते आगे बढ़ जाओ।
'ऐसा दिन किसी का न आवे' रटते रटते मूर्ख अगले गांव पहुंचा। उस गांव के सेठ जी के लड़के की बारात गांव जाने की तैयारी में थी। जब लोगों ने मूर्ख को 'ऐसा दिन किसी का न आवे' बार बार कहते सुना तो उन्होंने उसे पकड़कर अच्छी खासी पिटाई की और कहा कि ऐसा दिन सबका आवे कहा।
'ऐसा दिन सबका आवे, रटते रटते मूर्ख आगे बढऩे लगा। रास्ते में एक गांव पड़ा। वहां के मुखिया का एकमात्र लड़का चल बसा था। लोग मृतक को श्मशान ले जा रहे थे।' जब उन्होंने ऐसा दिन सबका आवे कहते कहते मूर्ख को जाते देखा तो उन्होंने उसे सलाह दी कि
ऐसा दिन किसी का न आवे रटो।
मूर्ख आखिर मूर्ख ही था। वह ऐसा दिन किसी का न आवे रटते रटते अगले गांव पहुंचा।
उस गांव में पटेल के यहां कई वर्षों के बाद पहली संतान हुयी थी पर जब उन्होंने उस व्यक्ति को 'ऐसा दिन किसी का न आवे कहते सुना तो ग्रामीण ने उसे पकड़ लिया और अनेकों चांटे लगाते हुये कहा, बोलो-
'एक बार सबके यहां हो।
मूर्ख 'क बार सबके यहां हो रटते रटते आगे बढ़ा। अगले गांव में एक बड़े किसान के यहां बड़ा डाका पड़ गया था। अत: लोग बहुत दु:खी थे। वे किसान को सांत्वना देने थे। जब उन्होंने मूर्ख को बार-बार ऐसा सबके यहां एक बार हो कहते सुना तो उन्होंने उसे घेर लिया और खूब पीटा, तथा कहा-
'अगर फिर तुमने ये शब्द अपने मुंह से निकाले तो हम तुम्हारी इतनी पिटाई करेंगे कि तेरी खिचड़ी बना देंगे।
-ललितनारायण उपाध्याय

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