नारी अपनी सफाई कब, क्यों और कैसे करें

नारी अपनी सफाई कब, क्यों और कैसे करें

नारी के लिए शारीरिक सफाई का विशेष महत्त्व है। प्राय: भोजन बनाने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य नारी के द्वारा ही संपन्न होते हैं। बच्चे की प्रारंभिक शिक्षिका भी वही होती है। मां को साफ-सुथरा देखकर उसके बच्चे में सफाई के प्रति प्रेम पैदा होना स्वाभाविक है। बच्चे का स्वास्थ्य भी मां के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।
देखा जाता है कि कार्यों में उलझी हुई बाल-बच्चों वाली अधिकांश नारियां अपनी और अपने बच्चे की सफाई पर बहुत कम ध्यान देती हैं। परिणाम यह होता है कि उनके बच्चे विभिन्न रोगों से परेशान होते हैं। फोड़े-फुन्सी, दाद, खाज, खुजली, अतिसार, ज्वर आदि रोग गंदगी से ही उत्पन्न होते हैं।
शरीर की सफाई एवं वस्त्रों की सफाई तो सभी स्त्रियां करती हैं और करना आवश्यक भी है लेकिन बहुत सी नारियां अपनी शारीरिक सफाई बहुत जल्दबाजी में करती हैं। कारण यह है कि उनके पास या तो स्नानागार नहीं होता या पर्याप्त समय नहीं होता। खुले स्थानों में स्नान करने वाली नारियां अपने सभी वस्त्रों को पहने हुए स्नान करती हैं जिससे वे अपने सभी अंगों को मल-मलकर साफ नहीं कर पाती। कुछ तो एक या दो लोटे पानी शरीर पर डाल देती हैं, बस स्नान हो जाता है।
शरीर की सफाई के लिए प्रतिदिन विधिवत स्नान जरूरी है। गर्मियों में प्रतिदिन दो बार स्नान किया जा सकता है। हमारी शरीर की त्वचा में असंख्य छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिनसे पसीने के साथ अनेक वज्र्य पदार्थ निकलकर त्वचा को गन्दा करते रहते हैं। यदि उनकी सफाई न की जाए तो त्वचा के छिद्र बन्द हो जाएंगे जिससे विषैले पदार्थ शरीर से नहीं निकल पाएंगे और शरीर के अन्दर रहकर हानि पहुंचाएंगे। छिद्रों के बन्द हो जाने से उनसे होकर आक्सीजन भी शरीर में प्रवेश नहीं कर पाती है।
उन अंगों की सफाई की ओर नारियों का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है जिन पर उनको सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। स्तन की सफाई उस समय जब कि बच्चे दुग्धपान करते हैं, परमावश्यक होती है। स्तन के ऊपर का वस्त्र दूध से भीगने के कारण अक्सर गंदा हो जाता है और स्तन को भी गंदा कर देता है। अत: स्त्रियां दोनों की सफाई पर ध्यान दें नहीं तो गंदगी से उत्पन्न हानिकारक जीवाणु दूध के साथ बच्चे के पेट में पहुंचकर हानि पहुंचा सकते हैं, साथ ही स्तन में खुजली, आदि रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
जननेन्द्रिय की सफाई भी प्रतिदिन करें। कुछ विषैले पदार्थ इससे निकलकर इस इन्द्रिय की दीवारों पर जमते रहते हैं। यदि उनकी सफाई रोज नहीं की जाती है तो वे सूजाक जैसे भयानक रोगों को जन्म दे सकते हैं।
आर्तवकाल में स्त्रियां प्रथम तीन दिनों तक स्नान न करें। इस अवधि में स्नान करने से मासिक स्राव पर बुरा प्रभाव पड़ता है। चौथे दिन मासिक स्राव बंद होने पर वे स्नान करें और अपनी जननेन्द्रिय को अच्छी तरफ साफ करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्रों को ही धारण करें। गर्भावस्था में गर्भिणी के गुप्त मार्ग से बहुधा सफेद रंग का पदार्थ निकलता है किंतु यदि जननेन्द्रिय को खूब साफ रखा जाए तो यह कष्ट नहीं होगा।
प्रसव के बाद प्रसूता की जननेन्द्रिय की सफाई प्रशिक्षित दाई या अनुभवी परिचारिका द्वारा की जाए। यदि भग के बाल हों तो उन्हें रेजर से काटकर साफ कर देना चाहिए। इसके बाद रोगाणुनाशक घोलों से भगोष्ठों एवं मलद्वार धोकर पोंछ देना चाहिए। जननेन्द्रिय की सफाई के पूर्व प्रसूता को गर्म जल से स्नान कर लेना चाहिए। प्रसूता की सफाई में लापरवाही उसके जीवन के लिए कष्टदायक हो सकती है।
शिशु-पोषण का समय नारी के लिए सफाई की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि नवजात शिशु के लिए शौचालय एवं मूत्रालय मां की गोद या बिस्तर ही होता है। ऐसी स्थिति में भी कुशल माताएं शिशु में अच्छी आदतें डालकर सफाई का काम आसान बना लेती हैं।
स्वयं शौच के बाद, बच्चों को शौच कराने के बाद और उनकी नाक की सफाई के बाद नारियां अपने हाथ साबुन से अवश्य साफ कर लें। हाथ की अंगुलियों को नाक, कान या बालों में न डाला करें। हाथ के नाखूनों को साफ एवं छोटे रखें। भोजन बनाना शुरू करने के पहले की सफाई अनिवार्य है।
हाथ, पैर एवं चेहरे की सफाई एवं सजावट का नारियों में विशेष शौक होता है। उनमें केश को बढ़ाने तथा विभिन्न प्रकार से संवारने का भी शौक होता है। इसके बावजूद उनके केश में खुजली एवं जूं पडऩे की शिकायत होती है, अत: वे अपने केशों को प्रतिदिन साफ करें और उसमें कंघी भी करें।
आंख, दांत, नाक, कान, गला, बगलें और जांघें भी खासतौर से साफ रखनी चाहिए। आंखों को सुबह शाम स्वच्छ जल से धोया करें। प्रात: उठने पर और हर भोजन के बाद दांतों को अच्छी तरफ साफ करें। दांतों को किसी नुकीली चीज, सुई आदि से न कुरेदें।
कान में मैल जमी हो तो उसमें कड़ुवा तेल डाल दें जिससे वह अपने आप निकल जाएगी। यदि वह नहीं निकलती तो उसे डॉक्टर से ही निकलवायें। उसमें लकड़ी या अन्य कोई चीज न डालें। यदि कान में कोई बाहरी वस्तु मक्खी आदि चली जाए तो चिकित्सक के पास जाकर सफाई करवा लें।
कान में पानी चले जाने पर उसे रूई के फाहे से सुखा लेना चाहिए। स्नान करने के बाद कान, बगल, जांघों आदि को साफ तौलिए से पोंछ लेना चाहिए। इससे इन अंगों में चिपकी हुई सूक्ष्म मैल साफ हो जाती है और त्वचा में रक्त संचार भी सुचारू रूप से होने लगता है।
इस प्रकार शारीरिक सफाई केवल अच्छा स्वास्थ्य ही प्रदान नहीं करती अपितु सौन्दर्य में वृद्धि भी करती है। सफाई से आत्मसंतोष एवं अद्भुत सुख की प्राप्ति होती है। यह व्यक्ति का सम्मान भी बढ़ाती है। इससे नारी, परिवार में सभी लोगों के प्रेम का पात्र हो जाती है। अत: नारी और सफाई दोनों जीवनदायिनी हैं।
- राम भजन यादव

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