आवश्यक है आपके बच्चे का सही मार्गदर्शन

आवश्यक है आपके बच्चे का सही मार्गदर्शन

वैज्ञानिक युग में जहां किशोरों को बचपन से अनेक सुविधाएं मिल रही हैं और विभिन्न सुविधाओं के कारण उनका हुनर उभरकर सामने आ रहा है किंतु इसके साथ ही इन सुविधाओं के कुप्रभाव भी सामने आ रहे हैं। देखा गया है कि बच्चों का अपने परिवार और समाज से एक प्रकार का कटाव, अलगाव हो गया है। आजकल एक ही अवधि में बच्चे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की दूसरी शिक्षा-प्रशिक्षण भी प्राप्त कर रहे हैं जैसे कम्यूटर प्रशिक्षण, अनेक व्यापार संचालन संबंधी प्रशिक्षण आदि। वे स्कूल से घर आने के पश्चात टी. वी. आदि के द्वारा अपना मनोरंजन भी करते हैं। आजकल मल्टी चैनल के दौर में बच्चों की पसंद के ढेरों प्रोग्राम आते रहते हैं अतएव मनोरंजन के नाम पर घंटों टी. वी. के के सामने बैठना उनकी आदत हो गई है।
अधिकांश परिवारों मे नौकरीपेशा माता-पिता अपनी नौकरी तथा सामाजिक दायरों में व्यस्त रहने के कारण अपना समय अपने बच्चों के साथ कम व्यतीत कर पाते हैं, फलत: स्कूल से आने के पश्चात उन्हें अपने माता पिता का संरक्षण एवं निर्देशन नहीं मिल पाता है।
इसके कारण देखा गया है कि स्कूल के एक तिहाई विद्यार्थी गंदी आदतों के शिकार हो जाते हैं, जैसे मद्यपान, धूम्रपान, चरस, अश्लील फिल्मों की ओर रूचि आदि। परिवार से अलगाव के कारण बच्चे केवल किताबी दुनियां तक सीमित हो जाते हैं और उनका पूर्ण तथा बौद्धिक विकास नहीं हो पाता है।
माता पिता के साथ कम समय व्यतीत करने के कारण बच्चों में आपसी प्रेम, संवेदनशीलता, लगाव आदि का चारित्रिक विकास नहीं हो पाता। इसी कारण भविष्य में वे बच्चे एक अव्यवस्थित एवं असंतुलित जीवन व्यतीत करने लगते हैं। परिणामस्वरूप तलाक, पुनर्विवाह जैसे मसलों से उन्हें उलझना पड़ता है।
जिस परिवार में माता पिता का अपने बच्चों के साथ समुचित लगाव व आपसी संबंध अच्छा रहता है। उनके बच्चों को विभिन्न प्रकार की मुसीबतों का सामना नहीं करना पड़ता। वे एक संतुलित एवं व्यवस्थित जीवन यापन करते हैं।
कुछ सावधानियों को ध्यान में रख कर आप अपने बच्चों के न केवल चरित्र का विकास कर सकते हैं अपितु एक सफल जीवन करने में उसकी सहायता कर सकते हैं।
कुछ सुझाव
- परिवार की ओर से बच्चों को उनके पालन-पोषण में पूरा-पूरा प्रोत्साहन दें ताकि उनके मध्य पारस्परिक सदभावना व आदर्श प्रेमपूर्ण रिश्ता कायम हो सके।
- बच्चों के समक्ष अपने किशोरावस्था के आदर्श व रूचियां आदि रखें जिनसे वे शिक्षा प्राप्त कर सकें।
- यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही अपने बच्चों की उचित देख-रेख करें तथा उनके समक्ष व्यवहार का समुचित मापदंड रखें।
- अपने बच्चों को नैतिक, चारित्रिक विकास तथा उच्च महत्त्वाकाक्षों से अवगत करवाएं।
- कोई विवाद होने पर सकारात्मक और विवेकपूर्ण तरीकों की मदद लें।
- रूबी

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