प्रभु की कृपा और दया के पात्र

प्रभु की कृपा और दया के पात्र

'कृपा' और 'दया' दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें हम एक ही अर्थ वाला मानकर एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग करते हैं किंतु कृपा और दया में थोड़ा अंतर है। दया सर्वसाधारण जनों में समान रूप से की जाती है जबकि कृपा अपने अपनों पर ही की जाती है। सामान्य रूप से सब पर द्रवित होने वाली वृत्ति दया और स्नेह से किसी के प्रति करूणा से लबालब हो जाना कृपा कहलाती हैं।
अपने भक्तों पर भगवान की कृपा और दवा के भेद को जानने और समझने के लिये महाराजा अम्बरीश और दुर्वासा के दृष्टांत से अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है।
भगवान की दया तो अम्बरीश और दुर्वासा दोनों ही भक्तों पर समान रूप से थी लेकिन विशेष गुणों के कारण अपने भक्त अम्बरीश पर प्रभु की विशेष कृपा थी। महाराज अम्बरीश ने अपना सर्वस्व भगवान को अर्पण कर रखा था। उनका तो तन, मन, प्राण और समस्त कर्म तथा पुरूषार्थ भगवान को अर्पित थे।
एक ओर तो नम्र शांत और प्रभु को अपना सब कुछ समर्पण करने वाले राजा अम्बरीश और दूसरी ओर उसके बिलकुल विपरीत शाप की पोटली सदा सिर पर लादे हुए अपने को ही सर्व समझने वाले अहंकारी महर्षि दुर्वासा।
एक समय महाराज अम्बरीश व्रत के पारण हेतु ज्यों ही भोजन करने के लिये बैठे, वैसे ही वहां महर्षि दुर्वासा आ धमके। नियमानुसार राजा पहले अतिथि को भोजन कराये बिना भला अन्न कैसे ग्रहण कर सकते थे? उन्होंने महर्षि को सादर निमंत्रण देते हुए भोजन करने का निवेदन किया लेकिन दुर्वासा तो दुर्वासा ही ठहरे।
निमंत्रण तो सहर्ष स्वीकार कर लिया किंतु मध्यान्ह संध्यादि नित्य कर्मों के लिये यमुना तट पर चले गये। राजा को महर्षि की प्रतीक्षा करते करते बड़ा समय बीत गया परन्तु वे नहीं लौटे। तिथि का लोप न हो, इसलिये राजा ने ब्राह्मणों की आज्ञा से तुलसी और गंगाजल पीकर व्रत का पारण कर लिया। अपने से पहले राजा द्वारा पारण किये जाने पर दुर्वासा आकर अत्यंत कुपित हो उठे और राजा को मारने के लिये उन्होंने कृत्या उत्पन्न की।
राजा अम्बरीश ने तो अपने समस्त पुरूषार्थ प्रभु को अर्पण कर रखे थे इसलिये वे तनिक भी भयभीत नहीं हुए और ज्यों के त्यों निर्भय खड़े रहे। जो भक्त उस प्रभु को अपना सब कुछ अर्पण करके उसके आश्रित हो जाते हैं फिर उन्हें भला किस बात का भय?
यदि महाराज अम्बरीश चाहते तो शाप देने में तो वे भी समर्थ थे किंतु उन्होंने तो शाप-वरदान सभी कुछ उस परमपिता परमेश्वर को समर्पित कर दिया था। यदि अपना बचाव वे अपने आप ही करते तो भगवान का सुदर्शन चक्र उनकी रक्षार्थ कैसे आता?
जब राजा निश्चिंत, अडिग, शांत भगवान के भरोसे खड़े हुए थे- तभी अचानक सुदर्शन चक्र ने आकर कृत्या को भस्म कर दिया और फिर दुर्वासा मुनि की ओर चल पड़ा। दुर्वासा प्राण संकट में देखकर इधर उधर भागने लगे, इन्द्रलोक, ब्रह्मलोक और शिवलोक सभी जगह रक्षार्थ दौड़े लेकिन कहीं भी शरण न पाकर अन्त: उन्हें विष्णु भगवान की शरण में ही जाना पड़ा। वहां पहुंचकर वे प्रभु के सामने गिड़गिड़ाये- हे भगवन् ? सुदर्शन चक्र से मेरी रक्षा कीजिए।
भगवान दुर्वासा की दशा देखकर तनिक मुस्कुराए और कहा- हे महर्षि। मेरे बस में आपकी सहायता कर सकना नहीं है। मैं तो सदा ही अपने भक्तों के आधीन हूं। यह मेरे एक अनन्य भक्त का अभियोग है, अत: आपकी रक्षा करना मेरे सामथ्र्य के बाहर है।
दुर्वासा ऋषि भगवान विष्णु से बड़े करूणामय शब्दों में बोले- भगवान् ऐसा न कहें। आप तो सर्वसमर्थ हैं। मैं भी तो आपका भक्त हूं।
विष्णु भगवान बोले- निस्संदेह आप भी मेरे भक्त हैं किन्तु इस समय आप केवल मेरी दया के पात्र हैं और राजा अम्बरीश मेरी कृपा के।
दुर्वासा ने दुखी स्वर में कहा-भगवान्, ऐसा कहकर आप इस तरह मेरा परित्याग कर रहे हैं और अम्बरीश को अपना रहे हैं? आपकी दृष्टि में तो मुझमें और उसमें कोई अंतर अथवा भेद होना ही नहीं चाहिये।
विष्णु भगवान बोले- हे महर्षि, मेरी दया आप दोनों पर समान रूप से है किंतु निज जन होने के कारण अम्बरीश पर मेरी विशेष कृपा भी है। मैं उन्हें किसी भी हालत में असुरक्षित नहीं छोड़ सकता। बताऊं क्यों? क्योंकि अपने परम भक्तों का मैं एकमात्र आश्रय हूं। साधु प्रकृति और मुझे समर्पित अपने भक्तों को मैं कभी अकेला छोड़ ही नहीं सकता। मैं तो हर समय उनके साथ रहता हूं। हे ऋषिवर, आप तनिक स्वयं ही विचार कीजिये कि जो भक्त अपनी स्त्री, घर, पुत्र, परिवार, गुरूजन, प्राण, धन यहां तक कि इहलोक और परलोक को छोड़कर केवल मेरी ही शरण में रहता हो, उसका साथ मैं कैसे छोड़ सकता हूं।
दुर्वासा मुनि ने राजा अम्बरीश की तुलना में अपने आप को बहुत ही नीचे पाया। अहंकार के बादल छट गये। गिड़गिड़ाते स्वर में वे भगवान से बोले- हे दयानिधे, यदि मैं अनन्य भगवद् भक्तों के सदृश कृपा का पात्र नहीं हूं तो आपकी दया का पात्र तो हूं ही। कृपा करके मेरे ऊपर दया ही कीजिये।
दुर्वासा का निवेदन सुनकर भगवान ने कहा- हां, दया करके मैं तुम्हें उपाय बताता हूं। आप महाराज अम्बरीश की शरण में चले जाइये। बस, आपका कष्ट दूर हो जायेगा।
महर्षि दुर्वासा ने भगवान के परामर्श का पालन किया। महाराज अम्बरीश की शरण में पहुंच कर वे कष्ट से मुक्ति पा गये। यही उस प्रभु की दया और कृपा है।
वैष्णव शास्त्रों में भगवान से संबंध जोडऩा परम आवश्यक माना गया है। दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर, इन चार भावों से भगवान के साथ संबंध स्थापित किया जा सकता है।
- परशुराम संबल

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