पर्यटन/धर्मस्थल: जहां मिलती है मांगे मुराद

पर्यटन/धर्मस्थल: जहां मिलती है मांगे मुराद

ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण से मशहूर बिहार राज्य के औरंगाबाद जिला अंतर्गत हसपुरा प्रखंड का अमझर शरीफ खानकाह सरकारी और प्रशानिक उपेक्षा का शिकार है। इस स्थल को अगर विकसित किया जाता तो पर्यटन के क्षेत्र में इस जगह का अलग मुकाम होता।
ऐतिहासिक महत्त्व हसनपुरा जो वर्तमान में हसपुरा है, यहां के निवासी शेर अली हिन्दी जब मदीना शरीफ पहुंचे और हजरत मोहम्मद साहब के दरगाह मोबारक के पास खड़े होकर आरजू विनती और दरखास्त की कि मेरे इलाके में अपने खानदान का कोई फर्द हमलोगों के इलाके में इस्लाम धर्म के प्रचार प्रसार करने के लिये भेजा जाय। इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मो पैगम्बर साहब ने उनको ख्वाब में बताया कि आप बगदाद चले जायें और सैयदना स्मसुदिन दुर्वेश कादरी जो उस वक्त गोंस पाक के खानकाह के सजादा नशीं हैं, उनके बड़े लड़के सैयदना मोहम्मद कादरी को साथ में लेकर जाओ। मो हजरत साहब ने सैयदना मो कादरी के पिता को और सैयदना मो कादरी को ख्वाब में कहा कि तुम अपने बेटे को हिंदुस्तान भेजो और बेटे को कहा कि तुम हिंदुस्तान जाओ।
वहां से सैयदना मो कादरी शेर अली हिन्द के साथ हिंदुस्तान आये। वे लोग रास्ते में कई जगह होते हुए जैसे अफगान,मुलतान होते हुए सुरहुरपुर यू पी आये और कुछ दिनों तक रहे और उन्होंने वहां शादी भी कर ली। कुछ समय उपरांत वहां से मगध की धरती नरहना पहुंचे जो अभी हसपुरा प्रखंड में टाल और नरसंद के नाम से जाना जाता है, वहां आकर रहने लगे। वहां जब इनको इबादत में खलल पैदा होने लगी तो ये अमजा जंगल में आकर रहने लगे और इबादत करने लगे। इनके वालिद ने एक सूखी लकड़ी दी थी कि यह लकड़ी को तुम जहां गाड़ दोगे और हरा हो जायेगा, तुम उस जगह इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करना। उस लकड़ी से अमजा जंगल हरा हो गया। यही अमजा जंगल अमझर शरीफ से मशहूर हो गया।
वह लकड़ी जो हरी हो गई थी उसने सैयदना दादा के मजार के बगल में एक वृक्ष का रूप ले लिया है। इस वृक्ष की विशेषता है कि इसकी लकड़ी को जहां भी रखा जाता है, वहां सांप का बसेरा नहीं होता। यहां आने वाले श्रद्धालु इसकी लकड़ी को बड़े ही जतन और श्रद्धा के साथ अपने पास रखते हैं। सैयदना दादा के पिता ने इन्हें यादगारी और तबरुकात के रूप में कुछ चीजें दी थी वो आज भी यहां मौजूद हैं जैसे मो पैगम्बर साहब के दाढ़ी के बाल, मो हजरत साहब के दामाद हजरत अली का कमरबन्द,मो हजरत साहब की बेटी का ओढऩे बैठने का सुजनी,मो साहब के दोनों नातियां का गुलबन्द, हजरत मो साहब के खानदान के एक बुजुर्ग जिनका नाम सैयद मोहिउदिन अब्दुल कादिर गौसपक की टोपी, जां नमाज तस्वी, ओढऩे बैठने की सुजनी और उनके हाथ का लिखा हुए तीस पृष्ठ में पूरा हस्तलिखित कुरानशरीफ जिसे बिना चश्मे के आसानी से पढ़ा जा सके।ये सब चीजें हुजूर मिलत सैयद सरफूदीन नैयर कादरी जो सजादा नसी खानकाह कादरिया मोहम्मदिया के सजादा नसी हैं उनके पास हैं जिसका ज्यारत रबिअवुवल की पहली तारीख को आनेवाले जायरिन को कराया जाता है। इस अवसर पर जियारत में पूरे हिंदुस्तान से लोग आते है। खासकर उड़ीसा, बंगाल, झारखण्ड, यू पी, गुजरात, महाराष्ट्र सहित बिहार के लगभग सभी जिलों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यह उर्स मेले में तब्दील हो जाता है। लोग अपने दिलो में सँजोये सपने को साकार होना देखना चाहते है। सैयदना दादा के मजार पर मन्नतें मांगने वाले लोगो की दिली तमन्ना पूरी होती है।
ऐसे तो साल भर लोग प्रतिदिन आते है परंतु जुमा के दिन श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। दादा का मुरीद अजगर सांप भी है जो कभी कभी मजार के अगल बगल में देखा जाता है। सोन नदी जो अमजा जंगल होकर गुजरती थी, दादा के प्रताप से सोन नदी का किनारा बदल गया और अरवल होकर गुजरने लगा। आज भी सोन नदी का अवशेष देखने को मिलता है। आज भी देवकुंड के च्यवनऋषि और सैयदना दादा का उदाहरण हर बात में इस क्षेत्र के लोग देते है।
सैयदना दादा के एक पोता सैयद शाह जकी कादरी की मजार पर भी वर्ष में दो बार चौतनवमी और दुर्गापूजा के अवसर पर दस दस दिनों का विशाल मेला लगता है जहां भूत प्रेत से ग्रसित लोगों को निजात मिलती है। इस मजार के पास लोहे की तीन कड़ी हैं जिसे प्रेत बाधा से ग्रस्त व्यक्ति पकड़ते हैं जब तक उन्हें इससे निजात नहीं मिलती ग्रसित व्यक्ति उसे नहीं छोड़ता। सैयदना दादा के मजार के बगल में मो पैगम्बर साहब के पैर का निशान पथर पर है जिसे लोग पानी से धोकर पीते हैं जिससे लोगों को फायदा होता है।
यहां साल में तीन बार मेला लगता है जिसमें लाखों की संख्या में लोग आते हैं परंतु राज्य सरकार या केंद्र सरकार की तरफ से किसी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं की जाती है। जो भी इंतजाम रहने खाने का किया जाता है, वह खानकाह के सजादा नसी नैयर कादरी के द्वारा ही किया जाता है। सैयद जमालुदीन आबिद कादरी जो खानकाह के नाजिमें आला हैं, उन्होंने बताया कि सरकार के द्वारा यहां के नाम पर हसपुरा में पर्यटक भवन बनाया गया लेकिन दूरी की वजह से आने वाले लोगों को कोई फायदा नहीं है।
जनसहयोग से इस खानकाह के माध्यम से विशाल अतिथि गृह धर्मशाला का निर्माण कराया जा रहा है। इस दरगाह पर बड़े बड़े राजनेता पदाधिकारीगण आते हैं, दुआ मांगते हैं, मन्नतें भी पूरी होती हैं परंतु इसके विकास के लिये जनप्रतिनिधि या आला हुक्मरानों ने किसी प्रकार कोई पहल नहीं की। जरूरत है इस जगह के पर्यटन स्थल में शामिल करने की ताकि हिंदुस्तान के मानचित्र पर सूफी संतों की जगहों को भी लोग देखकर सबक ले सकें।
- शम्भू शरण सत्यार्थी

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