दोस्ती का नया रूप

दोस्ती का नया रूप

यूं तो दोस्ती मानवता के समय से चली आ रही है किंतु अब इसका नया रूप देखने को मिलता है। आज के समय में दोस्ती का मतलब, दोस्ती की जरूरत और दोस्ती के पैमाने अब सब कुछ बदल चुके हैं। पहले कई मुलाकातों में कोई दोस्त बना करता था। अब तो मुलाकात की भी जरूरत नहीं है। बगैर मुलाकात के ही दोस्त बन जाते हैं।
जो बात हम अपने माता-पिता या घर के किसी अन्य से कहने से हिचकते हैं, वहीं बात हम अपनी उम्र वाले दोस्त से कह डालते हैं। फिल्म 'मैंने प्यार किया' का वह डायलॉग कि एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते, अब पुराना हो गया है। दोस्ती के बीच में अब जेंडर बाधा बनकर नहीं आता। दोस्ती की दुनियां में अब बहुत कुछ बदल गया है। दरअसल इस बदलाव के लिए नई तकनीकें एवं सामाजिक बदलाव जिम्मेदार हैं।
पहले एकल परिवार बहुत कम होते थे। ज्यादातर परिवार इतने बड़े होते थे कि उनमें ही अपनी उम्र का कोई भाई या बहन ऐसे दोस्त के रूप में मिल जाता था जिससे कोई भी अपने दिल की बात कह सकता था किन्तु अब ऐसा नहीं है। अब एकल परिवारों का चलन ज्यादा है। अब परिवार में अक्सर हमउम्र भाई-बहन कम ही होते हैं जिनसे अपने दिल की बात कहीं जा सके।
आजकल कामकाजी व्यक्ति हो या विद्यार्थी, सभी की जिंदगी दोस्तों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। बचपन से कुछ ही लोगों के साथ जिंदगी बिताना, बड़े होकर घर से दूर रहना आदि सभी कारणों से एक आम आदमी की जिंदगी में दोस्तों का महत्त्व पहले के मुकाबले में ज्यादा बढ़ गया है। अपनी जिंदगी का कोई भी फैसला वह दोस्तों से सलाह लेकर ही करते हैं। कपड़ों जैसे छोटे चुनाव हों या जीवनसाथी चुनने का बड़ा फैसला, दोस्तों की सलाह के बगैर कुछ नहीं होता।
आजकल का एक सच यह भी है कि अब दोस्ती के लिए न तो जेंडर बाधा बनता है और न उम्र। आज कोई अपनी मम्मी के क्लोज है तो कोई अपने पापा के। माता-पिता के साथ बच्चों का नया रिश्ता दोस्ती के रूप में उभर रहा है। यहां दोस्ती में उम्र का कोई बंधन नहीं। अपनी बेटी या बेटे का दोस्त बनना आसान काम नहीं है किन्तु उन्हें विश्वास में लेकर उनके साथ हर विषय पर खुलकर बात करने से उनके साथ आसानी से दोस्ती की जा सकती है।
दूसरे अब दोस्ती में मुलाकातें भी इतनी अहम नहीं रही हैं। लोग इंटरनेट पर बैठे-बैठे एक दूसरे से दोस्ती कर सकते हैं। ई-मेल, मोबाइल, पेजर आदि के जरिये मिले बगैर दोस्त एक-दूसरे के संपर्क में रह सकते हैं। यही तो बदलती तकनीक का कमाल है।
दोस्ती के लिए अब किसी व्यक्ति विशेष की जरूरत नहीं रही है। कितने ही लोग ऐसे हैं जो अपनी चार दीवारी में ही कितने घंटे अपनी मनपसंद किताब पढ़ते हैं, गाना गाते या कुछ लिखते हैं। ऐसे लोगों के लिए इनके शौक ही इनके दोस्त हैं। इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि बाकी दुनियां में क्या चल रहा है? इनके लिए दोस्ती का रूप कुछ और ही होता है।
- शिखा चौधरी

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