कब आएंगे किसानों के अच्छे दिन

कब आएंगे किसानों के अच्छे दिन

6 जून यानी मंगलवार को किसान आंदोलन को लेकर दो राज्यों से दो तरह की खबरें आईं, एक अच्छी और एक बुरी। संयोग से दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। ये दोनों राज्य हैं महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश। महाराष्ट्र की खबर जहां सुकून देने वाली थी, वहीं मध्य प्रदेश की दिल दहला देने वाली। मंदसौर में कर्ज माफी और अपनी फसल के वाजिब दाम की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों पर हुई पुलिस फायरिंग में पांच किसानों की मौत हो गई। विडंबना ही है कि पिछले पांच वर्षों से कृषि के क्षेत्र में अव्वल रहने के लिए लगातार कृषि कर्मण्य अवार्ड हासिल करने वाले मध्यप्रदेश में किसानों को पुलिस की गोलियों का शिकार होना पड़ रहा है।
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा केंद्रीय गृह मंत्रलय को भेजी गई रिपोर्ट में उन परिस्थितियों का विस्तृत विवरण दिया गया है कि क्यों पुलिस को फायरिंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा। रिपोर्ट में बताया गया है कि किसान आंदोलन की आड़ में शरारती तत्वों की भीड़ पर पुलिस ने उस वक्त गोली चलाई जब भीड़ थाने पर हमला करने वाली थी। पहले आंसू गैस के गोले छोड़े गये, बाद में लाठीचार्ज भी हुआ लेकिन भीड़ फिर भी तितर बितर नहीं हुई। मजबूरन पुलिस को गोली चलानी पड़ी। इस बीच लगातार बिगड़ते हालात और उन्हें काबू कर पाने की विफलता के चलते मंदसौर के डीएम स्वतंत्र कुमार सिंह व पुलिस अधीक्षक ओ पी त्रिपाठी का जिले से तबादला कर दिया गया है।
बहरहाल, मध्यप्रदेश के मंदसौर में अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों पर गोलीबारी की घटना ने सियासत के ठंडे पड़े चूल्हे को धधका दिया है। पुलिस फायरिंग में किसानों की मौत के बाद सियासतदां अपनी सियासी रोटियां सेंकने में मशगूल हैं। बावजूद इसके एक सवाल तो बनता ही है कि क्या किसान बेमौत ही मरेगा? अगर आत्महत्या नहीं करेगा, तो पुलिस की गोलियों से मरेगा? आखिर क्यों?
हाड़तोड़ मेहनत कर देश का पेट भरना क्या वाकई गुनाह है? देश के अन्नदाता की ऐसी परिणति क्या उचित है? सवाल इसके आगे भी ढेर सारे हैं। सरकार को आज नहीं तो कल इन सवालों के जवाब देने ही होंगे। किसानों की आमदनी दोगुनी होगी या फसल बीमा का झुनझुना देखकर किसान शांत होने वाला नहीं है। उसे कुछ ठोस चाहिए।
उधर, मंदसौर से इतर महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने किसानों की कर्जमाफी का वादा कर उन्हें राहत प्रदान की। महाराष्ट्र सरकार की ओर से कहा गया है कि 31 अक्टूबर से पहले किसानों के कर्ज माफ कर दिये जाएगें। इस ऋण माफी का लाभ पांच एकड़ भूमि से कम भूमि रखने वाले राज्य के सभी किसानों को होगा। महाराष्ट्र में ऐसे कम से कम 1.07 करोड़ किसान हैं। फड़णवीस ने आरोप लगाया कि कुछ राजनेता किसान आंदोलन का सियासी फायदा उठा रहे हैं। फड़णवीस के मुताबिक हिंसा और सड़क जाम करने वालों में किसान नहीं बल्कि राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता शामिल थे। मुख्यमंत्री फडणवीस का यह आरोप सच हो सकता है क्योंकि मंदसौर की घटना के बाद भी ऐसे ही आरोप लग रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने इसके पीछे कांग्रेस का हाथ होने का आरोप लगाया है।
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से लेकर शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू व कृषि मंत्री राधामोहन सिंह समेत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने मंदसौर हादसे पर कांग्रेस की ओर से राजनीति करने का आरोप लगाया है। राहुल गांधी के हिंसाग्रस्त मंदसौर दौरे को फोटो खिंचवाने का अवसर करार देते हुए वेंकैया नायडू ने तो यहां तक कह दिया कि सामान्य परिस्थितियों में कांग्रेस उपाध्यक्ष तो कहीं नहीं जाते लेकिन जहां भी फोटो खिंचवाने का अवसर राहुल गांधी को दिखाई देता है, वहां वे जरूर पहुंच जाते हैं। उन्होंने मंदसौर की घटना का कांग्रेस की ओर से राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया।
मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य में बढ़ती हिंसा और तनाव के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है। बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस राजनीतिक वजहों से किसानों को भड़का रही है। वैसे एक सच यह भी है कि जिन मुद्दों को लेकर किसानों ने आंदोलन शुरू किया था, उन्हें शिवराज सरकार ने मान लिया था।
उज्जैन में सरकार व किसान संगठनों की बैठक के बाद तय हुआ कि किसान कृषि उपज मंडी में जो उत्पाद बेचते हैं, उनका 50 फीसदी उन्हें नकद मिलेगा जबकि 5० फीसदी आरटीजीएस के जरिए सीधा उनके बैंक खाते में आएगा। यह भी तय हुआ कि मूंग की फसल को सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदेगी। किसानों का प्याज 8 रुपए प्रति किलोग्राम की सरकारी दर से अगले तीन-चार दिनों में खरीदा जाएगा। सब्जी मंडियों को मंडी अधिनियम के दायरे में लाया जाएगा। फसल बीमा योजना को ऐच्छिक बनाने और किसानों के खिलाफ आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों को भी वापस लेने का भी फैसला हुआ।
बैठक के बाद भारतीय किसान संघ ने घोषणा की कि चूंकि सरकार ने उनकी सारी बातें मान ली हैं, इसलिए आंदोलन को स्थगित किया जाता है लेकिन आंदोलन में अगुआ भारतीय किसान यूनियन और राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने यह कहते हुए आंदोलन वापस नहीं लेने का एलान किया कि इसे उन्होंने शुरू किया था और खत्म भी वही करेंगे। दोनों संगठनों की इस हठ से भी यह साबित होता है कि किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर सियासत का खेल खेला जा रहा है।
बावजूद इसके इसमें तो कोई दो राय नहीं कि किसान अगर आंदोलनरत हैं तो उसकी वाजिब वजह है। पूरे देश का पेट भरने वाला किसान आज खुद भूखा है। कर्ज के तले डूबा हुआ है। कर्ज अदायगी न कर पाने के कारण किसानों की आत्महत्या की खबरें आये दिन आती रहती हैं। ऐसे में इतना पूछना तो बनता ही है कि न जाने उनके अच्छे दिन कब आएंगे।
- बद्रीनाथ वर्मा

Share it
Share it
Share it
Top