उबरें उदासी से

उबरें उदासी से

डिप्रेशन अर्थात् अवसाद, उदासी, मायूसी, विशाद, निराशा, हताशा ने आज जन-जन को अपने जाल में जकड़ लिया है। यह मनोभाव की एक स्थिति है जो इतने नामों से जानी जाती है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसने बच्चे, बड़े सबको अपनी चपेट में ले लिया है। मानसिक रूप से थोड़ी सी भी परेशानी या तनाव अब घातक सिद्ध होता जा रहा है। किसी बात को लेकर दुखी रहना, किसी से बात न करना, ऐसी ही स्थिति इस मानसिक बीमारी का संकेत हो सकती है। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी से लोग ऐसे अवसाद के शिकार हो रहे हैं। पहले यह 25 से 35 वर्ष के उम्र के लोगों में देखी जाने वाली समस्या थी जो अब 15 वर्ष तक के बच्चे को अपनी चपेट में ले रही है। ऐसी मानसिक परेशानी से गुजर रहे लोगों के मन में जीवन के प्रति कोई मोह नहीं रह जाता। उदासी, मायूसी इनकी दिनचर्या में शामिल हो जाती है।
संकेत:- अवसाद से घिरा व्यक्ति हमेशा दुखी रहता है। दैनिक कामों में उसका मन बिलकुल नहीं लगता। उसे भूख कम लगती है। शारीरिक निर्बलता महसूस करता है। थकान अनुभव करता है। नींद कम, ज्यादा या नहीं आती है। हर बात पर रोना आता है। जीवन त्यागने का मन करता है।
कारण:- किसी बड़े रोग से पीडि़त होना किसी बात को लेकर सदैव तनाव में रहना या चिंतित होना किसी की मृत्यु का सदमा लगना, किसी भी अन्य कारण से मानसिक परेशान रहना।
उपचार:- ऐसे व्यक्ति संगीत सुनें। किसी अन्य कार्य में मन लगाएं। स्थान बदलें। मनपसंद मित्र से मिलें। कहीं घूमने जाएं। करीबी परिचित, परिजन उसे खुश रखने, व्यस्त रखने का प्रयास करें। उसे महत्त्व दें। जीवन का महत्त्व समझाएं।
चिकित्सक ऐसे लोगों को डिप्रेशन दूर करने की दवा भी देते हैं। मनोचिकित्सक भी इन्हें इस स्थिति से उबार सकते हैं। सबका प्रयास मरीज को चिंतामुक्त कर उसमें उत्साह जगाने वाला होना चाहिए।
ऐसे मामलों में परिजन, मित्र, सहकर्मी, चिकित्सक सबका प्रयास सहायक सिद्ध हो सकता है। अवसाद से उबरा व्यक्ति बड़ी उपलब्धियां प्राप्त करता है बशर्ते परिस्थितियों से उबर कर वह नए जोश के साथ भिड़ जाए।
- सीतेश कुमार द्विवेदी

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