गर्मी का अमृत है मटठा

गर्मी का अमृत है मटठा

मटठा, छाछ या तक्र का उपयोग हमारे देश में अनन्त काल से होता आ रहा है। पूर्वी भारत तथा बिहार के लोग दालभात के साथ-साथ मटठा भी मिलाकर खाते हैं। दक्षिण भारत तथा पंजाब के लोग भोजन के बाद मटठा पीते हैं तथा इससे नमकीन खीर बनाकर भी खाते हैं।मटठा में कुछ ऐसे गुण हैं जो भोजन को जल्दी पचाने में सहायक होते हैं। मटठे से बनाई गई कढ़ी भी सुपाच्य एवं स्वादिष्ट होती है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में मटठे के द्वारा अनेक रोगों को ठीक और नियंत्रित किये जाने के उल्लेख मिलते हैं। इसे त्रिदोषनाशक, पथ्यों में उत्तम, अजीर्णता दूर करने वाला, रूचिकर, बुद्धिवद्र्धक, अर्श (बवासीर) और उदर विकार नाशक बताया गया है।
'ग्रीष्मौतक्रं मधुरम् वा अमृतम्' कहकर आयुर्वेद ने तक्र अर्थात् मटठे को ग्रीष्म ऋतु का अमृत बताया है। आयुर्वेद के अनुसार यह कई रोगों में पथ्य आहार के लिए भी प्रयोगित होता है। तले हुए व्यंजनों, मिठाइयों, मिर्च-मसालों तथा गरिष्ठ आहार को पचाने में यह बहुत सहायक है।
मटठे में शीतलता है, इसलिए गर्मी में इसकी आवश्यकता ज्यादा महसूस होती है। मटठे में विटामिन-बी-2, लगभग 30 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम तथा अल्प मात्र में विटामिन 'ए' भी पाया जाता है। यूं तो किसी भी दूध के दही से मटठा बनाया जा सकता है परन्तु गाय के दही से बनाया गया मटठा अत्यन्त बलकारक, स्वादिष्ट, रूचिकर, पाचक, स्निग्ध, पौष्टिक तथा वातनाशक होता है। यह स्वाद में कुछ खट्टा होता है।
दही में चौथाई भाग पानी मिलाकर मथनी से अच्छी तरह मथकर उसमें से मक्खन निकालकर जो घोल शेष बचता है, वह मटठा कहलाता है। आयुर्वेद के अनुसार मटठा चार प्रकार का होता है जिसे-घोल, मथित, तक्र तथा छाछ कहा जाता है।
अति प्रसिद्ध प्राचीन वैद्यक ग्रन्थ 'भावप्रकाश' में स्पष्ट उल्लेख है कि जो मनुष्य यथाविधि नित्य मटठे का सेवन करता है, वह कभी भी अपने 'आरोग्य' को नहीं खोता। मटठे को मृत्युलोक के अमृत की भी उपमा दी गई है क्योंकि यह शरीर में अवस्थित विजातीय तत्वों को बाहर निकालकर शरीर को नवजीवन प्रदान करता है।
आजकल अनेक रोगों के उपचार के लिए आयुर्वेदिक तथा प्राकृतिक चिकित्सक 'मठ्ठाकल्प' का प्रयोग करते हैं। यह अतिसार और पेचिश में बहुत लाभदायक होता है। इसके अलावा चर्मरोग, बवासीर, जलोदर, दमा, मधुमेह, संधिवात तथा शीघ्रस्खलन आदि बीमारियों में भी इसका प्रयोग अत्यन्त लाभप्रद सिद्ध होता है।
गरिष्ठ, बासी, अधिक तला हुआ तथा मसालायुक्त आहार लेने से पेट के कई रोग उत्पन्न होते हैं। गैस और बवासीर के लिए मटठे से अच्छी और कोई औषधि नहीं है। मटठे में हींग, जीरा और सेंधा नमक को डालकर पीने से उक्त रोगों में लाभ होता है। ऐसा मटठा रूचिकर, पौष्टिक, बलवद्र्धक और वातशूल को नष्ट करने वाला होता है।
गुर्दे, मूत्रवाहिनी नलिका, मूत्राशय में पथरी के कारण या सूजन आने पर पेशाब न उतरने पर मटठे में गुड़ को मिलाकर पीने से पेशाब की रूकावट दूर हो जाती है। प्रदूषित पानी या अन्य कारणों से उत्पन्न होने वाला रोग पीलिया भी मटठे के सेवन से दूर हो जाता है। गाय के दही से निर्मित छाछ में चित्रक का चूर्ण मिलाकर मटठा पीने से पीलिया (जान्डिस) दूर हो जाता है तथा शरीर फिर से स्वस्थ व सुन्दर हो जाता है।
आमाशय के विकारों के कारण पाचन संबंधी रस (इन्जाइम) कम उत्पन्न होते हैं जिससे भूख कम लगने लगती है। दिन भर अरूचि, जी मिचलाना, अपच, विषम ज्वर, कब्ज तथा अतिसार के लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं। रोगी का पित्त तथा वात कुपित हो जाता है जिससे वह दिन-प्रतिदिन कमजोर होता चला जाता है। ग्रीष्मकाल में छाछ में सेंधा नमक मिलाकर पीते रहने से उक्त सभी रोग हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं।
आंतों में कीड़े हो जाना आजकल सामान्य बीमारी हो गई है। कृमिनाश के लिए एक दिन पहले तैयार किया बासी मटठे शक्कर मिलाकर पीने से आंतों के सभी कीड़े एक जगह इकटठे हो जाते हैं। फिर दो दिन बाद ताजे मटठे में नमक और हल्की मात्रा में पिसी हुई काली मिर्च मिलाकर सेवन करने से इकटठे हुए कीड़ों का सफाया हो जाता है।
एग्जिमा या छाजन ग्रस्त भाग पर नीम की पत्तियों (कोपलों) को पीसकर छाछ के साथ मिलाकर लेप तैयार कर दिन में तीन बार तक लगाने से काफी लाभ होता है। ताजा मटठा नमक व शक्कर मिलाकर पीते रहने से एग्जीमा में अत्यन्त लाभ होता है। नियमित रूप से मटठा पीते रहने वालों को कब्ज की शिकायत नहीं होती।
चेहरे की झाइयों को दूर करने के लिए एक दिन पहले तैयार किया गया मटठा और बारीक बेसन को मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें और रात में सोते समय इसका लेप चेहरे पर हल्का-हल्का कर लें। सुबह स्वच्छ जल से चेहरे को धो लें। ऐसा करने से कुछ ही दिनों में चेहरे की झाइयां मिट जाएंगी और चेहरा कांतिपूर्ण हो जाएगा।
- पूनम दिनकर

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