बाल कथा: मैं हूं इलायची

बाल कथा: मैं हूं इलायची

दोस्तों, आपके लिए मैं नयी नहीं हूं। आप सब मेरे स्वाद से परिचित होंगे। दूध से निर्मित खीर में मेरी भीनी-भीनी गंध आपकी नाक में जब आती होगी तो मिजाज प्रसन्न हो जाता होगा। व्यंजन हो या मांस, जब तक उसके मसाले में मेरा प्रयोग न हो तब तक उसका स्वाद अपूर्ण ही रहता है। मेरा स्वाद अनोखा है। न तो मीठा है, न खट्टा और न तीखा है, न कसैला। मेरे मनमोहक गुण के कारण लोगों ने मुझे भिन्न-भिन्न उपाधियों से विभूषित किया है। यथा-पान की जान, मसालों की रानी, खुशबूओं का झरना, हरा सोना इत्यादि।
मेरा जन्म स्थान भारत है। प्राचीन फारसी साहित्य में मेरी खोज की एक दिलचस्प श्रुतिकथा मिलती है। बादशाह इकराम आलम की पांच बीवियां थीं। अपनी नवोढ़ा पत्नी रूबी जहां, जो बेपनाह हुस्न और शवाब की मलिका थी, पर वह जान छिड़कता था मगर उसके मुख से असह्य दुर्गन्ध निकलने के कारण बादशाह का उनके पास खड़ा रहना ही दूभर होता था।
बादशाह के दिमाग में खुशबू वाली जिंसों का ख्याल आया। उसने सुगंधित-सुमधुर नैसर्गिक शै खोज लाने के लिए भारी इनाम की मुनादी करवा दी। संयोगवश उस मुनादी को एक जंगली कबायली नाजनी ने सुना। दूसरे दिन वह मुझको लेकर बादशाह के पास पहुंची। मुझको चखते ही बादशाह की मुराद पूरी हो गई। इसके साथ ही मेरी जादू भरी खुशबू सारे अरब में फैल गई।
मेरा पौधा सदाबहार होता है। पौधे की ऊंचाई 1.20मी. से 1.70 मी. तक होती है। जनवरी से पौधे में मेरे फूल खिलने शुरू हो जाते हैं। सात-आठ महीनों तक फूलों की बहार रहती है। जुलाई तक डोड़ी लग जाती है और अक्तूबर नवंबर में फल पक कर तैयार हो जाते हैं। मेरे एक पौधे में 1800-2000 फल लगते हैं जो सूखने पर 250 ग्राम के करीब हो जाते हैं। मेरा उत्पादन प्रति एकड़ 60 किलोग्राम होता है।
मेरे फल पकने पर मजदूरों द्वारा एकत्र करवा लिये जाते हैं। फिर मैं इतनी सुखायी जाती हूं कि मेरी त्वचा की हरीतिमा नष्ट न हो। अत: मेरा रंग बरकरार रखने के लिए मैं प्राय: 'ओवन' में सुखायी जाती हूं। मेरी खेती के लिए समुद्रतल से 200 से 500 मीटर ऊंची जमीन उपयुक्त होती है । सघन खेती के लिए वृक्षों में घिरी ढलवां उपजाऊ जमीन की जरूरत होती है। मेरी भारतीय जाति विश्व भर में अपनी अनोखी खुशुबू, मधुर स्वाद और मोहक रंग के लिए विख्यात है। विश्व की मेरी कुल उपज का तीन-चौथाई भाग भारत में पैदा होता है। केरल, कर्नाटक और तमिलनाडू में मेरी खेती की जाती है।
मेरा उपयोग अनेक औषधियों के निर्माण में होता है। इसके अलावा मेरा प्रयोग भिन्न-भिन्न मिष्ठानों, शर्बत, मसालों आदि में किया जाता है। मेरा नियमित सेवन करने से कफ व पित्त के विकारों का शमन होता है और पाचन शक्ति तीव्र होती है। मेरी खुशबू जहां आपके तन-मन को प्रफुल्लित करती है वहीं स्वास्थ्य को भी लाभ पहुंचाती है।
- अंगर किशोर

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