चण्डी की आराधना से अभीष्ट फल पाते हैं कर्क राशि के जातक

चण्डी की आराधना से अभीष्ट फल पाते हैं कर्क राशि के जातक

इससे पूर्व मेष, वृष एवं मिथुन राशि वाले जातकों के विषय में बताया गया था कि मेष राशि के जातक श्रीगणेश, शिवजी एवं विष्णु की आराधना करके अभीष्ट की प्राप्ति कर सकते हैं। इसी प्रकार वृष राशि के जातक अन्नपूर्णा, श्रीराम तथा रूद्र की एवं मिथुन राशि के जातक श्रीकृष्ण, रतिप्रिया एवं दुर्गा की आराधना द्वारा अभीष्ट की प्राप्ति कर सकते हैं। अब प्रस्तुत लेख के माध्यम से कर्क राशि के जातकों से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारियां दी जा रही हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 21 जून से 21 जुलाई के अन्दर जन्म लेने वाला जातक कर्क राशि का जातक कहलाता है। इस अवधि को दस-दस दिनों में बांट देने पर प्रथम दसांश, द्वितीय-दसांश तथा तृतीय दसांश की प्राप्ति होती है। 21 जून से 30 जून के अंदर जन्म लेने वाले जातक प्रथम दसांश के, 1 जुलाई से 10 जुलाई के मध्य जन्म लेने वाले जातक द्वितीय दसांश के तथा 11 जुलाई से 21 जुलाई के मध्य जन्म लेने वाले जातक तृतीय दसांश के जातक कहलाते हैं।
प्रथम दसांश अर्थात् 21 जून से 30 जून के मध्य जन्म लेने वाले जातकों का नाम ही, हू, है वर्णाक्षरों से प्रारम्भ होता है। इसी प्रकार द्वितीय दसांश 1 जुलाई से (10 जुलाई) के जातकों के नाम हो, डा, डी वर्णो से प्रारम्भ होते हैं तथा तृतीय दसांश के जातकों का नाम डू,डे, डो वर्णो से प्रारम्भ होते हैं।
21 जुलाई के बाद जन्म लेने वाले जातकों की राशि सिंह होती है। 21 जून से 30 के मध्य जन्म लेने वाले जातकों अर्थात ही, हू ,ह वर्णों से प्रारम्भ होने वाले जातकों को महाचण्डी देवी की आराधना करनी चाहिए। इस वर्ग के जातकों को 'नमश्चण्डिकायै' मंत्र का जप करना चाहिए। चामुण्डा देवी का अनुष्ठान इस वर्ग के जातकों को अभीष्ट फल की प्राप्ति कराता है तथा सर्वविध रक्षा करने के लिए माता चामुण्डा की कृपा प्राप्त होती रहती है। चामुण्डा देवी की आराधना नवरात्र में विशेष रूप से करने से पूरे सालभर तक कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता रहता है।
1 जुलाई से 10 जुलाई के मध्य जन्म लेने वाले जातकों अर्थात हो, डा, डी, वर्णो से नाम शुरू होने वाले जातकों को विघ्नराज गणपति की साधना आराधना करनी चाहिए। 'गं गणपतये नम:' मंत्र का जप अभीष्ट लाभ पहुंचाता है। गणेश जी के ऊपर नित्य 'दूब' चढ़ाना तवरित सफलता को प्रदान करता है। गणेश जी का ध्यान स्तोत्र आदि का नित्य पाठ करते रहने से सभी विघ्नों का नाश होता है।
11 जुलाई से 21 जुलाई के मध्य जन्म लेने वाले जातकों अर्थात डू, डे , डो वर्णों से प्रारम्भ होने वाले नामों के जातकों को 'भैरव' की साधना करनी चाहिए। ' बं बदुकाय नम:' मंत्र का नित्य जाप तथा बटुक भैरव की अन्य साधनाओं के माध्यम से अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता है तथा हर प्रकार के अभीष्ट की प्राप्ति की जा सकती है।
कर्क राशि का स्वामी चन्द्र होता है। शनि चन्द्र को अपना शत्रु मानता है परन्तु चन्द्र शनि से सम भाव रखता है। कर्क राशि में शनि सप्तम तथा अष्टम भाव के स्वामी होते हैं। कर्क राशि के जातकों का स्वभाव एकाएक बदल सकता है। जिद्दीपन अधिक आ सकता है साथ ही ऐसे जातक रूखी वाणी का प्रयोग अधिक करने लगते हैं। मन अस्थिर रहने लगता है तथा कोई भी फैसला तुरन्त नहीं ले पाते हैं। अनावश्यक खर्चों में वृद्धि होने लगती है। जिससे संचित धन में निरंतर कमी आने लगती है। धार्मिक कर्मों में अरूचि पैदा होने लगती है। कार्यक्षमता में निरन्तर कमी आने लगती है।
कर्क राशि के जातकों को अष्टम शनि के प्रभाव से स्नायुविकार, नेत्र रोग, यकृत विकार, बड़ी ऑंत की सूजन, पीलिया आदि रोग होने की संभावना बनी रहती है। कुण्डली में शुक्र की बलशीलता के कारण कर्क राशि के जातकों पर काम, वासना का भूत सवार रहता है। पुरूष अन्य स्त्री सम्भोग तथा स्त्री अन्य पुरूष गामिनी बन कर यौन रोग, फेफड़ों के रोग, मानसिक चिंता तथा नींद न आना आदि बीमारिया दृष्टिगोचर होने लगती हैं।
कर्क राशि के जातकों को शयनकक्ष के पलंग पर चारों पायों में एक चांदी की तथा एक लोहे की कील ठुकवा देनी चाहिए। पूर्णिमा के चांदनी में खीर को रखकर उसे अगले दिन खाली पेट खा लेने से लाभ होता है। इस राशि की कुंवारी कन्याओं को प्रत्येक शनिवार को साबूदाने की खीर बनाकर किसी शिवमंदिर में दान करते रहने से चारित्रिक हीनता की संभावना नहीं रहती तथा वैवाहिक बाधाओं का योग समाप्त होता है। इसी राशि के जातकों में विशेष स्त्रियों को 'त्रिदेवी यंत्र' धारण कर लेने से हर प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिलती है। नामाक्षरों के अनुसार चण्डी, गणेश एवं भैरव की साधना अवश्य ही करते रहना चाहिए।
- आनंद कुमार अनंत

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