गर्जिया देवी के दर्शनों से ही मिल जाता है मनोवांछित जीवन साथी

गर्जिया देवी के दर्शनों से ही मिल जाता है मनोवांछित जीवन साथी

उत्तराचंल धार्मिक स्थानों की खान है। पर्वत पर भगवान शिव के निवास केदारनाथ, बद्रीनाथ तो पहले ही श्रद्धालुओं के लिए दर्शनीय तीर्थ रहे हैं। शिव और शक्ति का सामंजस्य वर्णनीय है। हिमाचल पुत्री उमा पार्वती गिरिराज की कन्या होने के कारण गिरिजा कहलाई।
वर्तमान रामनगर शहर से रानीखेत को जाने वाले मार्ग पर पड़ता है ढिकुली गांव। इसी गांव से तीन किमी. आगे स्थित है गर्जिया देवी का भव्य मंदिर। कोसी नदी के बीचों-बीच एक टापू के ऊपर गर्जिया देवी का भव्य मंदिर है जो पार्वती (वैष्णवी शक्ति) है। यहां बलि नहीं चढ़ाई जाती। वैसे तो यहां पूरे वर्ष ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है मगर गंगा स्नान को बड़ा मेला लगता है।
ढिकुली क्षेत्र का इतिहास कत्यूरी राजाओं से जुड़ा है जिनका शासन सन् 850 से 1060 तक माना जाता है मगर प्रसिद्ध इतिहासकार बद्रीदत्त पांडे कत्यूरियों का शासन काल 7०० ईसवीं तक ही मानते हैं। गर्जिया देवी का यह स्थल सन् 1940 से पूर्व उपेक्षित अवस्था में था मगर इससे पूर्व भी इस स्थान का अस्तित्व था। हां, 1940 से पूर्व गर्जिया देवी मन्दिर की स्थिति वर्तमान स्थिति जैसी नहीं थी। इस देवी को उपटा देवी कहा जाता था।
वर्तमान में गर्जिया मन्दिर जिस टीले पर स्थित है यह कोसी कौशिकी नदी की बाढ़ में कहीं ऊपर से टूटकर बहता हुआ आया था, ऐसी लोगों की धारणा है। उस समय इस टीले की समतल भूमि पर भैरव देवता विराजमान थे मगर वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा होना संभव नहीं माना जाता। वर्ष 1940 से पूर्व यह क्षेत्र पूर्ण रूप से जंगलों से घिरा हुआ था। बद्रीनाथ जाने वाले यात्री इसी गांव के समीप से होकर गुजरते थे। इसी बीच रानीखेत निवासी पं. रामकृष्ण पांडे को इस मंदिर का पहला पुजारी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
1950 के आस-पास श्री 108 महादेव गिरी जी नागा बाबा जिन्हें अनेक सिद्धियां प्राप्त थी और पहुंचे हुए तांत्रिक थे, यहां आये। सम्भवत: उन्हीं के एक शिष्य पाठक जी ने अपने गुरू के आदेश पर इस स्थान पर मां की उपासना शुरू की। यहीं झोपड़ा डाल लिया।
तांत्रिक पाठक जापान की फौज में बर्मा में सिपाही थे। उनकी साधना के फलस्वरूप उन्हें फौज ने पैंसिन पट्टा प्रदान किया था। तांत्रिक नागाबाबा ने राजस्थान से भैरव, गणेश और तीन महादेवियों की मूर्तियां लाकर यहां स्थापित कराई।
जब नागा बाबा मंत्रोच्चार से मूर्ति स्थापित करा रहे थे तो एक शेर आकर सामने खड़ा हो गया था। शेर ने अत्यंत तेज गर्जना की जिसे संकेत मानकर मंदिर का नाम गर्जिया देवी रख दिया गया। इसके बाद प्राचीन टीले को काटकर सीढिय़ां बनाई गई, पक्की कुटिया से मंदिर तक पत्थरों का मार्ग बनवाया गया मगर माता को यह स्वरूप स्वीकार नहीं हुआ।
1959-60 की विनाशकारी कोसी का विराट रूप नई एवं प्राचीन मूर्तियों को बहा ले गया। पांडे जी के पुत्रों ने नये सिरे से मंदिर बनाकर मूर्तियां स्थापित की। हां, भयानक बाढ़ के कारण टीले की ऊंचाई एवं चौड़ाई बहुत कम हो गई है। सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। एक दिन पं. पूर्णचन्द्र को स्वप्न में माता ने दर्शन दिए। यह बात सन् 1967 की है। स्वप्न में मां ने बताया कि रानीखेत के पास कालिका देवी का मंदिर है। उसी के समीप जंगल में एक वृक्ष की जड़ के पास (काले पत्थर ग्रेनाइट) ही भगवान लक्ष्मी नारायण की मूर्ति दबी पड़ी है। माता ने आदेश दिया कि उस मूर्ति को वहां से निकालकर गर्जिया देवी में स्थापित कर दिया जाये।
भक्त हृदय पांडे जी स्वप्न में दिखाई पड़े स्थान पर पहुंचे और खुदाई शुरू कर दी। आश्चर्य तब हुआ जब मूर्तियां निकल गई मगर मन्दिर भवन निर्माण की प्रतीक्षा तक मूर्तियां उनकी कुटिया में ही रखी रही। इसी बीच ये मूर्तियां चोरी हो गई। पांडे जी ने मूर्तियां काफी खोजी मगर नहीं मिली। इस घटना से वह इतना आहत हुए थे कि माता की कृपा को भी शंका की दृष्टि से देखने लगे थे किंतु वर्ष 1972 में रामनगर रानीखेत राजमार्ग (वर्तमान गर्जियापुल से 100 मी. आगे) से गर्जिया परिसर तक पैदल मार्ग के निर्माण का कार्य शुरू हुआ तो एक दिन जमीन में लक्ष्मी नारायण की मूर्तियां दबी पाई।
पुरातत्व विभाग ने इस बार खोज कर मूर्ति का पंजीकरण किया और गर्जिया देवी के पास ही एक भव्य मंदिर का निर्माण कर उसमें ये मूर्तियां स्थापित करा दी गई। पुरातत्व विभाग के अनुसार ये मूर्तियां 8-9 सौ वर्ष पुरानी हैं अर्थात् 11 वीं 12 वीं. सदी की हैं ये मूर्तियां। बरसात में जब कौशिकी नदी चढ़ती है तो भक्त इसी मंदिर से हाथ जोड़कर यहीं पूजा अर्चना कर लेते हैं। कौशिकी नदी का कटाव इस स्थान के अस्तित्व के लिए चिंता का विषय है। हिमालय की पुत्री गर्जिया के संबंध में कई पौराणिक ग्रंथों में भी स्पष्ट हुआ है। गिरिजा के दो रूप माने जाते हैं, एक पति की प्रिया गौरा, उमा अथवा गिरिजा, दूसरा असुरों को नष्ट करने वाला स्वरूप है।
गिरिजा देवी के दर्शन मात्र से युवक-युवतियों के विवाह में आ रही बाधाएं समाप्त हो जाती हैं, ऐसी मान्यता है। आज भी युवक-युवतियां मनचाहे जीवन साथी की प्राप्ति के लिए गिरिजा देवी आकर प्रसाद चढ़ाते हैं और अपनी मनोकामना हेतु चुनरी बांधकर जाते हैं। जब मनोकामना पूरी हो जाती है तो पति-पत्नी जोड़े में आकर पूजन करते हैं। विदेशों तक से लोग गिरिजा देवी के महात्म्य को सुनकर दर्शनार्थ आते हैं।
गिरिजा देवी के टीले के नीचे ही मां गौरी के पति भगवान शंकर की गुुफा है जिसमें शिवलिंग बना हुआ है। इसके अलावा ऊपर पहाड़ों पर भैरव मंदिर स्थित है। माना जाता है कि जब तक भैरव दर्शन न किए जाये, तब तक गिरिजा देवी की कृपा प्राप्ति नहीं होती। वहां उड़द-चावल का भोग लगता है। कुल मिलाकर पर्यटन एवं धार्मिक दृष्टि से काफी विकसित हो चुका है यह स्थान।
- पंकज भारद्वाज

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