पर्यटन: प्रकृति की गोद में गज़ब का गोवा

पर्यटन: प्रकृति की गोद में गज़ब का गोवा

घूमना जिसका शौक हो, वह गोवा की सुंदरता के जाल से बच नहीं सकता, ऐसा आकर्षण है इस प्रदेश में, कि दूर दूर से पर्यटक खिंचे चले आते हैं। इसकी वादियां, समुद्री तट, अठखेलियां करती समुद्री लहरें, हरे भरे पेड़, चांदी सी बिखरी रेत और इस पर सोना बिखेरती सूर्य की रश्मियां भला किसे नहीं बुलाती ! आइए चलते हैं गोवा की सुदरता में डूबने उतरने!

गोवा एक नजऱ में:

गोवा की राजधानी व सबसे बड़ा शहर पणजी है। केवल दो जिले हैं उत्तर गोआ व दक्षिण गोआ। राजभाषा कोंकणी है। क्षेत्रफल के हिसाब से गोवा भारत का सबसे छोटा और जनसँख्या में दूसरा सबसे छोटा राज्य है। गोआ का समुद्र तट 121 किलोमीटर लम्बा है। गोआ पहले पुर्तगाल का एक उपनिवेश था। पुर्तगालियों ने यहां लगभग 450 सालों तक शासन किया और दिसंबर 1961 में यह भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बना।

गोपराष्ट्र से गोआ तक:

एक जनश्रुति के अनुसार गोआ की रचना भगवान परशुराम ने की थी। कहा जाता है कि परशुराम ने एक यज्ञ के दौरान अपने बाणों की वर्षा से समुद्र को कई स्थानों पर पीछे धकेल दिया था और इसी वजह से आज भी गोआ में बहुत से स्थानों का नाम वाणावली, वाणस्थली इत्यादि है। उत्तरी गोवा में हरमल के पास आज भूरे रंग के एक पर्वत को परशुराम के यज्ञ करने का स्थान माना जाता है।

महाभारत में गोआ का उल्लेख गोपराष्ट्र यानी गाय चरानेवालों के देश के रूप में मिलता है। दक्षिण कोंकण क्षेत्र का उल्लेख गोवाराष्ट्र के रूप में पाया जाता है। संस्कृत के कुछ अन्य पुराने स्रोतों में गोआ को गोपकपुरी और गोपकपट्टन कहा गया है जिनका उल्लेख अन्य ग्रंथों के अलावा हरिवंशम और स्कंद पुराण में मिलता है। गोवा को बाद में कहीं कहीं गोअंचल भी कहा गया है। अन्य नामों में गोवे, गोवापुरी, गोपकापाटन, और गोमंत प्रमुख हैं। जिस स्थान का नाम पुर्तगाल के यात्रियों ने गोआ रखा, वह आज का छोटा सा समुद्र तटीय शहर गोअ-वेल्हा है। बाद में उस पूरे क्षेत्र को गोआ कहा जाने लगा जिस पर पुर्तगालियों ने कब्जा किया।

तीसरी सदी ईसा पूर्व गोआ में यहाँ मौर्य वंश के शासन की स्थापना हुई थी। बाद में पहली सदी के शुरुआत में कोल्हापुर के सातवाहन वंश के शासकों का अधिकार स्थापित हुआ और फिर बादामी के चालुक्य शासकों ने 580 इसवी से 750 ईसवीं पर राज किया। 1312 ईसवी में गोआ पहली बार दिल्ली सल्तनत के अधीन हुआ लेकिन उन्हें विजयनगर के शासक हरिहर प्रथम द्वार वहाँ से खदेड़ दिया गया। अगले सौ सालों तक विजयनगर के शासकों ने यहाँ शासन किया और 1469 में गुलबर्गा के बहामी सुल्तान द्वारा फिर से दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बनाया गया।

बहामी शासकों के पतन के बाद बीजापुर के आदिल शाह का यहाँ कब्जा हुआ जिसने 'गोआ-वेल्हा' को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। गोआ करीब करीब 500 साल तक पुर्तगाली शासन के आधीन रहा। इस कारण यहाँ यूरोपीय संस्कृति का प्रभाव बढ़ा।। गोवा में 60 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू और 28 प्रतिशत जनसंख्या ईसाई है। खास बात यह है कि, यहाँ के ईसाई समाज में भी हिन्दुओं जैसी जाति व्यवस्था पाई जाती है।

संस्कृति की दृष्टि से गोआ काफी प्राचीन है। कहा जाता है कि 1000 साल पहले गोआ 'कोंकण काशी' के नाम से जाना जाता था। हालाँकि पुर्तगाली लोगों ने यहाँ के संस्कृति का नामोनिशान मिटाने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन यहाँ की मूल संस्कृति इतनी मजबूत थी की धर्मांतरण के बाद भी वह मिट नहीं पाई।

पर्यटन गोआ का प्रमुख उद्योग है। पर्यटन के अलावा लौह खनिज भी विपुल मात्रा में है जो जापान तथा चीन जैसे देशों में निर्यात होता है। गोआ की मछली स्थानीय बाजारों में ही बेची जाती है व काजू सउदी अरब, ब्रिटेन तथा अन्य यूरोपीय राष्ट्रों को निर्यात होता है।

डाबोलिम हवाई अड्डा यहाँ का घरेलू हवाई अड्डा है जो देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। अभी हाल के वर्षों में गोआ के लिये पणजी हवाई अड्डे से अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें भी शुरु हुई हैं।

गोआ मुम्बई व बंगलोर से अच्छी तरह जुड़ा है। इन शहरों से गोआ के लिये सीधी लक्जरी बसें चलती हैं। इसके अलावा अन्य नजदीक के शहरों में भी आप सड़क द्वारा यहाँ से जा सकते हैं। कोंकण रेलवे से गोवा भारत के पूर्वी तटीय शहरों से जुड़ा है। कोंकण रेलवे अपनी गति और अच्छी सेवा के लिये पूरे भारत में मशहूर है। इसके अलावा गोवा आने के लिये देश के किसी भी बड़े स्टेशन से आप वास्को द गामा के लिये सीधी रेलगाड़ी पकड़ सकते हैं.

अंर्तराष्ट्रीय स्तर सी बीच:

वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही प्रकृति गोवा को अदभुत स्वरूप प्रदान करती है। यह स्थान शांतिप्रिय पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को बहुत भाता है। यहां छोटे-बड़े लगभग 40 समुद्री तट है। इनमें से कुछ समुद्र तट अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हैं। इसी कारण गोवा की विश्व पर्यटन मानचित्र के पटल पर अपनी एक अलग पहचान है।

नयनाभिराम समुद्री तट:

गोवा के मनभावन बीच की लंबी कतार में पणजी से 16 किलोमीटर दूर कलंगुट बीच, उसके पास बागा बीच, पणजी बीच के निकट मीरामार बीच, जुआरी नदी के मुहाने पर दोना पाउला बीच स्थित है। वहीं इसकी दूसरी दिशा में कोलवा बीच ऐसे ही सागर तटों में से है जहां मानसून के वक्त पर्यटक जरूर आना चाहेंगे। यही नहीं, अगर मौसम साथ दे तो बागाटोर बीच, अंजुना बीच, सिंकेरियन बीच, पालोलेम बीच जैसे अन्य सुंदर सागर तट भी हैं। मुख्य रूप से अगोंडा ,अरामबोल, अंजुना, बागा, बेनाउलिम, कालांगुट व चपोरा तट प्रसिद्ध हैं। गोवा के इन समुद्र तटों पर आप समुद्र की लहरों पर वाटर सर्फिंग, पैरासेलिंग, वाटर स्किइंग, स्कूबा डाइविंग, वाटर स्कूटर आदि का लुत्फ उठा सकते हैं।

ऐतिहासिक पूजास्थल:

गोवा की खूबसूरती केवल यहां के सागर तटों तक ही सीमित नहीं है। यहां सेंट फ्रांसिस, होली स्पिरिट, पिलर सेमिनरी, सालीगांव, रकोल सेमिनरी आदि यहां के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक चर्च है। इसके अतिरिक्त सेंट काजरन चर्च, सेंट आगस्टीन टावर, तथा सेंट एरक्स चर्च भी प्रसिद्ध है। गोवा के पवित्र मंदिर जिनसे श्री कामाक्षी, सप्तकेटेश्वर, श्री शांतादुर्ग, महालसा नारायणी, परनेम का भगवती मंदिर और महालक्ष्मी आदि दर्शनीय है।

मांडवी नदी के तट पर बसे पणजी के आधुनिक बाजार पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। मांडवी पर तैरते क्रूज पर संगीत एवं नृत्य के कार्यक्रम में गोवा की संस्कृति की एक झलक देखने को मिलती है। पहाड़ों के बीच स्थित मायेम झील बिचोलिम पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण है जिसके चारों ओर घने पेड़ हैं। यहीं 7 वीं शताब्दी में बनाई गयी विश्व प्रसिद्ध अर्वालम या पांडव गुफाएं है जो पर्यटकों और अन्वेषकों को समान समान रूप से आकर्षित करती गोवा की मनमोहक सुंदरता और मंदिरों, गिरजाघरों और पुराने निवास स्थानों की वास्तुकलात्मक भव्यता गोवा को दुनिया भर से आने वाले पर्यटकों का स्वर्ग बनाती है।

अनुपम प्राकृतिक सुषमा:

गोवा की प्राकृतिक सुंदरता के अलावा यहाँ के प्रसिद्ध तट और सूर्य की धूप पर्यटकों को गोवा की ओर खींचती है जो यहाँ के शांति प्रिय, अतिथि सत्कार करने वाले और दोस्ताना व्यवहार रखने वाले लोगों के कारण अधिक आकर्षक है। गोवा में वे सब बातें हैं जो पृथ्वी के अन्य किसी स्थान पर नहीं है, सुनहरे लम्बे समुद्र तट, आकर्षक चर्च, मन्दिर, पुराने किले और कलात्मक भग्नावशेष।

आज देश-विदेश में औसतन दस लाख पर्यटक गोवा के प्राकृतिक सौंदर्य एवं विशिष्ट सभ्यता से आकर्षित होकर यहाँ आते हैं। यहाँ 400 वर्ष पुराने श्री मंगेश और श्री शांतादुर्गा के मन्दिरों की अपनी महत्ता है। यहाँ का मशहूर समुद्री भोजन, संगीत, नाच-गाना, ड्रम और गिटार की धुनें, शान्त, स्वच्छ व मनोरंजक वातावरण प्रस्तुत करती हैं।

तो मौका मत छोडिय़े, प्राकृतिक सौंदर्य की देन गोवा की यात्र का, उठाइए अपने बैग - बैगेज व घूम ही आइए इन छुट्टियों में!

- घनश्याम बादल

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