राजनीति: चुनाव परिणामों के निहितार्थ

राजनीति: चुनाव परिणामों के निहितार्थ

हाल में हुए महाराष्ट्र और हरियाणा में हुए चुनाव परिणामों को भले ही सभी दल अपनी जीत बता रहे हैं किंतु यह भी सच है कि इस जीत में भी अनेक किंतु परंतु लगे हुए है। जहां महाराष्ट्र में कांग्रेस खिसकं कर चौथे स्थान पर आ गई है, वहीं एनसीपी की ताकत पहले से बढ़ी है। अधिकतर सर्वेक्षण कांग्रेस और एनसीपी को बुरी तरह हारते हुए दिखा रहे थे और भाजपा को जबरदस्त बहुमत मिलता दिखाया जा रहा था किंतु दोनों ही बातें सही नहीं निकली।

भाजपा को पहले जैसी सीटें न मिलने के कारण शिवसेना अपना रूतबा बढ़ा हुआ मान रही है और भाजपा से आधे समय हेतु मुख्यमंत्री पद की मांग भी कर रही है। यद्यपि उसकी सदस्य संख्या भाजपा से बहुत कम है पर उसे लग रहा है कि ऐसे शायद भाजपा को ब्लैकमेल किया जा सकता है।

यद्यपि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात की प्रशंसा की है कि भाजपा ने महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में बहुत अच्छी सफलता पाई है किंतु सत्य यह है कि दोनों जगह भाजपा की सीटों की संख्या कम हुई है। 2014 में जहां भाजपा को महाराष्ट्र में 122 सीटें मिली थी, वहीं इस बार मात्र 105 सीटें ही मिल पाई हैं। शिवसेना को भी पिछली बार 63 सीटें मिली थी जबकि इस बार उन्हें 56 सीटें ही मिल पाई हैं। वैसे इसमें यह कारण भी हो सकता है कि इस बार दोनों पार्टियां पहले से कम सीटों पर लड़ी हैं किंतु यह भी सही है कि कई स्थानों पर आपसी भिडं़त न होने के कारण इनके वोट जुड़ गए हैं।

कांग्रेस को पिछले चुनाव में 42 सीटें मिली थी जबकि इस बार 44 सीटें मिली हैं किंतु एनसीपी की सीटों की संख्या 41 से बढ़कर 54 हो गई है। इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि शरद पवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने से मराठा मतदाता नाराज हो गए। ऐसे कई कारण हो सकते हैं किंतु सच्चाई यही है कि कुल मिलाकर गठबंधन की सीटें 185 से कम होकर 161 पर आ गई हैं जबकि एनसीपी को 13 सीटों का लाभ हुआ है और कांग्रेस को 2 सीटों का लाभ हुआ है। इससे यह भी लग रहा है कि जनता को इन चुनावों में स्थानीय मुद्दे ही रास आए और राष्ट्रीय मुद्दों को जनता ने उतनी तवज्जो नहीं दी। वैसे भी एक ही मुद्दा बार-बार नहीं चलता जबकि भाजपा तब तक मुद्दों को पकड़े रहती है जब तक वे फुस्स न हो जाएं।

बालाकोट और धारा 370 जैसे मुद्दे लोकसभा चुनावों में भुनाए जा चुके थे और 6 मास पश्चात उनका वो प्रभाव नहीं रह सकता था किंतु भाजपा की रैलियों में बार-बार धारा 370 और पाक अधिकृत कश्मीर का मुद्दा ही उठता रहा। महाराष्ट्र में 8 मंत्री चुनाव हार गए जिनमें गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे भी शामिल हैं। इससे पता लगता है कि जनता इन मंत्रियों के कामकाज या जनसंपर्क से प्रसन्न नहीं थी।

उधर हरियाणा में भी कई मंत्री चुनाव हार गए और भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया। यद्यपि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और उसे पिछली 47 के मुकाबले इस बार 40० सीटें मिली जो बहुमत से 6 कम हैं। कांग्रेस को 31 और दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी को 10 सीटें प्राप्त हुई जबकि चौटाला के इंडियन नेशनल लोकदल को केवल एक सीट मिली।

चुनाव से पूर्व हरियाणा में कांग्रेस की हालत बहुत खराब थी। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पार्टी छोडऩे को तैयार बैठे थे क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर से उनकी पटरी मेल नहीं खा रही थी। जब सोनिया को पता चला कि बात यहां तक पहुंच गई है तो हुड्डा को दिल्ली बुलाया गया और उन्हें मजबूरी में पार्टी की कमान सौंप दी गई जिसके विरोध में अशोक तंवर ने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। केवल 6 सप्ताह के समय में हुड्डा ने मेहनत करके कांग्रेस की सीटें 15 से बढ़ाकर 31 कर दी। यद्यपि हुड्डा पिछला लोकसभा चुनाव सोनीपत से 1 लाख 64 हजार वोट से हारे थे किंतु इस बार वे पार्टी को आगे बढ़ाने में सफल हुए।

नई प्रदेश अध्यक्ष शैलजा ने भी उनके साथ सहयोग किया और दोनों ने मिलकर जाट दलित वोटों को अपनी ओर करने में सफलता पाई। अब हुड्डा सब गैर भाजपा विधायकों को एकत्र करने का प्रयास कर रहे हैं। वैसे हरियाणा में बेरोजगारी की स्थिति ने भी भाजपा की लोकप्रियता घटाने में सहायता की। खट्टर की पूरे राज्य की जन आशीर्वाद यात्र विशेष सहायता नहीं कर पाईं। राज्य की कई कर्मचारी यूनियनें खट्टर के विरूद्ध थीं और युवाओं का कहना था कि उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं। जाटों को आरक्षण न मिलने के कारण भी जाट भाजपा से नाराज थे।

इन चुनाव परिणामों ने भाजपा को चेतावनी दे दी है कि हर चुनाव को वह राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं जीत सकती। उसे राज्यों की स्थानीय समस्याओं को भी हल करने का प्रयास करना ही होगा क्योंकि स्थानीय मुद्दे विधानसभा चुनावों में काफी महत्त्वपूर्ण होते हैं। अब भाजपा को आने वाले चुनावों के लिए विशेष रणनीति बनानी होगी। दिल्ली में चुनाव बहुत निकट हैं और जनवरी में संभावित हैं। दिल्ली में मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार बैठे हैं। 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली, बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्र और मुफ्त पानी आदि देकर निम्नवर्गीय वोटों को खींचने में कामयाब हो सकते हैं। इसलिए भाजपा को स्पष्ट करना होगा कि वो जनता को मिल रही कोई सुविधा वापिस नहीं लेगी बल्कि और अधिक सुविधाएं देने का प्रयास करेगी।

दिल्ली से पूर्व झारखंड में भी चुनाव होने हैं। झारखंड में फिलहाल रघुवरदास मुख्यमंत्री हैं और उनके प्रशासन की परीक्षा होनी है। इसके पश्चात जम्मू और कश्मीर में भी चुनाव होने हैं। देखते हैं भाजपा मतदाताओं के संदेश को कितना समझ पाती है और उसके अनुरूप ऐसी नीतियां बना पाती है जिससे उसे चुनावों में लाभ मिल सके।

-अशोक गुप्त

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