प्रकाशोत्सव: गुरू नानक ने देशभक्ति का पाठ पढ़ाया

प्रकाशोत्सव: गुरू नानक ने देशभक्ति का पाठ पढ़ाया

गुरू नानक देव का भारतीय धर्म संस्थापकों एवं समाज सुधारकों में अत्यन्त ही गौरवशाली स्थान है। मध्य युग के संत कवियों में उनकी विशिष्ट और निराली परम्परा है। वे उस धर्म के संस्थापक हैं जिसके आंतरिक पक्ष में विवेक, वैराग्य, भक्ति, ज्ञान, योग, निष्काम, कर्मयोग और आत्मसमर्पण की भावना निहित है और बाह्य पक्ष में सदाचार, संयम, एकता, भ्रातृत्व आदि पिरोये हुए हैं।

मध्ययुग के संत कवियों में इतने सर्वागीण व्यक्तित्व वाले पुरूष का मिलना दुलर्भ है। वे मौलिक चिंतक, क्र ांतिकारी धर्म-सुधारक, अद्वितीय युग-निर्माता, महान देश भक्त, दीन-दुखियों के परम हितैषी तथा दूरदर्शी राष्ट्र निर्माता थे।

गुरू नानक के प्रादुर्भाव के समय देश की स्थिति बहुत ही गंभीर और चिंताजनक थी। राजनीतिक स्तर पर देशवासियों की हालत अत्यन्त ही शोचनीय थी पांच-छ: सौ वर्षों के विदेशी शासन ने उनमें अधोगति पैदा कर दी थी।

डॉ. गोकुल चन्द नारंग के शब्दों में हिन्दू धर्म का पवित्र ज्ञान स्रोत व्यर्थ रस्मों, अर्थहीन कर्मकांडों, पुजारियों की स्वार्थपरायणता व जनता की अज्ञानता के कारण शुष्क हो चुका था। हिन्दू धर्म की पवित्रता वर्णो और भेदभाव के बोझ तले दब चुकी थी।

एक सच्चा देशभक्त होने के कारण गुरू जी के मन में मातृभूमि के प्रति असीम और प्रगाढ़ प्रेम था। उन्होंने देश की दुर्दशा पर सभी पहलुओं से विचार किया।

स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांतों का प्रचार करने के कारण गुरू जी सिकंदर लोदी के सैनिकों द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये। उनकी शिक्षाएं दिल्ली साम्राज्य के लिये खतरनाक समझी गयी क्योंकि सिकंदर लोदी धर्मांध और असहिष्णु शासक था। लोदी के धार्मिक कट्टरपन का कोपभाजन कबीर, नामदेव, रविदास जैसे संतों को भी होना पड़ा था। उसने गुरू जी को मर्दाना के साथ जेल में डाल दिया जहां गुरू जी को चक्की पीसने को दी गयी।

गुरू जी ने जब वहां अन्य साधु-संतों और फकीरों को चक्की पीसते देखा तो उनका कोमल हृदय पसीज गया। उन्होंने मर्दाना से खाब बजाने को कहा और खुद भजन गाने लगे। उस संगीत और भजन ने जेल में ऐसा जादू किया कि जहां कैदी चक्की पीसना भूल गये, वहां पहरेदारों के चाबुक हाथों से छूट अये और कठोर दिल सिकंदर लोदी का हृदय पसीज गया और वह गुरू जी के चरणों में गिर पड़ा। क्षमा याचना करने लगा।

गुरू जी ने उसे सभी कैदियों केा रिहा करने का कहा और उसे भ्रातृत्व का रहस्य समझाया। इस रहस्य ने सिकंदर लोदी का पूरा जीवन ही बदल डाला और उसे अहसास हो गया कि राजा के अपनी प्रजा प्रति के क्या-क्या कर्तव्य होते हैं।

गुरू जी धार्मिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार के प्रबल आलोचक थे। वे बड़े ही बेबाक तरीके से झूठ को झूठ और सत्य को सत्य कहने की हिम्मत रखते थे। उनके प्रवचनों ने बाबर तक को बदल डाला। गुरू जी ने जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त बुराइयों और कुरीतियों की ओर समाज का ध्यान खंींचा है और मानव को सही मार्गदर्शन देने का प्रयास किया है। उन्होंने राजनीतिक चेतना से लेकर अध्यात्मिक चेतना तक जगाने की कोशिश अंत तक जारी रखी है। इसी से अभिभूत होकर ही डॉ. इकबाल ने गुरू जी के बारे में लिखा है:

''फिर उठी आखिर, सदा तौहीदी की पंजाब से।

हिंद को इक मरद-ए-कामल ने जगाया ख्वाब से।''

-रमेश सिंह

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