पर्यटन: भारतीय कला वैभव का प्रतीक-खजुराहो

पर्यटन: भारतीय कला वैभव का प्रतीक-खजुराहो

भारत के कलात्मक मंदिरों में श्रेष्ठ कहलाने वाले खजुराहो के मंदिर मध्य प्रदेश के छतरपुर इलाके में स्थित हैं। महोबा के चंदेलवंशी राजाओं के शासन काल में इन मंदिरों का निर्माण हुआ था। दसवीं सदी में सत्तासीन होने वाले ये चंदेलवंशी अपनी वीरता के साथ ही सुशासन तथा कलात्मक निर्माणों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। लगभग तीन सौ साल के शासन काल में इन्होंने देवी-देवताओं के अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराया।

उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि खजुराहो समूह के मंदिरों का निर्माण ग्यारहवीं सदी के समय हुआ था। मंदिरों के शिल्प तथा वास्तुकला को देखकर कई इतिहासकार इसे गुजराती स्थापत्य कला का नमूना मानते हैं।

इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि डा. गौरीशंकर ओझा के अनुसार खजुराहो के मंदिरों का निर्माण गुजरात के सौराष्ट्र से आए सोमपुरा समुदाय के शिल्पियों द्वारा किया गया है। ये लोग सुप्रसिद्ध मंदिर सोमनाथ के इलाके के मूल निवासी थे लेकिन सन 1026 ई. में महमूद गजनवी के आक्र मणों से परेशान होकर इस क्षेत्र में भाग आए। इनको यहां राजाश्रय भी मिला और मंदिर निर्माण का मौका भी। इतिहासकार के इस कथन की पुष्टि डूंगरपुर के पास देव सोमनाथ मंदिर के देखने से होती है जिसका निर्माण गुजरात की प्रसिद्ध नागर शैली में किया गया है।

खजूर और करील के कंटीले वृक्षों वाले छतरपुर के इस इलाके में मूलत: छोटे बड़े अस्सी(80) मंदिर थे जिनमें अब केवल बाइस(22) उचित स्थिति में विद्यमान हैं। इन मंदिरों के साथ यह भी आश्चर्यजनक तथ्ंय जुड़ा है कि ये मंदिर किसी एक संप्रदाय के नहीं हैं। इनमें शैव, वैष्णव तथा जैन मंदिरों को एक समान प्रतिष्ठा दी गई है जो निर्माण कर्ताओं के सर्वधर्म समभाव की श्रेष्ठ भावना का परिचायक है। खजुराहो के कतिपय मंदिरों में दर्शकों को आश्चर्यचकित करने वाली कामकला में रत नर-नारियों की अनेक प्रतिमाएं मिलती हैं।

मंदिर की दीवारों पर रति-रंग में लिप्त प्रतिमाओं को किस उद्देश्य से उभारा गया है, यह बात अब तक उलझनपूर्ण है। कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि मैथुनरत प्रतिमाओं को मंदिरों की दीवारों पर प्रदर्शित कर वे इंद्र देवता को आकर्षित करके भारी वर्षा और ब्रजपात से रक्षा करना चाहते थे। अन्य स्थानों पर इतिहासकारों का मत है कि चंदेल राजवंश तंत्र -साधना में विश्वास रखता था और ऐसी मैथुनरत युगल मूर्तियां उसी के प्रभाव स्वरूप निर्मित की गई हैं।

खजुराहो समूह के मंदिरों को शैव, वैष्णव तथा जैन के वर्गों में विभक्त किया जाता है लेकिन मुख्य वर्ग, पश्चिम तथा पूरबी समूह के रूप में क्र मबद्ध किए गए हैं। यहां का प्रमुख शैव मंदिर कंदरिया महादेव पश्चिमी समूह में है। इसी के साथ वैष्णव देवालय लक्ष्मण मंदिर है जबकि सबसे विशाल जैन मंदिर पार्श्वनाथ पूर्वी समूह में स्थित है।

आरंभिक काल में निर्मित खजुराहो के मंदिर दानेदार ग्रेनाइट पत्थर के हैं जबकि पश्चिमी समूह के अधिसंख्यक मंदिरों का निर्माण पीले तथा गुलाबी बलुआ पत्थरों से किया गया जिसे निकट के पन्ना की पहाडिय़ों से लाया गया था।

पश्चिमी समूह के मंदिरों में कंदरिया महादेव चंदेल शिल्पकला का श्रेष्ठ प्रतीक है। करीब बत्तीस(32) मंदिर ऊंचे इस शिवालय के मध्य में प्रतिष्ठित है। मंदिर की छत तथा दीवारों पर अनेक देवी-देवताओं की सुसज्जित और सुंदर प्रतिमाएं हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर सुडौल तथा नक्काशी वाले स्तंभ हैं। महराबयुक्त प्रवेश द्वार के बाद बरामदे तथा सुंदर प्रकोष्ठ से होकर मंदिर के केंद्र स्थल पर जाया जाता है। कंदरिया महादेव मंदिर के अंदर तथा बाहर की दीवारों पर अनेक आकर्षक प्रतिमाएं हैं जिन्हें देखकर कोई भी कला पर पारखी मुग्ध हो जाता है।

चौसठ योगिनी के नाम से प्रसिद्ध मंदिर खजुराहो के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। देवी महाकाली को समर्पित इस जीर्ण मंदिर में चौसठ (64) तोरणों में विभिन्न मुद्राओं में चौसठ प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं जो शक्ति साधना की प्रतीक हैं।

यहां से थोड़ी दूरी पर अलग से लक्ष्मण मंदिर है जो तत्कालीन वास्तुकला का उत्तम नमूना है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसका निर्माण चौंसठ योगिनी मंदिर के लगभग पचास (50) वर्षों बाद किया गया था। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है जिसके प्रवेश द्वार पर ही त्रिमूर्ति अर्थात ब्रहमा, विष्णु, महेश के दर्शन होते हैं। मंदिर के गर्भ गृह में व दीवारों पर दशावतार की प्रतिमाएं अलग-अलग मुद्राओं में बनाई गई हैं। विशेषकर नरसिंह तथा वराह अवतार की मूर्तियां विशेष रूप से आकर्षित करती हैं।

खजुराहो के पश्चिमी समूह के मंदिरों में आगे की ओर चित्रगुप्त मंदिर है। बलुआ पत्थरों से निर्मित यह भव्य मंदिर आदित्य यानी सूर्यदेव को कलात्मक रूप से प्रस्तुत करता है। पूरब की दिशा में इसका भव्य प्रवेश द्वार है तथा केंद्र में रथ पर सवार सूर्यदेव की आदमकद सुंदर प्रतिमा है। इसके बाद ब्रह्मदेव को प्रतिष्ठा देने वाला भव्य मंदिर विश्वनाथ है। मंदिर के केंद्र में त्रिमुख ब्रह्मा का मंदिर है। ऊंचे चबूतरे पर बने इस मंदिर की उत्तरी द्वार पर सजीव दिखने वाली सिंह मूर्तियां हैं तथा दक्षिणी द्वार पर हाथियों की सुंदर मूर्तियां पर्यटकों का स्वागत करती हैं।

यहां के मंदिरों के समूह में स्थित भव्य मतंगेश्वर मंदिर की प्रतिष्ठा स्थानीय लोगों में अधिक है और अब भी इसकी पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर के गर्भगृह में पत्थर का विशाल शिवलिंग स्थापित है जिसकी ऊंचाई दस (10) फुट के करीब तथा व्यास 20 फुट से अधिक है। ऐसी मान्यता है कि भारत के विशालतम शिवलिंगों में से एक यह मतंगेशवर महादेव आज भी जागृत स्थिति में है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

दूसरी ओर पूरबी समूह के मंदिरों की ओर पहुंचने के लिए खजुराहो गांव को पार करके जाना पड़ता है। इस इलाके में मुख्यत- जैन संप्रदाय के मंदिर हैं। इनमें आदिनाथ, पार्श्वनाथ और शांतिनाथ के मंदिर मुख्य हैं। पत्थर के चबूतरों पर स्थित से मंदिर उत्तुंग शिखरों से विभूषित हैं। जैन मंदिरों का यह पूरबी समूह एक ऊंचे घेरे के अंदर है। ये तुलनात्मक रूप में बाद के बने हैं और आज भी अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में हैं। इनमें पार्श्वनाथ मंदिर प्रमुख है जिसके केंद्र में काले संगमरमर से निर्मित पार्श्वनाथ की नई प्रतिमा 1860 में स्थापित की गई थी। इस मंदिर की दीवारों तथा परकोटे में यक्ष और अप्सराओं की सुंदर और सुडौल प्रतिमाएं सजी हैं। यहीं उन्नत वक्षस्थल से युक्त एक युवती की प्रसिद्ध प्रतिमा है जो अपने पांव से कांटा निकालने की भावमुद्रा में है। खजुराहो शिल्पकला के प्रतीक स्वरूप इस मूर्ति को काफी लोकप्रियता मिली है। इसके साथ ही नयनों में काजल लगाती एक सुंदर अप्सरा की प्रतिमा है जिसकी सौम्यता देखकर दर्शकगण भाव विभोर हो उठते हैं।

इनसे अलग हटकर खड़ा एक पुराना जैन मंदिर है जिसके अनेक स्तंभों पर सुंदर नक्काशी की गई है। प्रत्येक खंभे पर जंजीरों के मध्य घंटियां दिखाई गई हैं। इसी कारण लोगों ने इसे घंटायी मंदिर कहकर पुकारना शुरू कर दिया है। इस जैन मंदिर में भगवान महावीर की माता के सोलह(16) दिव्य सपनों का दृश्य प्रदर्शित किया गया है।

जैन संप्रदाय के मंदिरों में अपेक्षाकृत बाद में बना मंदिर आदिनाथ का है। ऐसा प्रतीत होता है कि मंदिर के केंद्र स्थान में जैन तीर्थंकर आदिनाथ की प्रतिमा स्थापित की गई है। मुख्य प्रतिमा के अलावा इस मंदिर में यक्ष यक्षिणियों की भावमुद्रा में निर्मित अनेक प्रतिमाएं दर्शनीय हैं।

खजुराहो से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है- दुलादेव तथा चतुर्भुज मंदिर। इनमें महादेव शिव की प्रतिमा भगवती पार्वती के साथ प्रतिष्ठित है। चतुर्भुज मंदिर चंदेल राजवंश के द्वारा संभवत: खजुराहो का आखिरी निर्माण है। मंदिर में मुख्य प्रतिमा के अलावा अप्सराओं की अनेक नृत्यरत तथा रतिक्रि या में मग्न सजीव दिखने वाली मूर्तियां हैं।

मध्यकालीन भारत में निर्मित खजुराहो के ये मंदिर शिल्पकला के श्रेष्ठ प्रतिमान हैं तथा चंदेल राजवंश की आराधना, कलाप्रियता और गौरव के कालजयी स्तंभ हैं। इस स्थल पर शैव, वैष्णव तथा जैन संप्रदायों को एक साथ उद्भासित करने वाले ये मंदिर अब भी सर्वधर्म समभाव का पावन संदेश दे रहे हैं।

इन मंदिरों में भारतीय तथा विदेशी दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देने वाली अनेक प्रकार की मैथुनरत प्रतिमाएं हैं। आध्यात्मिक भावभूमि के एक दीवार पर दिव्य आराधना तथा नर-नारियों की कामक्रीड़ा का ऐसा प्रदर्शन संसार के अन्य देशों में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। दार्शनिकों तथा तंत्र वि़द्या के साधकों के अनुसार यहां नारी को दिव्य शक्ति और सृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिससे पुरूष सनातन के संयोग से वंश परंपरा चलाई जाती है।

दूसरा मत तांत्रिक क्रि या के अनुसार कुंडलिनी जागरण की साधना है जिसमें कटिस्थल या योनिद्वार से ऊर्घ्वगामी क्र म में मस्तक तक आठ स्तर चक्र मानव शरीर में होते हैं। क्र मश: संभोग से ऊपर उठकर मस्तक तक पहुंचने के साथ ही कुंडलिनी जगाने की प्रक्रि या पूर्ण होती है तब दिव्य प्रकाश तथा आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्ति की मधुमती भूमिका आरंभ होती है।

उल्लेखनीय है कि खजुराहो के मंदिरों में पूजनीय देवी-देवताओं के साथ शक्तिरूपा तथा सृष्टि वाहिनी नारी को अनेक प्रकार की विभिन्न भावमुद्राओं में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया गया है। शिल्पकारों के कला कौशल और निर्माण कार्य की प्रवीणता ने जैसे पत्थरों को सजीव बनाने का चमत्कार किया है। मातृशक्ति का आराध्य रूप, नृत्यरत चंद्रमुखी, श्रृंगाररत नायिका, सुडौल स्तनों से संतान को दुग्धपान कराती वात्सल्यपूर्ण भावमुद्रा, दर्पण में सौंदर्यनिहारती मुग्धा, परनारी- संभोग देख लाजवंती नायिका, स्थूल नितंबिनी मैथुनरत कामिनी, विस्मय मुद्रा में पत्र लिखती नारी के अलावा और जितने रूप संभव हो सकते हैं। शिल्पकारों ने सबको प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है।

जहां तक इसके नाम खजुराहो की बात है , अनुमान है कि इस इलाके में पाए जाने वाले खजूर वृक्ष की बहुतायत से खजुराहो का नाम पड़ा होगा। स्वतंत्रता के बाद , खजुराहो की ओर अधिक ध्यान दिया गया। इसे अब एक लोकप्रिय पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया गया है। सांस्कृतिक वैभव को उजागर करने के लिए यहां पर प्रतिवर्ष खजुराहो समारोह के नाम से सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन किया जाता है।

कैेसे पहुंचे, कहां ठहरें

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो पहुंचने के लिए दिल्ली से वायुयान सेवा उपलब्ध है। वहां विमानपतन(एयरपोर्ट) है किंतु रेल स्टेशन नहीं है। रेल स्टेशन छतरपुर से 44 किलोमीटर तथा पन्ना से 30 किलोमीटर पक्की सड़क द्वारा खजुराहो पहुंचा जा सकता है।

भारत सरकार तथा राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा खजुराहो को एक सुंदर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। सरकारी पर्यटक निवास के अलावा यहां आधुनिक पांच सितारा होटल भी है। इनके अलावा ठहरने के तथा घूमने के लिए समुचित सुविधाएं उपलब्ध हैं।

- राधाकांत भारती

Share it
Top