बहस: भ्रष्टाचार की वजह से गरीबों को नहीं मिल पा रहा है योजनाओं का लाभ

बहस: भ्रष्टाचार की वजह से गरीबों को नहीं मिल पा रहा है योजनाओं का लाभ

कहने के लिए भले लोग कहें कि मानवता सब के मन में होनी चाहिए लेकिन आज यह केवल कहने मात्र के लिए रह गई है। मानवता आज केवल दिखावा है। कुछ लोग हैं जो आज भी मानवता के लिए कार्य करते हैं और समाज के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करते है लेकिन ज्यादातर लोग मानवता के नाम पर ढोंग करते हैं और अपनी स्वार्थसिद्धि और मानवता का चोला ओढ़ते हैं।

आज समाज में हम देखते हैं कि न जाने कितने विवश, गरीब, कमजोर अपनी स्थिति को लेकर परेशान हैं लेकिन सिस्टम के लोग हैं कि उनको कोई परवाह नहीं है। केवल अपनी कागजी खानापूर्ति करने में जुटे हैं। आज देखा जा सकता है कि सरकार की जो योजनाएं गरीबों के लिए बनी हैं, उनपर अधिकारियों और जिम्मेदार की लापरवाही और मिलीभगत से अपात्र लोग कुंडली मारकर बैठे हैं और योजनाओं का दुरूपयोग कर रहे हैं। सरकार ने खाद्य सुरक्षा अधिनियम बनाकर इसके तहत सभी गरीबों को राशन देने की बात कही है लेकिन कुछ ऐसे भी मामले हैं कि प्रशासन की लापरवाही से पात्र को अन्त्योदय कार्ड नहीं जबकि अपात्र को अन्त्योदय कार्ड मिले हैं।

प्रशासन की लापरवाही के वजह से ही पात्र व गरीब को नमक से खाने के लिए रोटी नहीं है जबकि अपात्र अन्त्योदय कार्ड धारक अपने यहां जन्मदिन की पार्टी करता है और पार्टी में दो सौ लोग भोजन करके जन्मदिन में सम्मिलित होते हैं। आखिर यह कैसी मानवता या सिस्टम है विभाग में बैठे लोगों की। कमाबेेश ऐसी ही स्थिति आपको बहुत जगह मिल जायेगी जहां अपात्र सरकारी योजना का दुरूपयोग कर रहा है जबकि पात्र केवल योजनाओं के लिए तरस कर गरीबी की जंग लड़ रहा है। इसमें सरकार को दोषी बताना गलत है। यहां पर स्थानीय स्तर पर बैठे लापरवाह व भ्रष्ट अधिकारियों की मिली भगत व लापरवाही से गरीब व पात्रों के साथ अन्याय होता है और अपात्र व सम्पन्न सरकारी योजना का दुरूपयोग करता है।

इस गलत व्यवस्था के पीछे कहीं न कहीं लोगों की स्वार्थपरता व भ्रष्टाचार है क्योंकि आज सभी ग्रामप्रधानों और अधिकारियों व कर्मचारियों को अवैध पैसों की भूख है जिसके लिए सरकारी योजनाओं पर अपात्र लोगों का कब्जा होना लाजमी है क्योंकि सबको पैसा चाहिए। पैसा तो शायद ही पात्र व गरीब दे पाये लेकिन अपात्र व सम्पन्न लोग इधर-उधर से व्यवस्था करके सुविधा शुल्क के रूप में निश्चित अवैध धनराशि देकर सरकारी योजना के पात्रता में जगह बना लेंगे। यह पैसा केवल ग्रामप्रधान ही नहीं लेते। यह अवैध पैसा जिला स्तर के अधिकारियों तक जाता है।

हालांकि इस बात पर ग्रामप्रधान और अधिकारियों को तिलमिलाहट हो सकती है लेकिन सोलह आने सच है कि योजनाओं के पीछे पैसे का खेल होता है। यह प्रमाण भी है जो इसकी पोल खोल सकता है। चुनाव के समय यही ग्रामप्रधान दूध का धुला होता है और बाद में नाले से नहा लेता है। इसके पीछे ग्रामप्रधान की गलती नहीं है बल्कि जिला और ब्लाक स्तर पर बैठे अधिकारियों और कर्मचारियों की वजह से ग्रामप्रधान विवशता वश अपने गांव के लोगों से योजनाओं के लिए अवैध पैसा लेकर योजनाओं को अमली जामा पहनाता है। यदि ग्राम प्रधान अधिकारियों का विरोध करेगा तो उसके गांव का विकास कार्य प्रभावित होगा जिसके लिए उसे फिर नोटिस का सामना करना पडेगा।

चन्द पैसों के लिए अपना ईमान बेचने वालों को यह ध्यान होना चाहिए कि योजनाओं का फायदा यदि सच में पात्र व्यक्ति को मिलेगा, तभी सरकार की मंशा पूर्ण होगी। अधिकारियों को भी चाहिए कि सरकार तो उन्हें इतना वेतन व सुविधा दे रही है कि उनको कोई कमी नही हैं। कम से कम गरीबों को भी उनके हक की चीजों को दिलाने में सहयोग करना चाहिए। जो गरीबों के हक की चीज को किसी अपात्र को दे रहे हैं। वे मानवता का गला दबाकर अपना भविष्य खराब कर रहे है। गरीबों को योजनाओं का लाभ मिलें, यही हर ग्रामप्रधान व सम्बन्धित अधिकारी का उद्देश्य होना चाहिए न कि अपने छोटे से स्वार्थ के लिए मानवता का गला दबायें।

यदि हम अपने स्तर से पात्र व गरीब को मदद नहीं कर सकते तो उनके लिए आई सरकारी योजनाओं का लाभ उनसे न छीनें। यह ध्यान रहे कि अपात्रों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना देशद्रोह व गद्दारी है जबकि पात्र व गरीब को सरकारी योजना का लाभ दिलाना देशभक्ति। अब यह निश्चित करना है कि आजाद भारत में हमें गद्दार बन कर काम करना है या एक देशभक्त।

- संतोष कुमार तिवारी

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