विश्लेषण: मोदी सरकार की प्राथमिकता

विश्लेषण: मोदी सरकार की प्राथमिकता

2019 के आम चुनाव में पूर्व की तुलना में और ज्यादा बहुमत से जीती मोदी सरकार की पहली प्राथमिकता क्या होनी चाहिए ? इस सम्बन्ध में लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है। बहुत लोग कह सकते हैं, पूरे देश में संक्र ामक रूप से और कैंसर की तरह व्याप्त भ्रष्टाचार का उन्मूलन मोदी सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। बहुत से लोगों का मानना हो सकता है कि देश में व्याप्त भयावह बेरोजगारी को दूर करना और जन-जन को रोजगार दिलाना मोदी सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। बहुत से लोगो का सोचना होगा कि देश में अलगाववाद की प्रवृत्ति पूरी तरह से समाप्त होनी चाहिए और आतंकवाद का नामोनिशान नहीं रहना चाहिए। बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी होगी जो यह कह सकते हैं कि देश की सुरक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत होनी चाहिए कि चीन और पाकिस्तान जैसे शत्रु राष्ट्र हमें आँख दिखाने की हिम्मत न कर सकें।

उपरोक्त सब बातें अपनी जगह पर ठीक हैं। मोदी सरकार वर्ष 2014 से ही उपरोक्त विषयों पर गम्भीरता से कार्य कर रही है। भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में यह दावे से कहा जा सकता है कि वर्ष 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से देश के नागरिकों ने किसी घोटाले के बारे में नहीं सुना। भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों को मोदी सरकार जिस ढ़ंग से सेवा से पृथक कर रही है, काला धन रखने वालों के विरूद्ध कठोर कानून बनाये जा रहे हैं और छापेमारी की जा रही है। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में मोदी सरकार युद्ध स्तर पर प्रयास कर रही है।

इसी तरह से बेरोजगारी दूर करने के लिये मुद्रा योजना एवं दूसरी योजनाओं के माध्यम से 12-13 करोड़ लोगों को बैंकों से ऋण प्रदान किये गये हैं जिसके चलते देश का एक बड़ा हिस्सा स्वरोजगार कर रहा है। कश्मीर घाटी जैसी जगह में जहां अलगाववादी फलते-फूलते रहते थे, वहां उनके धन आने के अवैध स्रोत को समाप्त ही कर दिये गये हैं। कइयों को जेल की चारदीवारी में बन्द कर दिया गया है। 2014 के पूर्व जहां आये दिन शहरों में बम धमाके होते रहते थे, वहीं मोदी सरकार के आने के बाद ये बम धमाके कश्मीर घाटी के दो-तीन जिलों को छोड़कर पूरी तरह बन्द हो चुके हैं।

जहां तक देश की सुरक्षा का प्रश्न है मोदी सरकार में आधुनिकतम् हथियारों को दूसरे देशों से खरीदा भर नहीं है, मेक इन इण्डिया के तहत उन्हें भारत में भी बनाया जा रहा है। मोदी सरकार के दौर में देश की सुरक्षा व्यवस्था इतनी प्राथमिकता में है कि जून 2016 में डोकलाम में भारतीय सेनाएं चीन की सेना के समक्ष सीना तानकर खड़ी हो गई थीं तो अंतत: चीन को पीछे हटने को बाध्य होना पड़ा था। पाकिस्तान से भी पुलवामा का बदला बालाकोट से लिया गया। अलगाववाद समाप्त करने की दिशा में कार्य करने के चलते 'तीन तलाक' की समाप्ति मोदी सरकार के प्रमुख एजेण्डे में है। इसी तरह 2019 के घोषणा पत्र में 'कामन सिविल कोड लागू करने एवं कश्मीर में धारा 370 समाप्त करने को लेकर भाजपा ने प्रतिबद्धता जताई है जिस पर प्रक्रि या शुरू भी हो चुकी है। बहुत से लोगों के मत में राम मंदिर निर्माण भी मोदी सरकार के लिये प्राथमिकता सूची में होगा पर चूँकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, अत: आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि राम मंदिर के प्रश्न का सकारात्मक समाधान शीघ्र ही देखने को मिलेगा।

ऐसी स्थिति में लोगों के दिलो-दिमाग में यह प्रश्न बहुत प्रमुखता से उठना चाहिए कि ऐसी स्थिति में मोदी सरकार की पहली प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? निश्चित रूप से देश के बहुत से प्रबुद्ध एवं जिम्मेदार लोगों की राय में प्राथमिकता होनी चाहिए- देश में जनसंख्या नियंत्रण। सच्चाई यह है कि विश्व में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले देश चीन को भी 2027 तक में हम पीछे छोड़कर नम्बर 1 में आ जायेंगे। वैसे भी वर्तमान में जहां भारत की आबादी 1 अरब 36 करोड़ है, वहीं चीन की आबादी मात्र 6 करोड़ ज्यादा 1 अरब 42 करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अर्थव्यवस्था और सामाजिक मामलों के विभाग (यूएन-डीईएसए) में गत दिनों जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2050 तक भारत 164 करोड़ जनसंख्या के साथ शीर्ष पर आ जायेगा।

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अब वह समय आ गया है कि जब भारत को आबादी पर नियंत्रण करने के ठोस उपाय करने चाहिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में आबादी बढऩे की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है जिसे अगले 10 वर्षों में नियंत्रित करने की रणनीति भारत को बना लेनी चाहिए वर्ना उसके संसाधन आबादी के बोझ को नहीं सह पायेंगे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फिलहाल चीन की आबादी भले ही ज्यादा हो लेकिन वहां जमीन की उपलब्धता प्रति व्यक्ति भारत से ज्यादा है। जितनी जमीन भारत के 4 नागरिकों के पास है, उतनी जमीन चीन में 1 नागरिक के पास है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस मामले में भारत को चीन से सबक सीखना चाहिए क्योंकि चीन ने आबादी नियंत्रण की दिशा में ठोस योजनाएं चलाई हैं। खासतौर पर उसने जनसंख्या नीति ही कठोरता से लागू कर दी जिसके तहत किसी दंपति के 2 से ज्यादा बच्चे होने पर नागरिक सुविधाओं से वंचित करने का प्रावधान कर दिया गया है जिसका नतीजा है, चीन में जनसंख्या दर बढऩे में तीव्र कमी आई है।

स्थिति यह है कि यदि भारत ने जनसंख्या वृद्धि रोकने की दिशा में ठोस एवं सख्त कदम नहीं उठाये तो बढ़ती आबादी देश में कई चुनौतियां प्रस्तुत करेंगी। अगले 40 वर्षों में भारत के समक्ष अपने नागरिकों को रोजगार, ऊर्जा, आवास, आधारभूत संरचना के साथ पानी तक उपलब्ध कराने की जटिल समस्या होगी। 2050 तक भारत में शहरी जनसंख्या में 49 करोड़ 70 लाख की वृद्धि होगी। आज भारत में प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन को लेकर बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं पर हमें यह समझना होगा कि जनसंख्या वृद्धि भी जलवायु परिवर्तन को प्रभावित कर रही है। आबादी बढऩे से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी बढ़ता है जिससे प्रदूषण जैसी समस्याएं भी बढ़ती हैं।

आज लोगों यह समझाने की जरूरत है कि जनसंख्या वृद्धि देश के लिये घातक तो है ही, स्वत: उनके लिये भी समस्याएं बढ़ाने वाली है। देश की आबादी में प्रत्येक वर्ष 8० लाख की दस से बढ़ोत्तरी हो रही है। बढ़ती आबादी के चलते कृषि योग्य भूमि आवासीय जरूरतों की पूर्ति हेतु दिनोंदिन घटती जा रही है। झील, तालाब, बावड़ी, कुओं का अतिक्र मण के चलते नामोनिशान मिटता जा रहा है। प्रबल आश्ंका है कि तापमान में बढ़ोत्तरी आने वाले दिनों में अपने चरम पर जा पहुंचेगी जिसके चलते धु्रवों की बर्फ तेजी से पिघल जायेगी और समुद्र का जल स्तर बढ़ जायेगा। इसके चलते एक करोड़ प्रजातियों में से करीब 20 करोड़ प्रजातियां लुप्त हो जायेंगी।

देश में जनसंख्या नियंत्रण नीतियों का दुखद परिणाम ही है कि सदी के अन्त तक भारत की आबादी का आकड़ा 150 करोड़ हो जायेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक दुनिया के जिन 9 देशों में दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी की बढ़ोत्तरी होगी, उनमें भारत शीर्ष पर होगा। खास तौर में जब भारत विश्व के भुखमरी सूचकांक में 119 देशों में 103 वें स्थान पर है तो यह बढ़ती आबादी देश की प्रगति को बुरी तरह से प्रभावित करेगी।

देश की जनसंख्या बढऩे के कारकों में अज्ञानता, उदासीनता और लापरवाही एक बड़ा कारक तो है ही। यह जनसंख्या विस्फोट भी दो स्तरों का है- एक तो सामान्य तौर से बढ़ती जनसंख्या, दूसरी देश में हिन्दुओं के अनुपात में बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या। हकीकत यही है कि वोट बैंक की राजनीति के चलते परिवार नियोजन सम्बन्धी नीतियों को सख्ती से नहीं लागू किया गया। इसके अलावा मुस्लिम जनसंख्या सोद्देश्य जिस ढंग से बढ़ाई जा रही है वह भी देश के लोकतंत्र और पहचान के लिये एक बड़ा खतरा है।

1947 में देश के विभाजन के बाद देश में 9 प्रतिशत मुस्लिम आबादी थी जो वर्तमान में 14 प्रतिशत से ज्यादा हो चुकी है। निस्संदेह इसके पीछे जहां हिन्दुओं और अन्य की तुलना में मुस्लिमों में प्रजनन दर ज्यादा है, वहीं बांग्लादेशी घुसपैठ एक बड़ा कारण है जिसके चलते असम के सीमावर्ती 8 जिले मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार असम में मुस्लिम जनसंख्या 34 प्रतिशत तक पहुंच गई है। पश्चिम बंगाल में भी मुस्लिम जनसंख्या 30 प्रतिशत तक जा चुकी है और यहां के भी कुछ सीमावर्ती जिले मुस्लिम बहुल हो चुके हैं।

स्थिति यह है कि ऐसी जगहों में हिन्दू अत्याचार के शिकार हैं और अपने घर-जमीन औने-पौने दामों में बेचकर भाग रहे हैं। फ्रेंच इतिहासकार आगस्टस कोने ने कहा था- 'जातियों की जनसंख्या राष्ट्रों की नियति होती है'। कभी अफगानिस्तान भी हिन्दू बहुल था, पाकिस्तान में भी हिन्दुओं की प्रभावी आबादी थी पर आज इन जगहों में नाम मात्र के हिन्दू बचे हैं। अपने देश में अपनी ही गलतियों के चलते कश्मीर घाटी हिन्दू विहीन हो चली है। ऐसी स्थिति में जनसंख्या नीति के तहत भी यह जरूरी है कि घुसपैठियों को तत्काल देश से निकाला जाए और यदि ऐसा फिलहाल संभव न हो तो इन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित किया जाए।

तस्वीर का एक स्याह पहलू यह भी है कि हमारे देश में जातियों की संख्या के आधार पर आरक्षण की नीति तो लागू है ही। जातियों की संख्या के आधार पर सिर्फ आरक्षण मांगे ही नहीं जा रहे बल्कि उसके आधार पर बड़े-बड़े आन्दोलन भी हो चुके हैं। महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पाटीदार, हरियाणा में जाट, राजस्थान में गूजर इसके बड़े उदाहरण हैं। इसका एक पहलू यह भी है कि जातियों के संख्या के आधार पर राजनैतिक दलों से सिर्फ चुनाव में टिकट मांगे ही नहीं जाते बल्कि एक हद तक दिये भी जाते हैं पर बड़ी बात यह है कि देशवासियों को पता है कि मोदी सरकार देशहित में कठोर से कठोर फैसला ले सकती है। ऐसी स्थिति में निकट भविष्य में यह अपेक्षा की जा सकती है कि- 'हम दो, हमारे दो' नीति के तहत कठोरता से निकट भविष्य में जनसंख्या नीति लागू हो सकती है। सिर्फ देश को आगे ले जाने के लिये ही नहीं, देश को बचाने के लिये भी यह कदम नितांत जरूरी है।

- वीरेन्द्र सिंह परिहार

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