रक्षाबन्धन विशेष: रक्षा के संकल्प का पावन पर्व

रक्षाबन्धन विशेष: रक्षा के संकल्प का पावन पर्व

रक्षाबन्धन का पावन पर्व भारतीय संस्कृति में बहन और भाई के प्रेम प्रतीक के रूप में शुचितापूर्ण मर्यादाओं को जीवंत करता है। रक्षाबन्धन में निहितार्थ यह है कि पारस्परिक प्रेम के बंधनों से रक्षा होती है। पवित्र प्रेम व स्नेह सूत्र में बांधने की यह परंपरा बहुत ही पवित्र, मर्मस्पर्शी, भावभीनी व श्रद्धा से परिपूर्ण है। नारी के अधिकारों की रक्षा का पवित्र संकल्प ही रक्षाबन्धन है। अफसोस की बात है कि जिस समाज में रक्षाबन्धन जैसा पवित्र पर्व हो, वहीं मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है, आज हमारी बहनें कहीं भी सुरक्षित नहीं है। समाज की अनेक कमजोरियों एवं बुराइयों ने उनका जीवन दूभर कर दिया है। कहीं उनकी आबरु लूटी जा रही है तो कहीं उन्हें गर्भ में मारा जा रहा है। कहीं वह दहेज प्रताडऩा का शिकार हो रही हैं, तो कहीं उन्हें वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेला जा रहा है। और भी न जानें कितनी भीषण यातनाएं हैं जिन्हें चुपचाप बहनें झेलने को विवश हैं।

आधुनिकता एवं इंटरनेट युग के पल-पल बदलते परिवेश में आत्ममुग्धता से बौराई नई पीढ़ी नैतिकता व मर्यादाओं को भूल रक्षाबंधन की आड़ में घर एवं समाज की आंख में धूल झोंक रहे हैं। राखी को महज मौज मस्ती का सामान समझ कर इस पवित्र बन्धन को कलंकित कर रहे हैं। रक्षाबन्धन का अर्थ केवल एक मिठाई का डिब्बा, कुछ उपहार या रुपए नहीं, इसके अलावा और भी बहुत कुछ है इन रेशमी धागों में। रक्षाबन्धन स्नेहयुक्त बन्धन है, इसके बदले में किसी उपहार की लालसा इसे एक औपचारिकता का रूप दे देती है। द्रौपदी ने कृष्ण जी की कटी उंगली पर अपना चीर रक्षासूत्र के रूप में बांधा था जिसके पवित्र संकल्प व पावनता को उन्होंने जीवन भर निभाया था। पवित्र भावों एवं संकल्पों से ओत प्रोत रक्षाबन्धन का कच्चा धागा जंजीर से भी अधिक मजबूत एवं शक्तिशाली होता है। हम सभी भाई- बहन, परिवार, समाज का यह परम कर्तव्य होना चाहिए कि शुभ संकल्प लेते हुए इसकी पवित्रता को अक्षुण्ण रखें। किसी भी कीमत पर इसे कलंकित न होने दें। हर भाई अपनी बहन को इस बात का पूरा विश्वास दिलाए कि किसी भी विषम परिस्थिति में जब भी वह पीछे मुड़कर देखेगी तो हमेशा उसका भाई उसे संभालने तैयार खड़ा मिलेगा।

- उमेश कुमार साहू

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