स्वतंत्रता दिवस विशेष: जरा याद करो कुर्बानी....

स्वतंत्रता दिवस विशेष: जरा याद करो कुर्बानी....

भारत का स्वाधीनता संग्राम दुनियां भर में एक मिसाल रहा है। जहां दुनियां भर के देशों की आजादी खूनी संघर्ष और घात-प्रतिघात तथा लाशों के ढेर से गुजर कर मिली, वहीं भारत की आजादी ने दुनियां भर में अहिंसा का दीप जलाया और खुले सीने पर हंसते-हंसते गोली झेलने की कुव्वत रखने वाले गांधी जैसे महामानव से दुनियां को रूबरू कराया।

आजादी की लड़ाई के लम्बे और ऐतिहासिक संघर्ष में माताओं ने हंसते-हंसते अपने बेटों का दान किया। बेटों ने मरते-मरते भी बस एक ही बात कही,

'देख मां, हमने तेरा दूध मैला नहीं किया। गोली पीठ पर नहीं, सीने पर ही खाई है।' भगत सिंह का 'इंकलाब' का नारा हाथ में बम होने पर भी शहादत की लोकगाथा की भारतीय परंपरा की अगली कड़ी है तो सुभाष का 'जयहिन्द' का उद्घोष अंतिम दम तक हिन्दुस्तान की जय हेतु लडऩे के संकल्प का प्रतीक है। हंसते-हंसते फांसी पर झूलने वाले बिस्मिलों की लम्बी कतार आज भी इस देश में 'वंदे मातरम' को जिंदा रखे है।

जैसे हमें आजादी फूलों के बिछौनों पर सोते-सोते नहीं मिली, वैसे ही इस आजाद देश को आजादी की हवा में भी गहरी नींद का सकून नहीं मिला। आजादी के यज्ञ में से लगातार समिधा चुराने वाले जिन्ना पाकिस्तान में भले ही 'कायदेआजम' बन बैठे हैं पर भारत नाम के अपने पितृदेश की पीठ में छुरा घोपने की जो संस्कृति उन्होंने पाकिस्तान को दी, वह बदस्तूर जारी है।

पहले माउंटबेटन के हाथों जमीर बेच प्रधानमंत्री पद खरीदने वाले जिन्ना ने गुलामी की जंजीर टूटते ही अपने मानसपिता हिन्दुस्तान में कबायलियों को भेज और मारकाट मचवा कर अपना पितृ ऋण चुकाया। हमारे नेताओं ने इसे भी महज क्षणिक जुनून मानकर माफ किया और पाक ने आधा कश्मीर कब्जा लिया। पता नहीं इसे कुर्बानी कहा जाए या कायरता? बहरहाल 'मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की' की तर्ज पर हमारे पड़ोसियों की हवस बढ़ती गई।

1947 की इस अफरा तफरी में हजारों हिन्दुस्तानी कुर्बान हुए और इन्हीं कुर्बानियों की दीपशिखा पर जाज्वल्यमान नाम है गणेश शंकर विद्यार्थी का। वह तो पटेल का जीवट था कि दुश्मनों की नाक में नकेल डाल सके मगर भावुक नेहरू इतिहास के साथ भूगोल भी नहीं बदलने के हामी थे। काश पटेल को कुछ वक्त खुला छोड़ दिया जाता तो विश्वासघात की श्रृंखला 1965 की हिम्मत करने का मौका ही न ले पाती।

चीन के हाथों कूटनीतिक व राजनैतिक हार से टूटे नेहरू के अवसान के बाद दिग्गजों के बीच से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे छोटे से शास्त्री पर पाकिस्तानी फौज के जीत के सपने यदि चकनाचूर हुए तो इसके पीछे हमारे जांबाज जवानों के बुलंद हौसले तथा उनकी कुर्बानी ही थी। अजेय समझे जाने वाले अमेरिकन पैटन टैंक शैतान सिंहों और अब्दुल हमीदों के आगे रेत के खिलौनों से बिखरने ही थे। दुर्गम क्षेत्रों को अदम्य साहस के आगे नतमस्तक होना पड़ा। कुर्बानियों के इस देश में आजादी के लिए दी गई कुर्बानियों के साथ ही आजादी की हिफाजत में दी गई कुर्बानियां भी उतनी ही सम्मान की हकदार हैं। शांति में पसीना बहाकर युद्ध में रक्त बहाने से बचा जा सकता है। तो इन पुरातन से लेकर कारगिल की अद्यतन कुर्बानियों को याद करने का सबसे अच्छा तरीका अपनाएं-आंख में पानी भरने के बजाय ऐसे बनें कि दुश्मन की आंखें न उठ पाएं।

- शादाब जफर शादाब

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