तीन मूर्ख भाई

तीन मूर्ख  भाई

बात बहुत पुरानी है। किसी गांव में एक किसान रहता था। उसके तीन बेटे थे। तीनों मूर्ख, निकम्मे और आलसी। किसान उनके बारे में सदा चिंतित रहता था।

एक दिन गांव में एक महात्मा जी पधारे। किसान ने तीनों बेटों को महात्मा जी की सेवा में लगा दिया। तीनों ने खूब मन लगाकर महात्मा जी की सेवा की। महात्मा जी पहुंचे हुए थे। वे जाते-जाते तीनों को एक-एक वरदान देते गए।

तीनों भाई खुश हो गए। सबसे बड़े ने पहले वर मांगा, 'मेरा कमरा नोटों से भर जाए।' देखते ही देखते उसका कमरा नोटों से भर गया।

अब मझले भाई की बारी थी। उसने भी झटपट मांग लिया, 'मेरा भी कमरा सोने से भर जाए।' पलक झपकते ही उसका कमरा भी सोने से भर गया।

तभी बाहर से किसान भी घर लौट आया। अपने बेटों को धनवान बना देखकर उसे खुशी हुई पर चूंकि उसके बेटे मूर्ख थे इसलिए दूसरे ही क्षण वह चिंतित हो उठा।

तभी सबसे छोटा लड़का किसान के पास आकर बोला, 'बापू मुझे बताओ, मैं क्या मांगू। मेरे लिए बचा ही क्या है?'

'तुम सुख, शांति, स्वास्थ्य, संतोष आदि कुछ भी मांग सकते हो। यह धन से भी श्रेष्ठ है।' किसान ने उसे समझाया।

पर वह न माना। तब किसान अपने दोनों बड़े बेटों के पास गया। उसने उन दोनों से अपने छोटे बेटे के लिए कुछ मांगा। पर वे दोनों बोले, 'हम उसे क्यों दें, बापू? उसके पास भी तो वर है। वह भी अपने लिए कुछ मांग ले।'

किसान ने उन दोनों को समझाना चाहा, 'बेटा, उस वर को आड़े वक्त के लिए सुरक्षित रहने दो। मेरी बात मान जाओ। इसी में तुम सबकी भलाई है।' पर दोनों बेटे टस से मस न हुए।

छोटा बेटा भी पास ही खड़ा था। अपने बड़े भाइयों की बात सुनकर वह आग बबूला हो गया। उसने भी वर मांग लिया, 'मेरे दोनों भाई फिर से कंगाल हो जाएं।'

दोनों बड़े भाइयों के कमरे उसी क्षण खाली हो गए। धन जैसे आया था वैसे ही चला गया। अब वे पछतावा कर रहे थे पर अब बहुत देर हो चुकी थी।

- खुंजरि देवांगन

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