महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी लाएगी बदलाव

महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी लाएगी बदलाव

सुखद है वर्ष 2०14 तक यह भागीदारी बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई है। भारत की आबादी का 48.5 फीसदी हिस्सा महिलाएं हैं। यही वजह है कि देश के राजनैतिक परिदृश्य में उनकी हिस्सेदारी काफी अहम है।

अभी तक माना जाता रहा है कि घर की महिलाएं प्राय: अपने घर के प्रमुख या पुरूष के निर्देश पर वोट डालती रही हैं लेकिन जब महिला मतदाता की संख्या के आंकड़े उत्साहवर्धक आ रहे हैं, तो आशा की जा सकती है कि अब महिलाओं की बड़ी संख्या वास्तव में लोकतंत्र के पर्व में अपनी इच्छा व स्वतंत्रता से मतदान कर पा रही है। असल में देखा जाए तो यह महिला मतदाताओं की बढ़ती जागरूकता का ही नतीजा है कि उनका सियासी प्रतिनिधित्व बढ़ाने को लेकर न सिर्फ राजनीतिक पार्टियां सोच रही हैं बल्कि वे स्वयं भी आत्मविश्वास के साथ इस क्षेत्र में दस्तक दे रही हैं।

नवीनतम मतदाता सूची के अनुसार, देश में कुल मतदाताओं की संख्या 89.87 करोड़ है जिनमें 46.7० करोड़ पुरूष और 43.17 करोड़ महिलाएं हैं। मतदाता सूची के अनुसार पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के 9 राज्यों में पुरूषों की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या अधिक है। चुनाव आयोग द्वारा आम चुनाव के लिए जारी आंकड़ों के अनुसार लैंगिक अनुपात के मामले दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी के अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम अग्रणी राज्य हैं। शेष भारत से सिर्फ गोवा एकमात्र राज्य है जहां महिला मतदाताओं की अधिकता है।

राष्ट्रीय स्तर पर मतदाताओं का लैंगिक अनुपात 958 है। आंकड़ों के अनुसार लैंगिक अनुपात के लिहाज से पुडुचेरी में एक हजार पुरूषों पर 1117 महिला मतदाता हैं। केरल में यह संख्या 1०66, तमिलनाडु में 1०21 और आंध्रप्रदेश में 1०15 है। वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में यह संख्या 1०54 से 1०21 के बीच है। मतदाताओं के लैंगिक अनुपात के मामले में दिल्ली देश में सबसे पीछे है। यहां एक हजार पुरूषों की तुलना में 812 महिला मतदाता हैं।

महिला मतदाता अब अपने मत के मायने समझने लगी हैं। एक सुखद पहलू यह भी है कि अब महिलाएं अपने जीवन से जुड़े मुद्दों को लेकर सचेत हैं। जनप्रतिनिधि चुनते हुए उन्हें ख्याल रहता है कि उनकी समस्याओं को कौन संवेदनशील आवाज दे सकता है? यही वजह है कि वे अब स्वतंत्र सोच के साथ मतदान करती हैं।

2०14 के आम चुनावों के समय हुए 'सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी' के एक सर्वे के मुताबिक 7० फीसदी महिला मतदाता वोट डालने में अपने पतियों से राय नहीं लेतीं बल्कि स्वतंत्र रूप से फैसला करती हैं यानी अधिकतर महिला मतदाता अब अपनी मर्जी से वोट देती हैं। साथ ही बड़ी संख्या में महिलाएं वोट करने घर से निकलने लगी हैं। इन आम चुनावों के अब तक के चरणों में भी देखने में आया है कि महिलाओं ने बढ़-चढ़कर लोकतंत्र के इस उत्सव में अपनी भागीदारी दर्ज की है। सुखद है कि अब महिला मतदाताओं में मुद्दों के प्रति जागरूकता और मतदान की जिम्मेदारी को लेकर प्रतिबद्धता देखने को मिल रही है।

आज महात्मा गांधी को याद करना जरूरी होगा। महात्मा गांधी के सार्वजनिक जीवन में आगमन से पहले भारत में जितने भी सुधारवादी आंदोलन चले, उनका बल महिलाओं को उचित स्थान व सम्मान दिलाने पर था लेकिन महिलाओं को स्थानीय, राज्य व केंद्र स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी मिले, इसके लिए कोई खास प्रयोग नहीं हुए। महात्मा गांधी ने पहली बार स्वतंत्रता आंदोलन को महिलाओं की मुक्ति से जोड़ा था। वर्ष 1925 में उन्होंने कहा था, 'जब तक भारत की महिलाएं सार्वजनिक जीवन में भाग नहीं लेंगी, तब तक इस देश को मुक्ति नहीं मिल सकती। मेरे लिए ऐसे स्वराज का कोई अर्थ नहीं है जिसको प्राप्त करने में महिलाओं ने अपना भरपूर योगदान न किया हो।Ó उनकी पहल पर पहली बार महिलाएं बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जीवन में सक्रि य हुईं।

बदलाव के दौर का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि अब जनता की राय भी बदल रही है। महिलाओं की सियासी भागीदारी बढऩे के प्रति जनता का सहयोगी व्यवहार और सकारात्मक नजरिया भी अहम है। स्वतंत्र अस्तित्व गढऩे और उसे कायम रखने का अधिकार देश के हर नागरिक का संवैधानिक हक है लेकिन इस मानवीय अधिकार को जीने के लिए सुरक्षित परिवेश और समानता का व्यवहार भी जरूरी है जो अब तक महिलाओं के हिस्से में नहीं आया है। यह बात देश के आम लोग भी समझते हैं, इसलिए महिलाओं को कमतर आंकने के बजाय उनकी क्षमता और योग्यता पर भरोसा जताया जा रहा है। इस बात को सराहा जा रहा है कि कितनी ही विरोधाभासी स्थितियों से लड़ते हुए महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, राजनीतिक परिदृश्य में अपनी मौजूगी दर्ज करवा रही हैं। स्वतंत्र सोच के बल पर एक जिम्मेदार मतदाता के रूप में अपना दायित्व निभा रही हैं।

समूचा परिदृश्य उत्साहवर्धक तो है लेकिन हालात अभी भी उतने सकारात्मक नहीं हैं। रोजगार व मेहनताने में औरतों के साथ भेदभाव, रीति-रिवाज और मर्यादा के नाम पर महिला को दबाकर रखना, बच्ची के जन्म पर नाखुशी, घरेलू हिंसा जैसी कई चुनौतियां अपने घेरे को तोड़कर बाहर आ रही महिलाओं के रास्ते में खड़ी हैं। इनसे निबटने के लिए आवश्यक है कि विधायिका में उनकी निर्णायक भागीदारी जरूर हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि आज उनकी मतदान में भागीदारी बदली है, घोषणा पत्रों में उनके मुद्दों पर विमर्श बढ़ा है तो वह दिन दूर नहीं जब उनकी सदन में भागीदारी भी निर्णायक होगी।

-नरेन्द्र देवांगन

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