व्यंग्य: बागी उम्मीदवार की व्यथा

व्यंग्य: बागी उम्मीदवार की व्यथा

वे फिर बागी हो गए हैं। बगावत उनका जीवनधर्म रहा है। वे अधर्म के रास्ते चल ही नहीं सकते इसलिए अक्सर उनके हाथ बगावत का एक लाल झण्डा फहराता ही रहता है। उनके अनुसार बगावत सशक्त आत्मा का सबसे बड़ा हथियार है। कोई साधारण व्यक्ति बागी हो ही नहीं सकता। बागी होने के लिए चट्टान जैसा मन और पर्वत जैसी संकल्प शक्ति चाहिए।

वैसे भी उनका जीवन बगावत की जिंदा मिसाल है उन्होंने जीवन जिया कम है, बगावत ज्यादा की है। जब भी कोई उन पर अपना निर्णय थोपने की कोशिश करता है, वे बगिया जाते हैं। अब यह भी क्या है कि पार्टी अनुशासन का नाम लेकर आप दूसरों की आत्माओं को कुचलते ही रहो।

भांजते रहो अनुशासन की तलवार। मैं कोई डरने वाला नहीं हूं। यह न समझना कि बंधुआ मजदूर की तरह मैं हाथ-पांव जोडऩे जाऊंगा। चला जाऊंगा किसी और पार्टी में। मुझे तो राजनीति करनी ही है। राजनीति मेरा शौक है, राजनीति में मेरे प्राण बसते हैं। तुम यह न समझना कि तुमने पार्टी से निकाल दिया तो मेरी राजनीति खत्म।

अरे, मैं कोई मछली, मेंढक नहीं हूं कि पानी से निकाला और चित्त। चौबीसों घंटे तुम्हारी छाती में मूंग दलूंगा। हां, ऐसे-ऐसे राज छुपाए बैठा हूं सीने में कि उगल दूं तो तुम्हारे बड़े-बड़े आकाओं को दूसरी सुबह हैजा हो जाए, जनता को मुंह दिखाना भी मुश्किल हो। मुझसे मत उलझो। पानी में रहकर मगर से बैर स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता।

पिछले तीन चुनावों से टिकट मांग रहा हूं। दिया एक बार भी मुझे? तुम सब हरिश्चन्द्र, एक मैं ही भुट्टाचोर। काने को दे दिया, अन्धे को दे दिया, हकले को दे दिया, लंगडू को दे दिया, पार्टी को विकलांगों का शिविर बना दिया है कपटियों ने। एक मुझे ही टिकट देने के नाम पर अकाल पड़ गया। दादी-नानी मरने लग गई।

चुनाव का पेंच जब जोरदार फंसेगा और नैया जब मंझधार में डगमग होने लगेगी। तब भैयाजी भैयाजी, करते मेरे पास ही एक टांग में दौड़े आओगे। दिन-रात एक करके जांगर तोड़ूं मैं, पोस्टर, बैनर, प्रचार-भाषण का हर बार ठेका रहे मेरा और जीतकर मजे करें तुम्हारे चंगू-मंगू। नहीं, अब मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। नहीं चलेगा आगे ये सब।

पिछले चालीस सालों से मेरे ससुर देश सेवा कर रहे हैं। आजादी के जमाने के सब तपे तपाये नेता जब तक जीवित थे, टिकट उनको मिलते रहे। अब यह दुमकटी नई पीढ़ी क्या आई, तपे तमाये नेताओं को ही लंगड़ी मारने लगी। यह पहली बार है जब उनके जैसे जन नेता को टिकट नहीं मिला। मैं जान रहा हूं कि आज पार्टी में कौन लोग मेरे परिवार की जड़ें खोद रहे हैं। अरे, तुम क्या खोदोगे मेरी जड़ें। बिना जड़ के भी तुम्हारी छाती में चढ़कर प्रेत की तरह खून चूसेंगे।

एक तो न मुझे टिकट दिया, न मेरे ससुर को। सब सिनेमा की टिकट की तरह अपने कुटुम्ब में ही बांट दिया बेईमानों ने और अब मुझे पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में नाम वापिस लेने को कह रहे हैं। मैं कोई झख मारने के लिए चुनाव में नहीं खड़ा हुआ। निकालना है तो पार्टी से निकाल दो। अब मैं बैठने वाला नहीं। जीत लेना चुनाव अपने बूते पर। मुझमें दम होगा तो मैं बताऊंगा। हो गया हूं बागी मैं, जो करते बने कर लो। ज्यादा से ज्यादा अनुशासन की कार्यवाही ही तो करोगे न। पांच साल के लिए दल से बाहर निकाल दोगे, और क्या? ऐसा भी तुम्हारे दल में रहने के लिए मरा नहीं जा रहा हूं। नहीं चाहिए तुम्हारा चुनाव चिन्ह। मुझमें औकात होगी, जनता में मेरी कुछ छवि होगी तो गधा-उल्लू छाप लेकर भी जीत के बताऊंगा तुम्हें मैं।

दसों दल वाले पलक पांवड़े बिछाकर अपने दल में मुझे शामिल करने के लिए राह तकते बैठे हैं। चाहूं तो अभी इसी पल घुस जाऊं पर मैं वैसा हूं नहीं। मुझे बेपेन्दी का लोटा मत समझना। निर्दलीय लड़ूंगा पर इधर- उधर लुढ़कूंगा नहीं। मैं कोई गयाराम नहीं हूं। दल का टिकट देते हो तो अभी भी बोलो। दस जगह लोगों को टिकट देने की घोषणा करके भी तुमने नाम बदल दिया है।

इतना याद रखना, टिकट न देना तुमको महंगा तो पड़ेगा ही। हम खानदानी बागी हैं। हम उधार नहीं रखते। खुद नहीं जीतेंगे तो तुम्हें भी डुबाये बिना न रहेंगे। मुझे भी गुस्सा आ गया तो हिन्दुस्तान भर के बागियों का एक नया दल बनाऊंगा-बगावत पार्टी और तुम सब को देख लूंगा। अब तुम्हारे दल में रखा ही क्या है? सब नामी-गिरामी पुराने तपी नेता तो मेरे साथ होंगे। तुम झंडी हिलाते अपनी पार्टी में पड़े रहना। उस समय मेरे पास नाक रगड़ते आओगे। तब बताऊंगा तुम्हें मैं कि बागी भी क्या बला होते हैं।

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