व्यंग्य: गुस्से में ईवीएम मशीन

व्यंग्य: गुस्से में ईवीएम मशीन

हाँ मैं बहुत गुस्से में हूँ। जनता से नहीं,इस देश के बेईमान,पाखंडी राजनीतिज्ञों से हूँ। इन भ्रष्ट-पतित लोगों ने मुझ पर हैकिंग और बेईमानी करने का आरोप लगाने की हिम्मत कैसे की ? निर्वाचन आयोग ने जब उन्हें चैलेंज किया कि आओ और हिम्मत है तो इस ई.वी.एम. मशीन को हैक करके या इसमें गड़बड़ी करके दिखाओ,तब सब मुंह छुपाते फिरे। कोई सामने नहीं आया। अरे भ्रष्टों, अब पीठ पीछे आरोप लगा रहे हो कि मेरे चरित्र में दाग है ?

तुम जीतते हो और सत्ता में आते हो, तब मैं सोलह आने ठीक और हार जाते हो तब मैं भ्रष्ट-दुश्चरित्र। सियारों की तरह पूरा विपक्ष मिलकर 'हुंवा...हुंवा...गडबड़ी... गडबड़ी..' चिल्लाने लगते हो। तुम सब सत्यवादी हरिश्चन्दों को मैं नहीं जानता क्या ? करोड़ों अरबों का क्या-क्या घोटाला करके नहीं बैठे हो तुम लोग। कल तक झोंपड़ छाप थे बेईमान, आज देश को खाकर अरबपति बने बैठे हो और मुझे सच्चाई का पाठ पढ़ा रहे हो ? सबको अपने जैसा समझ लिया क्या ? कहते हो देश में समाजवाद लाओगे,रामराज उतारोगे। देश में तो नहीं उतरा,अपने-अपने घरों में तुम बहराम चोट्टों ने रामराज जरूर उतार लिया।

मेरा मुंह ज्यादा मत खुलवाओ,तुम क्या हो जानते हो ? कम्प्यूटर की भाषा में कहूं तो दुनिया के सबसे बड़े 'हैकर हो हैकरÓ। तुम पाखंडियों ने अपने खानदान के स्वार्थ के लिए देश के अच्छे-भले प्रजातंत्र को 'हैक' करके राजतंत्र बनाकर अपने बन्दरनुमा औलादों के हवाले कर दिया। कोई जातिपाति की राजनीति कर रहा है,कोई सम्प्रदाय की राजनीति का बोर्ड अपने गले में टाँगे हुए है और कोई धर्म का झंडा उठाये हुए है। देश और जनता की मंगलकामना कही नहीं है। हरएक नजर में बस कुर्सी-कामना है।

तुम्हारा होना ही भ्रष्ट-तंत्र की निशानी है। तुम जहां चरण रख दो,वहां भ्रष्टाचार के फूल महमहाने लगते हैं। कमीशनखोरी की मंद-सुगन्धित बयार बहने लगती है। ...और भारतीय प्रजातंत्र में मेरा चुनाव का काम देखो। सौ प्रतिशत ईमानदारी से करवाता हूँ। न वहां भाई-भतीजावाद है,न दोस्ती-यारी न रिश्तेदारी। खुली किताब की तरह हूँ मैं। भगवान शिव की तरह तटस्थ। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।

अभी राज्यों के चुनाव में यदि सत्ताधारी पार्टी जीती होती तो तुम सारे विपक्षी वैशाखनन्दन ढेंचू...ढेंचू,गड़बड़ी...गड़बड़ी चीखने-चिल्लाने लगते। अब कांग्रेस जीत गई तो तुम सबने मनमोहन सिंग की तरह मौन क्यों साध लिया ? लगाओ मुझ पर आरोप। कहो कि मुझको हैक किया गया है। गड़बड़ी को अंजाम दिया गया है। मेरे साथ छेड़छाड़ की गई है। अब मुंह सिल गया क्या ? अपनी चुनरी के दाग देखो धृतराष्ट्र-पुत्रों, मेरी चिंता में बेकार श्वान की तरह धूल में लोट मत लगावो। मैं प्रजातंत्र का सच्चा बेटा आज भी हूँ और कल भी रहूंगा।

- कस्तूरी दिनेश

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