पुराना है 'मी टू' का इतिहास

पुराना है मी टू का इतिहास

मी टू की सबसे पुरानी विक्टिम कौन ? यह शोध का विषय है। राधा, अहिल्या, या कोई और पर तय है कि मी टू मी टू का इतिहास है बड़ा पुराना। नारी की नैसर्गिक लज्जा,और उसे प्रकृति प्रदत्त सौंदर्य के विपरीत पुरुष को मिली भौतिक बलिष्ठता तथा समाज में उसकी स्वस्थापित ताकत मीटू का मूल कारण है। पुरुष सदा से स्त्री को कहता तो बराबरी का रहा पर स्त्री की समर्पण की वृत्ति के चलते मी टू कारोबार चलता रहा। आधुनिक सिनेमा काल में सबसे पहले मीना कुमारी ने बड़े सुरीले अंदाज में मी टू की शिकायत की थी 'इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा। इस हरकत के तीन गवाह भी थे। उन्होंने बाकायदा कहा था 'हमरी न मानो बजजवा से पूछो', 'हमरी न मानो रंगरेजवा से पूछो, 'हमरी न मानो सिपहिया से पूछो पर तब इसे सोसायटी ने इग्नोर कर दिया था। सिपाही की गवाही भी कोई काम न आई। उलटे इस गीत की भूरि भूरि प्रशंसा की जाती रही। यदि तभी कठोर कार्यवाही कर दी जाती, कम से कम कड़ी निंदा ही की जाती तो आज यह नौबत न होती कि हर दूसरी सेलीब्रिटी मी टू मी टू रट रही है और मेरे जैसे जिन्होने कभी अपनी पत्नी तक को जबरदस्ती मी टू नहीं किया, वो भी भयग्रस्त हैं कि कहीं कल के अखबार की सुर्खियों में अपना नाम भी फोटू सहित मीटू मीट में न आ जाये। जिन्होंने स्त्री की किसी विवशता का लाभ उठाकर मी टू कैंपेन में शिकायत लायक कुत्सित हरकतें की हैं, उन्हें तो डरना ही चाहिये। मैं उनकी घनघोर भत्र्सना करता हूं पर संजय दत्त जैसे कथित खलनायक जिनकी बायोपिक बनाकर उन्हें महिमा मण्डित करने में किसी मी टू लेडी ने आपत्ति तक नहीं की, सरे आम पूरी बेशर्मी से सार्वजनिक रूप से अपनी मी टू हरकतों की गिनती बता रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट परस्पर सहमति से यौन व्यवहार को जायज बता रहा है। मेरे एक मित्र बड़े प्रशासनिक अधिकारी हैं। पब्लिक डीलिंग का दायित्व है, वे स्वभाव से सहज हैं, उनकी एक सुंदर सी स्टेनो है, जनता उनके पास अपनी शिकायतें लेकर आती रहती है। इस सारे माहौल से वे इतना विचलित हुये कि उन्होंने उस स्टेनो का स्थानांतरण कर दिया और एक पुरुष स्टेनो रख लिया। अपने कक्ष के पर्दे उन्होंने हटवा दिये, टेबल इस तरह अरेंज करवा दी कि वे बाहर से दिखते रहें, अब वे अपने चैंबर के दरवाजे खुले रखते हैं। चपरासी को दरवाजे के पास ही गवाही के लिये बैठा कर रखते हैं। एक दूसरे मित्र ने अपने पूरे आफिस में वीडियो कैमरे ही लगवा दिये हैं। सवाल यह है कि क्या हमारे बैड रूम तक अब सब कुछ वीडियो सर्विलेंस में ही होगा। क्या हमें अपने आप पर भरोसा नहीं बचा। मी टू जैसे आंदोलनों से स्त्रियों का और समाज का भला होगा या समाज के स्थापित मूल्य व आदर्श ध्वस्त हो जायेंगे ? समाज को स्त्री स्वतंत्रता व समानता को मान्यता देनी ही चाहिये पर वर्तमान परिदृश्य में मेरे जैसे कन्फ्युजिया गये हैं। जीवन के किसी क्षण में बड़े से बड़े आदर्शवादी पुरुष व स्त्रियां भी अपने व्यवहार में स्खलित हुये हैं। हरिवंशराय बच्चन जैसे कुछ ने साहस करके अपनी आत्मकथाओं में अपने कमजोर पलों को स्वीकार भी किया है किन्तु आज के व्यवसायिक युग में जब प्रोपेगेंडा भी पब्लिसिटी टूल के रूप में स्वीकार किया जा चुका है, ऐसे कैंपेन का चरित्र हनन में दुरुपयोग भी संभव है।

-विवेक रंजन श्रीवास्तव

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