रहस्य रोमांच: उस दीपावली की रात्रि के ग्राहक का?

रहस्य रोमांच: उस दीपावली की रात्रि के ग्राहक का?

दीपावली त्यौहार है प्रकाश का, अंधकार की ओर से प्रकाश की ओर गमन का। दीपावली त्यौहार है आत्मीयता का, श्रीराम के अयोध्यापुरी वापस लौटने की खुशी का। दीपावली त्यौहार है जुआ खेलने वाले महारथियों का। दीपावली त्यौहार है करोड़ों रूपयों की मिठाई खा जाने का। हलवाइयों द्वारा अपनी दुकानों को विशेष तरीके से सजाकर ग्राहकों को लुभाने का।

जमाना तरक्की कर गया। अब तो महानगरों के प्रख्यात हलवाई, इस त्यौहार पर ही एक ही दिन में कई कई लाख रूपयों की मिठाई बेच डालते हैं। कारीगरों को कई दिन पहले से ही नये नये मिष्ठान बनाने में लगा दिया जाता है। शाम तक सारी मिठाइयां बिक जाती हैं।

पर लगभग पचास साल पहले का युग और था। न तो बिजली की चमक दमक इतनी थी, न ही आधुनिक शोकेसों वाली दुकानें। चौड़े पीतल के थालों में भरकर मिठाई सजा दी जाती थी। थोड़ी सी ही वैराइटी बनती थी। दुकान में गैस की लालटेन, लालटेन या सरसों के तेल के चिराग जलते थे। मिठाई देसी घी में ही बना करती थी। हलवाई सारी सारी रात दुकानें खोले रहते। रात भर ग्राहक आते ही होंगे, तभी तो सारे हलवाइयों की मिठाइयां अगली सुबह होने तक ही समाप्त हो पाती थी।

उस युग में एक मान्यता थी - दीपावली की रात्रि में, आधी रात के बाद भूतों/पिशाचों/प्रेतों/चुड़ैलों की टोलियां आती हैं और हलवाइयों की दुकानों की सारी मिठाइयां खरीदकर ले जाती हैं। यह मान्यता पहले भी थी। कस्बेनुमा शहरों में जहां अभी तथा कथित विकास की दौड़ पूरी तरह प्रारंभ नहीं हो पाई है, वहां यह मान्यता अभी भी कायम है। तमाम हलवाई अभी भी सारी रात दुकानें खोले रहते हैं।

मेरी आज की कथा भी एक हलवाई की ही है। सत्य घटना जो दीपावली की रात से ही जुड़ी है। घटना है लगभग 1940 की। उत्तर प्रदेश का एक नगर चंदौसी। अब तो यह नगर अपने गणेश चौथ मेले के कारण पूरे देश में विख्यात है। कभी यह देसी घी की मंडी के कारण, गुड़ की मंडी के कारण पूरे देश में प्रख्यात था। इसी चंदौसी शहर में एक प्रख्यात हलवाई थे, दुकान आज भी है - आधुनिक स्वीट शाप दुकान पर बैठते थे लाला। नाम उनका लिखना धृष्टता होगी, अत: मात्र लाला ही लिखा जायेगा।

लाला जी की दुकान - छोटे मोटे काले किवाड़। लाला की मिठाई की धूम बड़ी दूर दूर तक थी। दीपावली पर लाला की दुकान में भी कई मन, (उस जमाने में सेर-छटांक-मन ही तौल की इकाई होते थे) मिठाई बनी - बालूशाही - इमरती-बरफी-कलाकंद - गुलाब जामुन-सोहन हलवा तो विख्यात था। शाम को लाला ने बड़ी श्रद्धा से दीपावली पूजन किया। मन में कहीं न कहीं, लक्ष्मी की और कृपा पाने की आकांक्षा थी।

दिन भर खूब बिक्री हुई। रात में सरसों के तेल के बड़े बड़े दीपक/गैस की एक लालटेन/लालटेन जलाये लाला दुकानदारी कर रहे थे। आधी रात होने तक लाला की दुकान में लगभग एक मन मिठाई रह गई। लाला के साथ हर साल यही होता था, आधी रात के बाद भी कोई न कोई ग्राहक जरूर आता, बाकी बची सारी मिठाइयां खरीद कर ले जाता।

उस रात्रि को भी, ग्राहकों की एक टोली आई। किसी का मुंह अंगोछे से ढका हुआ, किसी ने पुरानी चादर सी ओढ़ रखी थी, किसी ने मफलर से अपना चेहरा छिपा रखा था। उस टोली के मुखिया ने मात्र हाथ के इशारे से एक एक करके बाकी बची मिठाई, सारे थाल तुलवा लिए। लाला मिठाई तोलते जाते और एक बड़े थाल में करीने से लगवाते जाते। छोटे थाल सब खाली हो गये। बड़ी परात में मिठाई तोलकर भर दी गई। ग्राहक ने चांदी के सिक्कों से लाला का भुगतान कर दिया।

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अब ग्राहकों की टोली के नायक ने हाथ से इशारा किया, लाला ने अपनी दुकान के पुराने कारीगर को इशारा किया, कारीगर ने मिठाई की परात को कपड़े से ढका, परात सिर पर रखी और ग्राहकों के पीछे पीछे चल दिया।

ग्राहकों की टोली, आगे फव्वारे के पास जाकर, एक पान की दुकान पर रूकी पान वाले की दुकान में जितने भी पान बाकी थे, सब लगवा लिये-कुछ सादे, कुछ तंबाकू के। पानी वाले को भी चांदी के रूपये दिए गए। पान वाला भी कृतार्थ हो गया।

अब ग्राहकों की टोली रेलवे स्टेशन की ओर चली। स्टेशन के सामने वाले चौराहे से, वह जोई-संभल रोड की तरफ टोली चली जा रही थी। सबके सब खामोश। अब तो वहां काफी आबादी है। उस जमाने में खेत और बाग ही थे। लगभग 2 मील आगे चलकर नरौली के पास, सड़क पर आम का एक पुराना बाग था। दूर दूर तक कोई आबादी नहीं।

उस बाग में रोशनी हो रही थी, तंबू-कनातें लगी थी। गैस के हंडे जल रहे थे। कुछ व्यक्ति वहां भी बैठे थे। ढोलक बज रही थी-शायद किसी संगीत समारोह की तैयारी चल रही थी। ग्राहकों की टोली भी वहीं जाने को बाग में घुस गई। पीछे पीछे हलवाई का नौकर सिर पर मिठाई की परात रखे हुए।

नौकर ने परात बीच में दरी पर रख दी। कुछ व्यक्तियों ने उठकर परात की मिठाई बड़े बड़े केले के पत्तों पर लौट ली, मिठाई की परात खाली करके उस कारीगर को पकड़ा दी। अभी तक कोई कुछ नहीं बोला था।

अब उस टोली का नायक बोल उठा- 'अरे तू भी कुछ खा ले, पेट भर कर खा ले। चिंता मत कर।'

नौकर को वापस जाने की जल्दी थी। कई मील वापस जाना था। अंधेरी रात-सुनसान सड़क। उसने मना कर दिया, हाथ जोड़ लिए। लौटकर वापस जाने के लिए उस नौकर ने परात साफ करके अपने हाथ में उठा ली। टोली का नायक अब नौकर से पूछ उठा - 'क्यों भई राधे, कितने पैसे मिलते हैं उस लाला की नौकरी में?'

नौकर ने कहा - 'डेढ़ रूपया महीना। दोपहर रात का खाना भी मिलता है।'

उस जमाने में इतने पैसों में कारीगर के घर का खर्च किसी तरह चलता ही था।

टोली नायक ने, नौकर राधे को एक डिबिया जेब से निकालकर दी। डिबिया माचिस के आकार की, शायद पीतल की बनी हुईद्ब्र'राधे, इस डिबिया को अपने घर के सबसे अंधेरे वाले कोने में, सुबह सूरज निकलने से पहले खोलना। टटोलकर एक नोट 2 रू. का बाहर निकालना। रोज मिलता रहेगा, जब तक जिंदा रहेगा, 2 रू. रोज निकालते रहना, मगर हां, कभी भी रोशनी में-सूरज निकलने के बाद खोलकर इसमें देखना नहीं।'

राधे वापस आ गया। अगली सुबह राधे ने चुपचाप डिबिया खोली, घर के कोने में। टटोलकर एक कागज बाहर निकाला। डिबिया बंद कर दी। कागज 2 रू. का नया नोट था-हरे रंग का। अब तो राधे के मजे आ गये-रोज सुबह 2 रू. का नोट निकाल लेता। हलवाई की दुकान पर जाना बंद कर दिया, धीरे धीरे हलवाई की दुकान के सामने ही, मेन रोड के उस पार पुरानी बंद दुकान खरीद ली। दुकान-मकान बनने लगा। हलवाई लाला हैरान-आखिर चक्कर क्या है? कारीगर हाथ से गया, मिठाई की क्वालिटी समाप्त। ग्राहक टूटने लगे।

उधर राधे ने वहीं नयी दुकान में हलवाई की दुकान खोल ली। एक दिन बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। राधे ने वह डिबिया सूरज की रोशनी में खोल डाली। अंदर गधे की लीद भरी निकली डिबिया में। डिबिया का किस्सा खत्म। दोनों दुकानें आज भी हैं। रहस्य बाकी हैं।

- स्वामी बिजनौरी

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