पर्यावरण: हानिकारक गैसों से बढ़ गया है दुर्गंध प्रदूषण

पर्यावरण: हानिकारक गैसों से बढ़ गया है दुर्गंध प्रदूषण

मानव जाति के सामने दुर्गंध की समस्या गंभीर चुनौती बनने लगी है जिसके विषय में मनुष्य की चेतना बहुत ही जटिल है। इसकी प्रतिक्रिया वातावरण की स्थिति, इसमें व्याप्त कणों की मात्रा तथा उसकी तीव्रता पर निर्भर करती है। कल-कारखानों जैसे रासायनिक कारखानों, मल, संयंत्रों, कागज उद्योग, कपड़ा उद्योग, विभिन्न खाद्य पदार्थों वाले उद्योग, गैरेज, ड्राइक्लीनर्स जैसे अनेक उद्योगों से निकलने वाली गैसें तथा इनसे उत्पन्न दुर्गंध बेहद खतरनाक सिद्ध हो रही है। इस प्रकार इन दुर्गंधों का प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सिर्फ मानव जीवन पर ही नहीं पड़ रहा है बल्कि इनके प्रभाव से जानवर और पेड़-पौधे भी नहीं बच पाए हैं।

सवाल यह है कि दुर्गंध प्रदूषण से मानव जीवन को कैसे बचाया जा सकता है। पहले कल-कारखानों और छोटे-बड़े उद्योगों से उत्पन्न हो रही गैसों तथा इनकी दुर्गंधों पर ध्यान देना जरूरी है। फ्रांस में ई.ओ.जी.नाम की एक संस्था विभिन्न प्रकार से उत्पन्न होने वाले दुर्गंधों को दूर करने के लिए गहन अध्ययन तथा शोध कार्य कर रही है। इसके निदेशक का कहना है कि शुरू में धीरे से फैलने वाली दुर्गंधों का असर बहुत लंबे समय तक रहता है जिससे गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। ईओजी सार्वजनिक स्तर पर औद्योगिक इकाइयों का पता लगा रही है जो तरह-तरह के दुर्गंध फैलाते हैं जिससे इनके आसपास रहने वाले लोगों को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ईओजी ने दुर्गंध दूर करने वाले कई तकनीक विकसित किए हैं जिनमें दुर्गंध का दूरगामी परिणाम बताने वाले भविष्यवाणी यंत्र शामिल हैं। इससे वायुमंडल में फैलने वाले तरह-तरह के गंध की जानकारी मिलती है। इस यंत्र से दुर्गंध को तो कम किया ही जाता है, साथ ही इसके उत्सर्जन को भी कम किया जाता है। पूर्व अनुमानित ढंग से होने वाले परिवर्तन को भी बदलने का कार्य संपन्न किया जाता है। औद्योगिक क्षेत्रों में फैलने वाले दुर्गंध की गुणवत्ता तथा उसकी मात्रा का विश्लेषण करने के लिए थ्रीडी मानचित्र बनाया गया है जिसके अंतर्गत औद्योगिक क्षेत्रों को अलग-अलग इकाइयों में बांटा गया है तथा एक विशेष प्रकार की निर्देश प्रणाली तैयार की गई है।

गंध विशेषज्ञों का समूह इन क्षेत्रों की अलग-अलग इकाइयों में जाकर वर्तमान मानक के अनुसार इनका निरीक्षण करता है। इसी तरह से विशेषज्ञों का दल औद्योगिक क्षेत्रों के बाहर की स्थिति का भी अध्ययन करती है जिससे उन इकाइयों की पहचान की जा सके जो स्थानीय वातावरण को दूषित करने के लिए उत्तरदायी होती हैं। इस प्रकार इससे प्राप्त तथ्यों को थ्रीडी मानचित्र पर दर्शाया जाता है। इस तकनीक के आधार पर एक कार्य योजना तैयार की जाती है जिससे अनचाहे दुर्गंध स्रोतों को दूर दिया जा सके। इस तकनीक द्वारा ईओजी ने गंदे पानी के आसपास के वातावरण का निरीक्षण शुरू किया। इस प्रकार का निरीक्षण कार्य यूरोप में अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है।

1992 में दुर्गंध की समस्याएं उत्पन्न होने पर ईओजी ने मल निकासी संयंत्रों की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया तथा कई प्रकार के तथ्यों को एकत्र किया। इस कार्य के अंतर्गत आसपास के 8 जिलों को शामिल किया गया क्योंकि यहां पर वायुमंडल की स्थिति बिगडऩे के साथ ही वहां के निवासियों को भी कई प्रकार की असुविधा महसूस होने लगी। इस कार्य के अंतर्गत ही विशेष प्रकार की वीडियो सेवा तथा मुफ्त टेलीफोन की सुविधा भी स्थानीय लोगों को मुहैय्या कराई गई जिसके कई सफल परिणाम भी सामने आने लगे। कीचड़ निकासी के द्वार पर ढक्कन लगाने जैसी व्यवस्था द्वारा काफी हद तक सुधार कार्यों में सफलता मिली। इस प्रकार से दुर्गंधों को रोकने में 30 प्रतिशत तक की सफलता हाथ आई।

ई.एल.एफ.एटोकन और डेल्टा ए.आई.सी.द्वारा विकसित ई.सी.11 रेंज प्रत्यक्ष रूप से दुर्गंध फैलाने वाले स्रोतों पर प्रतिरोधी कार्य करती है। मल से फैलने वाली दुर्गंधों पर इस प्रकार के परीक्षण कई बार किए गए हैं जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। ए.आई.सी.ने पानी में घुलने वाले हाइड्रोफिलिक तेल और पानी का मिश्रित घोल लिपोकिकलक तैयार किया है। इसके साथ ही जमीन को स्वच्छ व दुर्गंध रहित रखने के लिए कई प्रकार के तेलीय पदार्थ व साबुन भी बनाए गए हैं।

मल इत्यादि बहने वाली गंदगी को साफ करने के लिए खाली जगहों पर विशेष उपकरण लगाए गए हैं। साथ ही दुर्गंध नियंत्रक पदार्थों को यंत्रों में भरकर छिड़काव भी किया जाता है। मल से उत्पन्न गैस या वायु को निष्क्रिय करने के लिए दुर्गंध निवारक पदार्थों को अल्ट्रासोनिक स्प्रे प्रणाली द्वारा वातावरण में फैलाया जाता है। उच्च दबाव पर जनरेटर द्वारा धुंआ छोड़ा जाता है। इस तरह अलग-अलग भागों में मशीन लगाए जाने से छिड़काव अभियान में तेजी आई है। एईसी ने एक पद्धति विकसित की है जिससे मल से उत्पन्न दुर्गंध को कम करने के साथ इस पर काबू भी पाया जा सकता है। इसको ऐरेको के नाम से जाना जाता है। इसके कई सफलतम परीक्षण हुए हैं। इस प्रणाली को दुर्गंध फैलाने वाली मशीनों पर प्रत्यक्ष रूप से लगा दिया जाता है जिससे इसमें से गर्म हवा बड़ी तेजी से निकलती है।

सिलिंडर रूपी उपकरण के ऊपर गोल घुमावदार तार लगाया जाता है जिस पर ठंडा तैलीय द्रव्य लगा देते हैं। यह तार नमी तथा दुर्गंध को अपनी ओर खींच लेता है। मांस से तरह-तरह के खाद्य पदार्थ तैयार करने के लिए विभिन्न प्रकार के यंत्र आज काम कर रहे हैं जो मांस को काटने तथा धोए जाने वाले, पकाए जाने वाले तथा इन संयंत्रों में काम करने वाले लोगों के कैमरों में भी ऐरेको प्रणाली अपना कार्य कर रही है। यह प्रणाली ब्रसेल्स के रेस्टारेंट में भी कार्य कर रही है। एईसी द्वारा तैयार प्रणाली से बड़े-बड़े अन्य दुर्गंध फैलाने वाले उद्योगों ने इस समस्या का हल ढूूंढ़ निकाला है। ऐरेर की तकनीक से मशीनों को साफ रखने में भी आसानी होती है। ऐरेर को ढुलाई मशीनों को साफ रखने में भी आसानी होती है। ऐरेर को ढुलाई मशीनों पर भी लगाया जाता है क्योंकि इनमें भी दुर्गंध की समस्या उत्पन्न होती है।

99.9 प्रतिशत कार्य कुशलता की क्षमता वाली यह ऐरेको प्रणाली नियमों के अनुरूप होने के साथ ही एक सस्ती प्रणाली भी है। इस प्रकार मानव द्वारा तथा प्रकृति प्रदत्त प्रदूषण की समस्याओं को दूर करने तथा उन पर काबू पाने के लिए अनेक तरीके अपनाए जा रहे हैं। इस तरह के कल्याणकारी कार्यों में हर देश के प्रशासन के साथ-साथ लोगों की भागीदारी भी बेहद जरूरी है जिससे अधिक उन्नत मार्ग प्रशस्त हो सके। स्थानीय लोगों की राय ली जानी भी जरूरी है। तभी लोकप्रिय व असरदार तरीके द्वारा आधुनिक तकनीक से दुर्गंध रहित स्वच्छ वातावरण के उद्देश्य को सफल अंजाम दिया जा सकेगा।

-नरेंद्र देवांगन

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