व्यंग्य: वो सब जानते हैं!

व्यंग्य: वो सब जानते हैं!

सब कुछ जानने वाला एक नवीनतम संसाधन है गूगल। लिखकर, बोलकर, कैमरे से चित्र खींचकर किसी भी तरह आप गूगल से कभी भी, कहीं भी, कुछ भी पूछ सकते हैं। पलक झपकते ही इंटरनेट के सर्च इंजन आपके मतलब का ज्ञान बटोर कर आपके सामने रखने की ताकत विकसित कर चुके हैं, इसलिये अब बच्चे जब प्यास लगती है, तभी कुंआ खोदने में भरोसा रखने लगे हैं।

पहले जब राजा किंकर्तव्यविमूढ़ होते थे तो राजगुरु से परामर्श लेते थे। राजसभा आयोजित करके मंत्रिमंडल में निर्णय किये जाते थे। संजय दत्त की बायोपिक बनी, यह इस दष्टि से महत्त्वपूर्ण थी कि पहली बार इतने बड़े स्तर पर किसी विलेन करेक्टर पर बायोपिक बनाई गई। फिल्म में सुनील दत्त साहब हर उहापोह की स्थिति में दिशा दर्शन के लिये संजू बाबा को फिल्मी गीतों का सहारा लेने का परामर्श देते दिखे। जानने वालों के संबंध में फिल्म रोटी का मशहूर गीत स्पष्ट घोषणा करता है कि ये जो पब्लिक है सब जानती है, अजी अंदर क्या है, अजी बाहर क्या है, ये सब कुछ पहचानती है।

यही कारण है कि लोकतंत्र में जब किसी को कुछ कनफ्यूजन होता है तो मध्यावधि चुनाव करवा दिये जाते हैं। पब्लिक जो सब जानती है वह अपना ओपिनियन दे देती है। नई सरकार के नये नेता फिर से पब्लिक को अपने इल्यूजन में लेने लगते हैं क्योंकि नेता जी शायद वास्तव में सब कुछ जानते हैं। वे चुनावी सभाओं में बढ़ चढ़ कर भाषण दे सकते हैं। किसी भी विषय की पुस्तक का विमोचन हो, हर तरह के पुरस्कार वितरण, किसी भी कल कारखाने के उद्घाटन या शिलान्यास समारोह में नेता जी धुंआधार भाषण देने की क्षमता रखते हैं। ऐसा भाषण कि बीच बीच में तालियां भी बराबर बजती रहें।

यूं सब कुछ तो मेरी पत्नी भी जानती है क्योंकि मेरे संज्ञान में हर घटना के बाद मैने उसे यही कहते सुना है कि 'मैं तो जानती थी यही होगा' या फिर वह कहती पाई जाती है कि 'मैंने तो पहले ही कहा था'। हाल ही, जब रुपया ऐसा लुढ़का कि बेटे की फीस के डालर भिजवाने में मुझे अच्छी खासी चोट सहनी पड़ी और मैं मजबूत रुपये के लिये दिये गये अपने वोट को याद करता लुटा पिटा घर पहुंचा तो मेरे लिये हमेशा सब कुछ सुनते हुये भी यह सुनना तय था कि 'मैं तो जानती थी यही होगा पर तुम मेरी सुनो तब ना ! खैर।'

जानकार तो भविष्यवक्ता भी होते हैं, कोई हाथ देखकर तो कोई फेस रीडिंग करके कोई कुण्डली की गणना के आधार पर, कोई आपसे आपका मनपसन्द रंग या फूल का नाम पूछकर ही भूत भविष्य सब बताने और आपको बनाने की क्षमता रखते हैं।

पर एक तरह के सर्वज्ञाता का इन दिनों मैं बड़ा प्रशंसक बन गया हूं। माननीय पढ़ाई तो कानून की ही करते हैं पर सरकार से लेकर जनता तक ऐसे वैसे किसी भी विषय को लेकर इन दिनों चाहे जब उनके पास पहुंच जाती है। मैं सोचता हूं कि माननीय जज साहब को इतिहास, विज्ञान,इंजीनियरिंग हर कुछ का ज्ञान होता ही होगा, तभी तो बिना किसी डाक्टर की सलाह के वे समलैंगिक संबंधों को जायज बताने जैसे निर्णय दे पाते होंगे।

हर निर्णय नीतिगत निर्देशों और सलाह का संदर्भ बन जाता है। पानी का बंटवारा करना हो, मंदिर बनाना हो, चुनाव सही हुआ या नहीं, भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, भांति भांति के प्रकरण, तरह तरह की समस्यायें, जब लोग उलझनें इतनी बढ़ा लेते हैं कि किसी को कुछ नही सूझता तो सब कुछ अदालत को सौंप कर लोग फिर नये घपले घोटालों, नई विसंगतियां निर्मित करने में लग जाते हैं। माननीय न्यायालय सब सुलझा देंगे। वे सब जानते हैं न।

- विवेक रंजन श्रीवास्तव

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