पर्यटन: घना में पक्षियों की मनमोहक दुनिया

पर्यटन: घना में पक्षियों की मनमोहक दुनिया

संयुक्त राष्ट्र सांस्कृतिक वैज्ञानिक एवं मामलात की विशेष संस्था यूनेस्को ने अपनी विश्व धरोहर समिति की 9वीं बैठक में देश के प्रसिद्ध पक्षी अभयवन केवलादेव घना को विश्व धरोहर घोषित किया था। यूनेस्को द्वारा पहली बार किसी भारतीय अभ्यारण्य को यह सम्मान दिया गया। घना को विश्व धरोहर घोषित करते हुए समिति ने कहा था कि हालांकि भारत के अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश में भी ऐसी सैंकड़ों झीलें हैं जहां पक्षी बसेरा करते हैं लेकिन इन सब में घना ही एक मात्र ऐसी झील है जहां पर हजारों की संख्या में जलीय पक्षी अपने घोंसले बनाते हैं तथा अपने बच्चों को पालते हैं। यह इस झील की अद्भुत विशेषता है।

मानसून के आगमन के साथ ही घना में देशीय जलीय पक्षियों की गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। बरसात की फुहार के साथ ही हजारों की संख्या में जांघिल, घोघिंल, चम्मच बगुला, पनडुब्बी, काक बगुला, जलकाक आदि जलीय पक्षी देश के कोने-कोने से यहां पहुंचने शुरू हो जाते हैं। जैसे-जैसे झीलों में पानी का स्तर बढ़ता है, नर पक्षी अपनी जोड़े बनाने की कोशिश में जुट जाते हैं। कोई अपने खूबसूरत रंग से तो कोई अपनी सुराहीदार गर्दन पर लगी कलगी से, कोई कलात्मक उड़ान से तो कोई सुरीली आवाज में गा-गाकर मादा को रिझाने में लग जाते हैं। जोड़ा बन जाने के बाद पक्षियों द्वारा पानी में डूबे बबूल के वृक्षों पर घोंसले बनाने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। सभी पक्षी अपना घोंसला सुरक्षित एवं आरामदायक जगह पर बनाना चाहते हैं।

सह अस्तित्व की सुंदर भावना दिखाते हुए काले-गोरे पक्षी बिना किसी भेदभाव के एक ही पेड़ पर घोंसले बनाते हैं। एक-एक बबूल के वृक्ष पर 25 से 40 के बीच घोंसले बनाए जाते हैं। इन घोंसलों से श्वेत जाघिंल जहां पेड़ के ऊपरी हिस्से में होते हैं, ताजधारण करने वाली गर्वीले चम्मच बगुले पेड़ के मध्य में तथा बीच-बीच में काले पनडुब्बी एवं जलकाक घोंसले में रहते हैं। इन रंग-बिरंगे पक्षियों के आपस में छू रहे खूबसूरत घोंसले ऐसा आभास देते हैं जैसे कि कोई माला पिरोई गई हो।

पक्षियों द्वारा घोंसले बनाने का कार्य अगस्त माह के मध्य तक पूर्ण हो जाता है। उसके बाद पक्षियों की प्रजनन संबंधी गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। ज्यादातर पक्षी सितम्बर के अंतिम सप्ताह तक अंडे दे देते हैं। लगभग तीन से चार सप्ताह में अंडों में से बच्चे निकल आते हैं। प्रजननरत पक्षियों के बच्चे तेजी से बड़े होते हैं। बढऩे के साथ-साथ इनकी भूख भी बढ़ती जाती है। बच्चों को खिलाने-पिलाने हेतु पक्षियों को जबरदस्त मेहनत करनी होती है।

मुंह अंधेरे ही झील में पक्षियों की गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। अपने भोजन हेतु पुकारते छोटे-छोटे बच्चों की कर्णप्रिय आवाजें गूंजने लगती हैं। जांघिल जैसे बड़े पक्षी अपने बच्चों को अंशत: पचाया हुआ भोजन कराते हैं। नर व मादा बारी-बारी से जाकर छोटी मछलियां, सीप, घोंघे व पानी के अन्य छोटे-छोटे जीवों का शिकार कर उन्हें निगल जाते हैं। इसके बाद वापस अपने घोंसले में लौटकर अपने बच्चों के सामने उगल देते हैं। फिर बच्चे बड़े चाव से उसका भोजन करते हैं।

पानी के जीवों का शिकार करते समय पक्षी एक दूसरे की सहायता भी करते रहते हैं। जहां कहीं भी पानी का विस्तार ज्यादा होता है वहीं पर 15-20 पक्षी इकटठा होकर एक घेरा बना लेते हैं तथा फिर धीरे-धीरे किनारे की ओर आते हैं। इससे मछलियों को मजबूरन किनारे की ओर जाना पड़ता है। एक बार मछलियां इक_ी हुई नहीं कि पक्षी सामुदायिक शिकार पर टूट पड़ते हैं।

पनडुब्बी का शिकार करने का तरीका तो सबसे अनोखा है। वह अपनी सर्प जैसी गरदन के सहारे पानी में लंबा गोता लगाते हैं। जैसे ही चोंच में मछली फंसती है, पुन: पानी की सतह पर लौट आते हैं। बाद में तैरते-तैरते ही मछली को ऊपर हवा में उछाल देते हैं फिर नीचे वापस गिरती मछली को बिना किसी विशेष प्रयत्न के सीधे निगल जाते हैं।

इन पक्षियों के अलावा यहां की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि हमारे देश में पाए जाने वाले पक्षियों में सबसे बड़ा पक्षी सारस भी यहां पर अंडे देता है तथा अपने बच्चों को पालता है। तकरीबन 5 फुट ऊंचा यह पक्षी भारतीय संस्कृति में लंबे दांपत्य जीवन का पर्याय माना गया है। जोड़े बनाते समय नर-मादा सारस पक्षियों का नृत्य देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है। नर पक्षी मादा के चारों ओर इठला-इठलाकर हवा में उछलता है तथा फिर अपनी गर्दन को झुका-झुकाकर एक लय एवं ताल से ऐसा सुंदर नृत्य करता है कि देखते ही बनता है। मादा द्वारा नर का प्रणय निवेदन स्वीकार करने के बाद वह भी नृत्य में शामिल हो जाती है। एक बार जोड़ा बन जाने के बाद दोनों पक्षी आयुपर्यंत साथ ही रहते हैं। घना में सारस सामान्यतया अन्य पक्षियों से दूर ही अंडे देते हैं। ये पक्षी किसी पेड़ पर घोंसला बनाकर झील के बीच में उभरे हुए किसी हिस्से में घासफूस के बीच उथले गड्ढे के चारों ओर दो-चार तिनके जमा करके उसी को अपना घोंसला बना लेते हैं। सामान्यतया दो अंडे देने वाले इन पक्षियों में बच्चों को पालने का दायित्व नर व मादा दोनों मिलकर निभाते हैं।

इन सब प्रजननरत पक्षियों हेतु रोजाना सैंकड़ों टन मछलियों एवं अन्य पानी के छोटे जीवों की आवश्यकता पड़ती है। बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार एक वर्ग किलोमीटर में दो से ढाई हजार जांघील के जोड़े अपना घोंसला बनाते हैं जिनको प्रतिदिन 5 टन के लगभग खाद्य पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि 25 हजार से भी ज्यादा प्रजननरत पक्षियों को कितनी बड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थ की आवश्यकता पड़ती है जिसको केवलादेेव की यह झील पूरा करती है।

खग विशेषज्ञों का मानना है कि इतने अधिक पक्षियों द्वारा यहां पर प्रजननरत होने के पीछे पर्यावरणीय संतुलन के अद्भुत सामंजस्य का होना है। विशेषज्ञों का मानना है कि झील के मध्य बबूल के वृक्षों पर घोंसले बनाने से पक्षियों की बीट पानी में गिरती है जो कि एक उत्तम खाद है। इससे झील की वनस्पति बढ़ती है जिसको खाकर पानी के जीव इतनी प्रचुर मात्रा में पलते हैं कि पक्षियों के लिए भोजन की कमी नहीं होने देते।

- नरेंद्र देवांगन

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