उपचारक भी होता है आलिंगन

उपचारक भी होता है आलिंगन

बहुत पुरानी बात है किसी परिचित ने एक तुकबंदी कह लीजिए अथवा शेर कह लीजिए सुनाया था जो इस तरह से है:
ईद के दिन भी गले न मिला,
साले आइंदा में रहेगा गिला।
ये एक मज़ाकिय़ा तुकबंदी है जिसके दो अर्थ निकलते हैं। एक तो ये कि ईद के दिन गले न मिलने पर साले-आइंदा यानी आने वाले पूरे साल अर्थात् अगली ईद तक गिला या शिकायत रहेगी। दूसरे यदि साले-आइंदा को इज़ाफ़त न मानकर साले और आइंदा अलग-अलग पढ़ें तो साले की गाली देकर कहा गया है कि ईद के दिन गले न मिलने पर भविष्य में शिकायत रहेगी।
इसका एक और पहलू भी है जो बहुत महत्त्वपूर्ण है और वो है गले मिलना अथवा आलिंगनबद्ध होना हमारे स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी होता है क्योंकि ये एक उपचारक प्रक्रिया है।
चेंज़ प्रोसेस मॉडल विकसित करने वाली मनोवैज्ञानिक, प्रेरक लेखिका व पारिवारिक चिकित्सक वर्जीनिया सैटिर कहती हैं कि हमें अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए प्रतिदिन चार बार, अपने रख-रखाव के लिए प्रतिदिन आठ बार व अपनी वृद्धि के लिए प्रतिदिन बारह बार आलिंगन करना चाहिए।
इसका सीधा सा अर्थ है कि हम जितनी ज़्यादा बार आलिंगन करते हैं वह हमारे हित में होता है। यही वजह है कि एक मां स्वाभाविक रूप से अपने नन्हे शिशु को दिन में असंख्य बार अपने आलिंगन में लेती और चूमती है।
वास्तव में आलिंगन के दौरान जो आनंदानुभूति होती है उससे हमारी पीयूष ग्रंथि से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन पर्याप्त मात्र में निकलकर हमारे रक्त में मिल जाता है जो शरीर में तनाव उत्पन्न करने वाले दूसरे हार्मोंस के दुष्प्रभाव को निष्क्रिय बना देता है। विभिन्न आधुनिक शोधों से ये भी ज्ञात होता है कि आलिंगन का हमारे हृदय, मस्तिष्क व दूसरे अंगों पर दीर्घकालीन आरोग्यकारी प्रभाव पड़ता है।
प्रतिदिन बीस सेकेंड का आलिंगन व्यक्ति को मानसिक रूप से सक्रिय व चुस्त-दुरुस्त रखने और हृदय की बीमारियों से बचाने में काफ़ी हद तक कारगर होता है। इस प्रकार आलिंगन से हम न केवल तनाव व अन्य व्याधियों से बचे रहते हैं अपितु निरंतर तनावमुक्त व शांत रहने के कारण प्रभावशाली व्यक्तित्व का विकास भी कर पाते हैं।
- सीताराम गुप्ता

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