कितना मेल कराते हैं बेमेल विवाह

कितना मेल कराते हैं बेमेल विवाह

आम पारंपरिक घरों में लड़कियां आज भी बोझ समझी जाती हैं जो जितना जल्दी उतर जाए उतना ही अच्छा समझा जाता है। लड़कियां जहां किशोरावस्था में आई नहीं कि मां-बाप को उनके विवाह की चिंता होने लगती है।
गांवों में इसलिए छोटी उम्र में ही लड़कियां ब्याह दी जाती हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश के छोटे-छोटे गांवों में तो एक खास दिन (आखातीज) हजारों की संख्या में बालक-बालिकाओं का विवाह रचाया जाता है। चूंकि बच्चे नासमझ होते हैं, उनके विवाह में उनकी मर्जी का कोई सवाल ही नहीं होता।
कई बार गांवों में छोटी-छोटी लड़कियां बड़ी उम्र के दुहाजू तक से ब्याह दी जाती थी। कभी किसी बूढ़े बीमार और यहां तक कि मरणासन्न व्यक्ति तक से उनका विवाह अपनी बला टालने के उद्देश्य से कर दिया जाता था।
लड़कियों के प्रति होने वाले इस अत्याचार के विरोध में समाज सुधारकों ने आवाज उठाई और राजा राममोहन राय के प्रयत्नों से समाज में इस विषय को लेकर चेतना जागृत हुई। शारदा एक्ट बना जिससे लड़के-लड़की की शादी की उम्र तय की गई। इससे बाल-विवाह एवं बेमेल विवाह कानूनन अपराध माना जाने लगा जिसके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती थी।
गरीब तबके में बेमेल विवाह आर्थिक कारणों से होता है किंतु धनिक वर्ग के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती लेकिन बेमेल विवाह यहां भी खूब हो रहे हैं। काफी हद तक इसका कारण आज की स्वार्थपरक उपभोक्ता संस्कृति है। मनोवैज्ञानिकों की धारणा है कि स्वेच्छा से अपने से बहुत बड़ी उम्र के पुरूष से विवाह करने वाली लड़कियां उनमें फादर फिगर तलाशती हैं। अक्सर वे टूटे हुए परिवारों की या जहां माता-पिता में कभी बनी न हो, ऐसे घरों से होती हैं। लेकिन एक बहुत ही स्पष्ट कारण है बड़ी उम्र के पुरूषों का पैसा, पावर और वैभव जिससे लड़कियां उनकी ओर आकर्षित होती हैं और जीवन के ऐशो आराम का लुत्फ उठाने उससे जुड़ी सुरक्षा की चाह में उनसे विवाह कर उनकी हर चीज पर अपना आधिपत्य जमा लेती हैं।
नाम देती हैं वे इसे प्यार का। जो प्यार फायदा देखकर सोच समझकर किया जाए वो क्या वास्तव में प्यार होता है? यहां प्यार नहीं सुविधा है, गणित है। इधर इस तरह के बेमेल विवाहों के बहुत से उदाहरण हैं। प्रसिद्ध सितार वादक रविशंकर और सुकन्या के बहुचर्चित विवाह के बाद एन.टी रामाराव और लक्ष्मी पार्वती का विवाह भी एक ऐसा ही बेमेल विवाह हुआ था।
अब यह कहना कि चूंकि हम एक स्वतंत्र देश के वासी हैं, यहां पर हर किसी को अपनी इच्छानुसार जीवनसाथी चुनने का अधिकार है। बूढ़ा हो या जवान, इसमें किसी की दखल क्यूं लेकिन व्यक्ति की आजादी समाज ही सुरक्षित रखता है और यह कार्य वह तभी कर सकता है जब वह स्वयं आजाद हो। कोई भी गलत संदेश देने वाला उदाहरण अनुकरणीय नहीं होना चाहिए।
-उषा जैन 'शीरीं'

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