रक्षाबन्धन विशेष: कर्तव्य का प्रतीक-रक्षा बन्धन

रक्षाबन्धन विशेष: कर्तव्य का प्रतीक-रक्षा बन्धन

तैंतीस करोड़ देवी देवताओं को पूजने वाले हमारे महान धार्मिक देश भारत में त्यौहारों का विशेष महत्त्व है। त्यौहार हमें कुछ समय के लिये अपने भेदभाव को भूलकर प्रेम के रंग में रंग देते हैं। त्यौहारों से हम सभी एकता के सूत्र में आबद्ध होते हैं।

त्यौहार हमारे लोक जीवन का एक इतना जरूरी हिस्सा हैं कि संकट की किसी भी घड़ी में रहने पर भी जनमानस आपने त्यौहारों को नहीं भूल पाता चाहे वह अपनी धरती से कोसों दूर क्यों न हो। अपने देश से सैंकड़ों हजारों मील की दूरी पर रहने वाले लोगों को भी अपने अस्तित्व की याद दिलानेवाला ऐसा ही एक त्यौहार है रक्षा बन्धन।

प्रेम और कर्तव्य के प्रतीक रक्षा बन्धन के इस त्यौहार को श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसे कहीं कहीं श्रावणी, सलोनी या सलूनी भी कहा जाता है। सलूनी का अर्थ है नया वर्ष। इस दिन घर में विविध पकवान बनाये जाते हैं। बन्धु बान्धवों के साथ सावन की पूजा करके भोजन किया जाता है। ब्राह्मण रेशम या सूत की राखी हाथ में बांधते और दक्षिणा लेते हैं।

ऐसी मान्यता है कि श्रावणी पौर्णमासी या संक्रांन्ति तिथि से राखी बन्धन करने से बुरे ग्रह कटते हैं। श्रावण की अधिष्ठात्री देवी द्वारा ग्रहदृष्टि निवारण के लिये महर्षि दुर्वासा ने रक्षा बन्धन का विधान किया। इसी तिथि पर श्री कृष्ण का रक्षा बन्धन अनिष्ट नाश के लिए हुआ था। हमारा इतिहास साक्षी है कि रानी कर्णावती ने हुमायूं को बड़े कठिन क्षणों में राखी भेजी थी और हुमायूं ने उस प्रेम और स्नेह के धागे की मर्यादा रखते हुए रानी कर्णावती की रक्षा के लिये अपनी जान की बाजी लगा दी। कच्चे धागे से बनी इसी राखी के लिये, महाराजा राजसिंह ने रूपनगर की राजकुमारी का उद्धार करने के लिये औरंगजेब के छक्के छुड़ा दिये थे।

रक्षा बन्धन का यह पर्व अनेकों पौराणिक व ऐतिहासिक कथाओं को अपने में समेटे हुए हैं। जुलाई अगस्त के महीने में होने वाला यह त्यौहार, हिन्दी महीनों के हिसाब से श्रावण मास क अंतिम दिन मनाया जाता है। इस दिन भाई बहन सुबह से ही नहा धोकर तैयार होते हैं। बहनें पूजा की थाली सजाती हैं। भाई को टीका करके उस के हाथ में राखी बांधती है और फिर मिठाई खिलाती है। अधिकतर बहनें अपने भाई की आरती भी उतारती हैं। बदले में भाई पूजा की थाली में बहनों के लिये अपनी सामर्थ्य के अनुसार रूपये या कोई उपहार डाल देते हैं।

जब तक भाई को राखी टीका करने का यह कार्यक्र म पूरा नहीं हो जाता, तब तक बहनें कुछ भी खाती पीती नहीं हैं। वे व्रत रखती हैं और अपने भाई को राखी टीका करने के बाद मिठाई खिलाने के पश्चात ही खुद कुछ खाती हैं। रक्षा बन्धन के दिन घरों में खूब अच्छे अच्छे और स्वादिष्ट भोजन भी बनाए जाते हैं, विशेष रूप से कढ़ी चावल और खीर तो अवश्य बनाते हैं क्योंकि इन सब चीजों को शुभ माना जाता है पर इन सभी खाद्य पदार्थों के अलावा इस दिन घर में सेंवई बनाने की प्रथा भी है।

रक्षा बन्धन से कुछ दिन पहले से ही हाट बाजार तरह तरह की रंग बिरंगी राखियों से पट जाते हैं। छोटे-छोटे शहरों में तो राखियों का पूरा का पूरा अस्थाई बाजार ही लग जाता है। हर तरफ बस राखियां ही राखियां या नीली पीली हरी लाल गुलाबी राखियां, बड़ी छोटी राखियां, गोल चौरस, महंगी और सस्ती राखियां, राखियों से सजी धजी इन दुकानों पर रक्षा बन्धन के लिये राखियों की खरीदारी करने वाले लोगों में, छोटी बड़ी लड़कियों और बड़ी बूढ़ो महिलाओं सभी में एक सा उल्लास दिखाई देता है। जैसी रंग बिरंगी और सुन्दर सुन्दर राखियां, वैसे ही रंग बिरंगे और सुन्दर सुन्दर कपड़े पहनने अपने भाइयों के लिये राखियां खरीदती बहनें।

यह हाल राखी के त्यौहार से एक दिन पहले से ही मिठाइयों की दुकान पर भी होता है। मिठाइयों की दुकानें भी इतनी सज संवर जाती है कि उनकी ओर एक नजर देखने से ही मुंह से लार टपकने लगे। गुलाब जामुन, बालूशाही, रसगुल्ले, जलेबी, लड्डू, चमचम, जैसे जैसे देखे जाओ, वैसे वैसे मुंह में मिठास घुलती जाये। डॉक्टर भले ही कहते रहें कि मीठा खाने से कई तरह की बीमारियां होती हैं पर इस दिन तो वह खुद भी मीठा खाये बिना शायद नहीं रह पाते।

कच्चे धागे से बांधा जाने वाला रक्षा का यह इतना अनमोल बंधन है कि सारी दुनियां की दौलत देकर भी इसका मोल नहीं चुकाया जा सकता। जिस भाई की बहन न हो या जिस बहन का भाई न हो, उसके दुख की कल्पना आप सहज ही कर सकते हैं। रक्षा बन्धन के दिन अगर भगवान उनसे कोई वर मांगने को कहे तो वे अपने लिए किसी सुख या ऐशो आराम की जिन्दगी की बजाय बहन अथवा भाई की ही मांग करेंगे ताकि रक्षा बन्धन वाले दिन वह अपने भाई को राखी बांध सकें और यह कह सकें कि भैया मेरे अपनी बहन को न भुलाना, भैया मेरे राखी के बन्धन को निभाना।

- मनीष कुमार तिवारी

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