बाल कथा: बच्चों का बचपन छीन रहे हैं प्लेस्कूल

बाल कथा: बच्चों का बचपन छीन रहे हैं प्लेस्कूल

सच पूछा जाए तो प्लेस्कूल बचपन के खिलाफ साजिश है। बड़े शहरों में ये मशरूम की तरह उगने लगे हैं। प्रतिदिन एक नया प्लेस्कूल अस्तित्व में आ जाता है और हजारों की संख्या में बच्चे उनमें कैद कर दिये जाते हैं, बगैर विचारे कि इससे उन पर कितना गलत प्रभाव पड़ेगा। आगे चलकर उनका व्यक्तित्व कुंठित रहकर संवर नहीं पाएगा। महज सेंट शब्द आगे लगाकर न जाने देश में कितने सेंट पीटर, सेंट मेरी, सेंट रेफिएल, सेंट जीसेस एंड मेरी नाम से स्कूल चल रहे हैं।
इन स्कूलों में एडमिशन आसानी से नहीं होता। अंग्रेजी का ज्ञान, टैस्ट, इंटरव्यू, जनरल नॉलेज जो इन स्कूलों की जरूरतें चलन और डिमांड हैं, प्री स्कूल या प्लेस्कूलों को आबाद रखते हैं। अगर अभिभावकों में इनके खर्च उठाने की कुव्वत है तो बच्चे इन स्कूलों में तब भी एडमिशन पा जाएंगे जबकि उन्हें ठीक से चलना बोलना नहीं आता, बाथरूम, टॉयलेट के लिए इशारा करना नहीं आता।
बाल मनोवैज्ञानिक डॉ रूडॉल्फ कहते हैं कि छोटे बच्चे पर अनावश्यक रूप से लिखने पढऩे के लिए दबाव डालने से उसमें कई मनोविकार उत्पन्न हो सकते हैं।
बच्चे में जोर जबर्दस्ती से डाली गई प्रतियोगिता की भावना उसमें एंक्जाइटी डिस्ऑर्डर तथा उसकी औरों से तुलना करते हुए कमतर बताना उसमें डिप्रेशन डिस्ऑर्डर पैदा कर सकता है। परिणामस्वरूप आगे चलकर वह शराबी या नशे की लत का आदी बन सकता है। इसके विपरीत प्लेस्कूलों के हिमायती यह मानते हैं कि चूंकि बच्चा जन्म के साथ ही सीखना शुरू कर देता है, उसके सीखने पढऩे के लिए उम्र कोई बंधन नहीं होना चाहिए बल्कि शुरू के पांच साल ही उसके सही बर्ताव के लिए सही वक्त है, इसीलिए प्लेस्कूलों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। लॉजिक दरकिनार, आप नैतिकता, इंसानियत, मानवजाति के कल्याण को सर्वोपरि रखते हुए बातों की गहराई में जाकर देखें और जरा सोचें। क्या जीवन सिर्फ संघर्षरत रहने का नाम है ? सुकून, बेफिक्र मौजमस्ती, नेह प्यार का बेलौस आदान प्रदान जीवन में कोई मायने नहीं रखता?
बच्चे की मां पर पूर्ण निर्भरता, मां की बच्चे के लिए नेहमिश्रित चिंता, फिक्र , केयर का जीवन में कोई महत्त्व नहीं? बच्चे का प्लेस्कूल उसकी मां के आंचल से बढ़कर कहां हो सकता है, जहां वह पूर्णत: सुरक्षित पुरसुकून महसूस करता है। इससे उसे जो पुख्ता नींव मिलेगी, उस पर आगे चलकर उसका संपूर्ण जीवन आधारित होगा।
प्लेस्कूल का परायापन, बंधन, अनचाही जिंदगी और जबर्दस्ती थोपा हुआ अनुशासन बचपन के खिलाफ साजिश नहीं तो क्या है। कम से कम आप तो इस साजिश में शामिल न हों।
- उषा जैन 'शीरीं'

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