बुढ़ापे से पहले ही बूढ़ी न हों

बुढ़ापे से पहले ही बूढ़ी न हों

आज समाज के हर क्षेत्र में महिलाओं का आगे आना उनमें तेजी से आते बदलाव का द्योतक है। उसी हिसाब से उनके रहन-सहन, तौर तरीके, बोलचाल, लाइफ स्टाइल में भी बदलाव आया है। उनकी सोच विस्तृत हुई है। समाज व संस्कृति के प्रति उनका दृष्टिकोण बदला है। फैशन के प्रति लगाव, सजने संवरने का शौक, और खाने में कैलोरी कांशियसनेस उनके जीवन के प्रति तीव्रता से जुड़े रहने का सूचक है।
पहले उम्र के इस मोड़ पर उन्हें जीने को लेकर इतना हतोत्साहित किया जाता था कि अच्छी खासी स्वस्थ महिला अपने को कमजोर, बीमार व आकर्षणविहीन समझने पर मजबूर कर दी जाती थी। ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि इसमें नयी पीढ़ी का स्वार्थ था।
बुझने से पहले ही शमां क्यों अपने को बुझा हुआ मान ले', कहती हैं विनीता गुप्ता। उम्र के छठे दशक को छूती वे आज भी अत्यंत गरिमामयी और खूबसूरत लगती हैं। आज भी वे अच्छी धुनों पर अपने को थिरकने से नहीं रोक पाती। दिल को छू लेने वाली उदास गजलें हों या पॉप म्यूजिक का शोर, वे उसी तरह उन पर प्रतिकृत होती हैं। बच्चों से उन्हीं की तोतली भाषा में बोलती, चुटकुलों पर ठहाके लगाकर हंसना जानती हैं। अनुभवों ने उन्हें परिपक्वता दी है। हादसों और मुसीबतों का मुकाबला वे व्यावहारिक होकर करती हैं। कोई उन्हें छिछोरी समझे, यह उसकी अपनी नासमझी है। जीने की कला उन्हें आती है और उनके आलोचकों के लिए उनका तकिया कलाम है टू हैल विद दैम।'
समय के साथ जिसने अपने को ढाल लिया, वह सुखी हो गया। यही प्रकृति का नियम है। महिलाओं में बदलाव आना एक प्राकृतिक, सामाजिक व व्यक्तिगत प्रक्रि या मानी जा सकती है। तद्नुसार उसके हमसफर, दोस्त, साथी, रिश्तेदार इत्यादि पुरूष वर्ग में भी बदलाव आना आवश्यक है। जहां बात लकीर के फकीर बने रहने की जाती है, नतीजा सामने होता है। तलाक की बढ़ती संख्या, किशोरियों का विद्रोही बन घर से भाग जाना और इसी तरह की त्रसद स्थितियों की बढ़ती संख्या।
अब स्त्री को रसोई में पहले की तरह खटने की आवश्यकता नहीं रह गई। आधुनिक उपकरणों ने उसका गृहकार्य काफी आसान और वक्त बचाने वाला कर दिया है। उसके पास समय है जिसे वह कुछ कर गुजरने में लगाना चाहती हैं। नाम शोहरत पैसा केवल पुरूष के ही मिजाज में नहीं है। आज जरूरत है समाज का उनके प्रति नजरिया बदलने की।
इसमें औरतें-युवा औरतें भी शामिल हैं जो औरत ही औरत की दुश्मन है वाली कहावत चरितार्थ करती दिखाई देती हैं। कभी वह बड़ी ननद, कभी सास, बड़ी बहन या मां के रूप में उसे अपनी प्रतिद्वंद्वी नजर आती है अगर वह बहुत सुंदर प्रतिभाशाली और उससे वन अप है।
अब आपको यह सब अच्छा नहीं लगता। मम्मी, कुछ सोबर पहना करो। मेरी फ्रेन्ड्स की मम्मी कैसे रहती हैं। माताजी, ये जो साड़ी आपके लिए लाए हैं उसे मैं ही रख लेती हूं। अब आपको इतनी भारी साड़ी पहन कहां जाना है।'
बहू मेरा सर्कल तुम्हारे सर्कल से बहुत बड़ा है इसलिए स्वाभाविक है कि मुझे बहुत से फंक्शंस में जाना होता है। ये साड़ी जो मेरा बेटा कुछ सोचकर लाया है, मेरे बहुत काम आयेगी।' यह था सास का खुदगर्ज बहू को जवाब।
ये तो हुई पारिवारिक बात। सामाजिक मोर्चे पर महिला सशक्तिकरण वर्ष पर होने वाली तमाम उद्घोषणाएं तभी लागू हो पाएंगी जब समाज की सोच उनके प्रति बदलेगी।
उम्र की सांध्य बेला अपने साथ ढेर सी चुनौतियां लिये आती है जिसे इस पड़ाव पर पहुंची हर महिला को स्वीकारना है।
वह संघर्ष कर रही है। उसे अपनी लड़ाई स्वयं लडऩी है। आप सहायता नहीं कर सकते तो कम से कम विरोधी बनकर उसके लिए एक नई चुनौती तो न बनें।
भीतरी संस्कार, नैतिकता तथा कर्तव्य बोध, जीवन की समझ, अनुभवों से मिला ज्ञान, ये करेंगे प्रौढ़ महिला का मार्गदर्शन। नयी मिली आजादी का दुरूपयोग न हो, यह उसे देखना है। हौसलों को बहकने से बचाते हुए सही दिशा पर चलना है। अच्छे बुरे का ज्ञान होना ही मुख्य बात है। नारी सुलभ गुण समय की तेज आंधी में कहीं उड़ न जाएं क्योंकि इन्हीं पर समाज की नींव है।
अपने को साबुत रखते हुए रिश्तों को निभाना आसान नहीं होगा। दोनों में टकराव अवश्यंभावी है। अब यह उसके विवेक पर है कि उसे कैसे अपनी अस्मिता और रिश्तों में सामंजस्य बनाये रखना है।
- उषा जैन 'शीरीं'

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