गुस्सा कीजिए मगर प्यार से

गुस्सा कीजिए मगर प्यार से

क्रोध या गुस्से को सामान्यत: एक अवगुण के रूप में देखा जाता है और इसके विरोध में तमाम उपदेश दिये जाते हैं। गुस्सा किसे नहीं आता। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कोई कम गुस्सा करता है और कोई आवश्यकता से अधिक।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें गुस्सा आता जरूर है लेकिन वे उसे व्यक्त नहीं करते। ऐसा कभी आदत के कारण है और कभी विवशता के कारण पर यह सत्य है कि हम सभी को कभी न कभी और किसी न किसी बात पर गुस्सा आता है क्योंकि अन्य अनुभूतियों की तरह यह भी एक अनुभूति है।

अक्सर लोग जब अपना क्रोध उस आदमी पर व्यक्त नहीं कर पाते जिस पर वे करना चाहते हैं, तब बेचारी निर्जीव वस्तुएं उस क्रोध का शिकार बनती हैं जैसे लोग प्राय: गुस्से में बर्तन उठा कर फेंकते हैं या पास पड़ा हुआ स्टूल, कुर्सी, कुशन, तकिया आदि।
मनोवैज्ञानिकों का मत है कि क्रोध के आवेग में किसी की चीज़ को उठाकर फेंकने से या मारने से मनुष्य के अंदर की भड़ास निकल जाती है और उसके जल्दी शांत हो जाने की संभावना बढ़ जाती हैं।
इसके विपरीत कुछ लोगों को गुस्सा दबाने की आदत पड़ जाती है और वे अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। गुस्सा दबाना या उसे अभिव्यक्त न करना शुरू में किसी विवशता के कारण होता है जो क्र मश: आदत का रूप ले लेता है। सच तो यह है कि क्रोध की आग बुझती नहीं वरन् अंदर ही अंदर सुलगती रहती है और आग में झुलसते हुए अक्सर युवा लोग भयंकर निराशा का शिकार हो जाते हैं या शराब और नशीली दवाइयों के सेवन के आदी हो जाते हैं। वे प्राय: अपने शरीर को यातना देने में भी नहीं हिचकिचाते।
क्रोध अभिव्यक्त न करने की आदत के लिए अधिकांश रूप से मां बाप उत्तरदायी होते हैं जो बचपन से बच्चों को सिखाते है कि क्रोध करना ठीक नहीं है। गुस्सा दबाने का असर हमारे मस्तिष्क पर पड़ता है। एक शोध के अनुसार गुस्सा दबाने से कैंसर होने की संभावना अधिक रहती है।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें बात बात पर गुस्सा आता है चाहे वे किसी टैफिक जाम में फंस गये हों या फिर लम्बी लाइन में खड़े इंतजार कर रहे हों। वे किसी असुविधा को सहन न कर पाने के कारण चिल्लाते हैं और हमेशा दूसरों पर इल्जाम लगाते हैं। फलत: उनका रक्तचाप बढ़ जाता है जिससे दिल का दौरा अथवा पक्षाघात होने की संभावना बढ़ जाती है।
यह सब देखकर तो लगता है कि हर तरह से ही मुसीबत है। गुस्सा दबायें तो निराशा और जोड़ों के दर्द के मरीज होने का डर और क्रोध व्यक्त करें तो दूसरों को दु:ख दें और दिल की बीमारियों के मरीज हो जाने का भय पर सच यह है कि दोनों ही तरह के लोग अपने गुस्से को गलत दिशा में प्रकट कर रहे हैं। इसका कारण है कि इन लोगों में अपने गुस्से को उस सही समय व्यक्त नहीं किया जब और जहां उन्हें करना चाहिये था।
बहुत पुराने दुख दर्द अथवा रोष से निबटने के लिये कुछ तरीके भी हैं। सबसे पहले अपने सामने एक खाली कुर्सी रखें और कल्पना करें कि उस पर वह आदमी बैठा है जिसके प्रति आपके मन में आक्र ोश है। आप कैसा अनुभव कर रही हैं, यह ध्यान रखें और गुस्सा व्यक्त करते समय ध्यान दें कि आपकी आवाज किस प्रकार बदल रही है। सामने बैठे व्यक्ति से यह न कहें, तुमने मेरे साथ ऐसा किया क्योंकि ऐसा कहने से आप उसे अपने गुस्से के विषय में बता रही हैं न कि अपना गुस्सा प्रकट कर रही हैं। इसके बजाय कहें मैं तुमसे नाराज हूं या मैं तुमसे नफरत करती हूं या मुझे तुम्हारे पर इतना ज्यादा गुस्सा आता है क्योंकि तुमने मेरे साथ ऐसा वैसा किया। गुस्से में आप खड़ी हो जायें और कुर्सी पर घूंसा मारें जैसे आप सचमुच उस व्यक्ति को मार रही हों। आप शीशे के सामने खड़ी होकर बोल सकती हैं या अपना गुस्सा चिटठी में व्यक्त कर सकती
है जिसे आप डाकखाने में नहीं डालेगी।
नकारात्मक भावनाओं को जिस प्रकार अनुभव किया जाता है, यदि उसी रूप में अभिव्यक्त कर दिया जाये तो इसके हानिकारक परिणामों से बचा जा सकता है। पति पत्नी अक्सर एक दूसरे के प्रति अपना रोष प्रकट न करके उसे मन ही मन में छिपाये रखते हैं।
दो वाक्य अवश्य बोलेंगे एक प्रशंसा में और एक बुराई में, उदाहरणत: मैं तुमसे नाराज हूं क्योंकि.......और मैं तुमसे खुश हूं क्योंकि चाहे वह कितनी भी छोटी से छोटी बात क्यों न हो। ऐसा करने से दोनों ही एक दूसरे के प्रति सच्चा प्रेम व विश्वास व्यक्त कर सकेंगे और देखेंगे कि एक दूसरे की गलतियां बताने पर भी उनके संबंधों पर इसका कोई बुरा असर नहीं होता है।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपने बच्चों को यह सिखाना चाहिये कि गुस्सा व्यक्त करना कोई गलत बात नहीं। वे अपनी सच्ची भावनाओं को हमारे सामने व्यक्त कर सकते हैं। यदि वे हमसे नाराज हैं तो इसको छिपाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
यदि वे हमारे ऊपर अपना रोष प्रकट करते रहे हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि ये हमसे नफरत करते हैं। सच तो यह है कि क्रोध भी प्रेम की अभिव्यक्ति का एक तरीका है।
- एम. कृष्णा राव 'राज'

Share it
Top