बाबू जी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना

बाबू जी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना

पहले माना जाता था कि 'प्यार जज्बा है, इबादत है, खुदा है' जिसके सहारे लोग जि़ंदगी काटते थे या इसी की राह में चलते हुए दुनियां से चले जाते थे पर आज के प्रेमियों ने इस प्यार की हदें ताक में रखकर इसे आत्मा के मिलन के बजाय शरीर के मिलन तक सीमित कर दिया है।
युवक-युवतियों के यौवनावस्था में होने वाला यह प्यार उन दोनों में कब और कैसे पनपता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह कोई सुनियोजित और पूर्व से योजना तैयार कर किया जाने वाला कार्य नहीं है। इसकी रीत ही निराली है। कब, कैसे और किससे हो जाए, यह कोई नहीं जानता।
प्रेम का आदर्श ऊंचा होता है, जिसका पालन आज कतिपय लोग ही कर पाते हैं जिसमें पुरूषों की संख्या तो नगण्य है क्योंकि वे प्रेम के लिये आत्मसमर्पण नहीं कर सकते। उसे स्वार्थवश ही महत्त्व देते हैं। नारी की चाहत में जहां समर्पण, अटूट प्यार व त्याग की भावना देखने को मिलती है, वहीं पुरूष के प्यार में उच्छृंखलता का समावेश दिखता है।
पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं का प्यार विश्वसनीय माना जा सकता है किंतु इस प्रेम में हानि भी उन्हें ही उठानी पड़ती है जब उनका प्यार ही उनके जीवन में जहर घोलता है, या प्यार में जब वह असफल हो जाती हैं। लड़कों को इस मामले में गंभीर नहीं देखा जा सकता किंतु लड़कियां भावनाओं, जज्बातों के फलस्वरूप अत्यधिक गंभीर होती हैं, और प्यार की असफलता पर आघात भी उन्हें ही होता है। उनका प्यार निस्संदेह, नि:स्वार्थ माना जा सकता है।
आज के परिवेश में प्यार का अर्थ समझना कठिन है, क्योंकि आज यह 'प्रेम उच्च स्तरीय सोसायटी में फैशन के रूप में, किस्से, कहानी और फिल्मों से प्रेरित होकर स्कूल कॉलेजों के विद्यार्थियों में एक 'टाइमपास' अथवा नादानी में प्रतिस्पर्धा स्वरूप नाटक रूप में परिणित हो चुका है। आज की एडवांस संस्कृति ने इस तरह नए-नए अनुभव दिये हैं। आज जब अपने ही अपनों से दूर कर देते हैं तो कोई गैर कैसे अपना होगा जिसके साथ जीवन काटा जा सके। इस संबंध में जल्दबाजी, हड़बड़ी वाले निर्णय, गड़बड़ी वाले हो सकते हैं।
परिवार में मां-बाप जिनके यहां हमने जन्म लिया, उनके साये में पले, जिनकी गोद में खेलकर बड़े हुये, ऐसे माता-पिता का हम पर पूर्ण अधिकार है। उन्होंने अपने खून से सींच कर एक पौधे को पेड़ के तने के रूप में ला कर खड़ा किया है। ये हमेशा अपेक्षा करते हैं कि उन्हीं की साये में यह तना एक मजबूत विशाल वृक्ष बने, उनकी शाखायें फैलें और फले-फूलें।
माता पिता के बताये रास्ते पर चलना, उनकी खुशी में ही अपनी खुशियां देखना और उनके द्वारा निर्मित आदर्शों का अनुकरण ही सच्चा प्रेम और सच्ची भक्ति हैं। प्यार में कोई अप्रिय कदम उठाते समय जीवन देने वाले मां बाप के प्यार को न भूलें और आज के झूठे प्यार और वासना के बहकावे में न आयें।
- नवीन श्रीवास्तव 'नूतन'

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