लड़कियों को भी दें खुला आसमान

लड़कियों को भी दें खुला आसमान

हमारे संविधान में लड़कियों को समानाधिकार तथा स्वतंत्रता प्रदान किए गए हैं। उन्हें वास्तविक रूप से समान बनाने के लिए तथा समानाधिकार दिलाने के लिये अनेक योजनाएं तैयार की गई हैं। उन्हें स्वतंत्रता तथा समानाधिकार दिये जाने के दावे किये जाते हैं तथा पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है लेकिन क्या वास्तव में वे इन अधिकारों का प्रयोग कर पाती हैं, शायद नहीं। पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना तो दूर, वे स्वयं अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाती हैं जिस कारण कितनी ही मेधावी छात्रएं मानसिक रूप से बीमार हो जाती हैं।
लड़कियों की पढ़ाई पूरी न करने में अभिभावक तथा समाज, दोनों ही समान रूप से दोषी होते हैं। एक तरफ तो हमारे समाज के सभ्य लोग अपने को आधुनिक विचार वाला कहते हैं तथा यह दावा करते हैं कि उनकी नजर में लड़के और लड़कियों में कोई भेद नहीं है लेकिन जब लड़कियों को पढ़ा लिखाकर साक्षर बनाने का मुद्दा सामने आता है, एक गहरी खामोशी छा जाती है।
लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव के कारण ही कितनी ही होनहार लड़कियां कुशाग्र बुद्धि होने के बावजूद भी घर की चारदीवारी में ही अपना जीवन व्यय कर देती हैं या बहुत सी लड़कियां आक्रोश में आकर गलत कदम उठा लेती हैं।
लड़कियां वास्तव में अपनी पढ़ाई लिखाई को लेकर बहुत ही गंभीर होती हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में पास होने वाले छात्रों में लड़कियों का प्रतिशत अधिक होता है। वे प्रति वर्ष लड़कों के मुकाबले अच्छे अंक लेकर पास होती हैं।
हमारे इस पुरूष प्रधान समाज में लाख दिक्कतें रहने के बावजूद भी लड़कियां अपनी पढ़ाई में लगातार रूचि बनाये हुए हैं। घर के घरेलू कार्यों को सम्पन्न करने के बावजूद भी लड़कियां पढ़ाई के क्षेेत्र में अग्रणी ही रहती हैं लेकिन तब भी समाज तथा अभिभावक उनके पढऩे लिखने पर प्रतिबंध लगा देते हैं।
बहुत ही कम अभिभावक ऐसे होते हैं जो अपनी बेटी की पढ़ाई पर सही व्यय करते हैं तथा उसकी पढ़ाई लिखाई पर गर्व महसूस करते हैं।
यदि समाज के लोग अपने को वास्तव में सभ्य बनाना चाहते हैं तो लड़कियों को भी पढ़ाई लिखाई का समान अधिकार दिया जाना चाहिए क्योंकि स्त्री और पुरूष दोनों ही एक गाड़ी के दो पहिये हैं जिस पर यह गाड़ी टिकी होती है और गाड़ी के सही दिशा में चलने के लिए आवश्यक है कि दोनों ही समान गति से आगे बढं़े।
अभिभावकों को भी चाहिए कि वे बेटे तथा बेटियों में भेदभाव को समाप्त कर दोनों को ही आगे बढऩे का मौका तथा समान अवसर प्रदान करें।
-ललिता रोहिला

Share it
Top