नारी ही सताती है नारी को

नारी ही सताती है नारी को

अगर हम अपने घरों के या आस-पास झांकें तो संभवत: ऐसा घर मिले जहां शादी के दो चार-साल बाद सास-बहू-ननद के रिश्ते मधुर हों। ननद के घर से जाने के बाद हालांकि झगड़ों में कमी आती है पर वे समाप्त नहीं होते। सास और बहू दोनों ही अपनी-अपनी जगह से अपने सही होने के तर्क पेश करती हैं और कोई भी झुकने को तैयार नहीं होता। परिणामस्वरूप नारियों का आपसी कलह बराबर घरों में बना रहता है। यहीं नहीं, बरसों बीत जाने पर बहू ही पिछली बातों को याद कर बूढ़ी सास को यातनाएं देती है और ननद को जिंदगी भर भाभी से शिकायत बनी रहती है। अगर भैया पर दोषारोपण करती भी है तो यही कि भाभी के कहने पर ही भैया बदले हैं। बेचारी और करे भी क्या?
कभी कोई पुरूष नारी को निरंतर बरसों तक यंत्रणा नहीं दे सकता चूंकि न तो उसके पास इन सब के लिए, समय होता है और न ही अपनी नापसंदगी व घृणा का इज़हार करने का इतना अधिक धैर्य। अक्सर पुरूष थोड़े से हाय-हल्ले के बाद स्थिति को स्वीकार कर लेता है पर एक नारी अपना पूरा जन्म दूसरी नारी को मानसिक कष्ट देने में खपा डालती है।
कभी वो मां होकर पुत्र-प्रेम में बेटियों का दिल दुखाती है, बहन बनकर दूसरी बहन को दुश्मन मानती है। सास होकर बहू पर ताने मार-मार उसका जीना मुश्किल कर देती है, ननद के रूप में भाभी की स्वतंत्रता का गला घोंटती है और खुद आदर्श बहू बन बूढ़ी सास को कष्टों-बीमारियों में देख-देखकर अपने अहम को संतुष्ट करती है अर्थात नारी ही स्वयं अपनी दुश्मन है।
मैंने अक्सर पाया है कि बहनें, ननद, देवरानी, सास, सहेलियां आदि आपस में और तो और, छोटी-छोटी बातों पर ही कुढ़ती हैं और वाद-विवाद में उलझ जाती हैं जैसे इस पर लाल साड़ी क्यों फबती है? देख, पाउडर कितना लगाया है? सूट इतना महंगा हो नहीं सकता? उन्हें एक-दूसरे से अधिक आकर्षक व सुंदर दिखने में होड़ लगी रहती है। परिणामस्वरूप ईष्र्या-तनाव बढ़ते हैं और इनसे मन मुटाव पैदा होते हैं।
इन सबके पीछे अगर कारणों को तलाश किया जाये तो संभवत: इसके लिए स्वयं नारी ही उत्तरदायी है। बचपन में ही मां उनमें और पुत्रों में अंतर कर लड़कियों के मन में शंकाएं उत्पन्न करती है। उनके बाल मन में अपनी सास के खिलाफ जहर भरती है। कदाचित बड़ी होकर वही बेटी मां की तरह ही अपनी जेठानी-देवरानी और सास के साथ वैसा ही आचरण करती है। अत: जरूरत है कि नारियां अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करें। अपने संकुचित विचारों में विस्तार दें और आपसी सूझबूझ, धैर्य, क्षमा, र्ईष्र्यारहित बने जिनके लिए भारतीय नारी जानी जाती रही है ताकि परस्पर प्रेम-सहयोग का माहौल बन सके और परिवारों में खुशियों और सिर्फ खुशियों की भरमार हो।
- सुशील खरबन्दा

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