तलाक का आघात भुगतती महिलाएं

तलाक का आघात भुगतती महिलाएं

दहेज, पति के घरवालों की अकारण प्रताडऩा, विवाहेत्तर संबंध, मार-पीट, नशाखोरी, यौन एवं अर्थ संबंधी कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिससे वैवाहिक ढांचा चरमराने लगता है। यह समस्या का एक अहम् पहलू है जिससे औरत को प्राय: अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया जाता और तलाक का एक तरफा फैसला उस पर थोप दिया जाता है। ऐसे मामलों में यदि औरतों की तरफ से सहमति मिलती भी है तो अक्सर इस वजह से कि पति या ससुराल वालों की प्रताडऩा के बाद उनके पास कोई और विकल्प नहीं बचता है।
अधिकाश: स्थितियों में स्त्री-पुरूष के अहम का टकराव ही तलाक का कारण बनता है। 'मैं कोई पैर की जूती नहीं हूं जो तुम्हारी धौंस सहूं-पत्नी कहती है। पति कहेगा-तो क्या मैं जोरू का गुलाम हूं? और तब वैवाहिक जीवन की त्रासदियों से निजात पाने के उद्देश्य से दोनों वकीलों की शरण में जाते हैं जहां घावों पर मरहम नहीं लगाया जाता बल्कि उन्हें कुरेदा जाता है। एक-दूसरे के खिलाफ गलतियों व अपराधों की सूची बनायी जाती है। दोनों अपनी स्मरण शक्ति पर जोर दे देकर उसमें वर्षों पुरानी भूली-बिखरी बातें जोड़ते हैं।
अब सवाल उठता है कि क्या सचमुच तलाक वैवाहिक जीवन की समस्याओं का समाधान खोजने में सफल हुआ है? इसने किसे राहत दिलायी है-पति को, पत्नी को या नन्हें मासूमों को? पुरूष प्रधान समाज होने के बावजूद तलाक की त्रासदी पुरूषों के लिए भी कम नहीं है। भारतीय परिवेश में पला पुरूष अपनी अधिकांश दैनिक जरूरतों यथा भोजन, धुले-धुलाये वस्त्र एवं साफ-सफाई के लिए मुख्य रूप से किसी न किसी औरत पर निर्भर करता है। बचपन से जवानी तक यह दायित्व मां या बहन संभालती हैं और विवाह के बाद पत्नी।
कुछ ही दिनों तक गृहस्थ जीवन का रसास्वादन पर लेने के बाद यदि उनके नीड़ के तिनके बिखर जाते हैं तो व्यक्ति एकाकीपन महसूस करने लगता है। तलाक का ज्वर उतरते ही उसे पत्नी और बच्चों का बिछोह सालने लगता है। वैवाहिक जीवन की मधुर स्मृतियां यंत्रणा प्रतीत होने लगती हैं और उसे अपनी कोपल-कल्पित कामनाएं रेगिस्तान की तप्त बालू में झुलसती प्रतीत होती हैं।
सामाजिक संरचना में उच्चतर स्थान पर स्थापित होने के कारण पुरूषों के लिए पुनर्विवाह का मार्ग खुला रहता है। जख्म भरते ही वह अपने बिखरे सपनों को सहेज कर नया घर बसा लेता है पर औरतों के प्रति भारतीय नजरिया बिलकुल अलग है।
जहां खूबसूरत, सुशिक्षित, कुंआरी लड़कियों के लिए योग्य वर ढूंढने में मां-बाप को बहुत एडिय़ां रगडऩी पड़ती हैं, वही तलाकशुदा के लिए अच्छा वर मिलना तो सपने की बात है। तलाकशुदा औरत को पत्नी के रूप में स्वीकारने में विधुर को भी परहेज होता है। यदि संयोग से कोई हाथ थामने के लिए तैयार भी होता है तो वह कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसकी अपनी शादी किसी वजह से नहीं हो पा रही हो।
फिर ऐसे व्यक्ति के साथ विवाह कर वह एक सफल वैवाहिक जीवन बिताने में सफल हो सकेगी-इसकी क्या गारंटी है? महिलाओं के पुनर्विवाह में दूसरी मुख्य अड़चन है न्यायिक प्रक्रिया संपन्न होने में लगने वाली अनावश्यक देरी। औसतन एक मामला निबटाने में पांच से आठ वर्ष का समय निकल जाता है। एक तो मानसिक परेशानियों की वजह से, दूसरे मुकदमेबाजी में जवानी के बहुमूल्य वर्ष गुजर जाने के कारण ज्यादातर लड़कियां पुनर्विवाह होने तक अपना आकर्षण खो चुकी होती हैं।
भारत जैसे पिछड़े और रूढिय़ों में जकड़े देश में तलाक औरत के लिए आर्थिक सजा भी होती है क्योंकि यहां ज्यादातर औरतों की हैसियत परजीवी लता जैसी होती है जिसका अस्तित्व पेड़ से उतरते ही समाप्त हो जाता है। यही वजह है कि तलाक के बाद भी उन्हें अपने गुजारे के लिए पति का मोहताज होना पड़ता है। वह इतना नाकाफी होता है कि महिला खुद को हर दम आर्थिक दबाव में घिरा पाती है। ऐसी महिलाओं के लिए मायका ही एकमात्र सहारा बच जाता है। अंततोगत्वा वहां भी भाई-भावजों के व्यंग्य-बाण तलाकशुदा को एक नये तनाव से भर देते हैं।
तलाकशुदा जिंदगी का सबसे दुखद पहलू है-मानसिक आघात। भावनात्मक संबंधों का लबादा एकाएक उतार फेंकना संभव नहीं है। पुरानी यादों को भुलाने में समय लगता है। जख्म भरने में कई बार तो वर्षों लग जाते हैं। समाज में तिरस्कृत होकर अकेलेपन के एहसास में जीना और बच्चे साथ हों तो उनके मासूम, मगर अजीबोगरीब सवालों से निपटना भी एक विकराल समस्या है।
तलाक की स्थिति में अपने को सबसे ज्यादा असुरक्षित, असहाय और उपेक्षित महसूस करते हैं बच्चे। वे नौनिहाल जिन्हें मां के अपनत्व भरे स्पर्श और पिता की शाबाशी, प्रेेरणा और कदम-कदम पर मार्ग-दर्शन की आवश्यकता पड़ती है, इस क्रूर सजा से मर्माहत हो उठते हैं। उनके बालमन को सबसे अधिक ठेस तब पहुंचती है जब पुनर्विवाह के मार्ग में उन्हें अड़चन मानकर माता-पिता में से कोई भी पक्ष उनके लालन-पालन के लिए तैयार नहीं होता। मजबूरन अदालत इन्हें अनाथालय भेज देती है। निर्दोष, मासूम को मिलने वाली यह सजा कालक्रम में समाज के लिए महंगी साबित होती है।
तलाक वह कड़वी सच्चाई है जिसे कोई नहीं चाहता लेकिन यदि किसी वजह से तलाक हो ही जाये तो तलाकशुदा को हार मान लेने की बजाय अपने को नयी चुनौतियों का सामना करने के लिए दिमागी तौर पर मजबूत बनाना चाहिए।
आत्मनिर्भर बनने का प्रयत्न करना चाहिए। उसे अपने आप को समझाना होगा कि अब उसे इसी तरह जीना है, हर काम अकेले करना है और भविष्य में हर छोटा-बड़ा फैसला खुद ही लेना है।
- नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी

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