अकेलेपन को अलविदा

अकेलेपन को अलविदा

यशोदा पैंसठ वर्ष की विधवा है। इकलौता बेटा रघु शहर में इंजीनियर है। पत्नी लीला और बच्चों के साथ शहर में खरीदे नए मकान में रहता है। लीला एक कार्यालय में कलर्क है।
वैसे तो यशोदा के पति जब तक जीवित थे, उसका जीवन अतीत संतुष्ट रहा। पति के निधन के बाद उसे गांव का घर छोड़ कर बेटे के पास शहर में आकर रहना पड़ा तो उसकी दशा उस मछली की सी हो गई जो जलाशय से बाहर निकाली गई है। सारी पुरानी जड़ें उखड़ गई।
बेटा रघु सुबह नौ बजे दफ्तर के लिए निकल पड़ता तो वह पत्नी और बच्चे को साथ ही अपनी मोटर में ले जाता। बच्चे को स्कूल छोड़ता और पत्नी को उस के कार्यालय में छोड़ देता। शाम को भी तीनों एक साथ लौटते, करीब साढ़े पांच बजे।
तब तक घर में यशोदा अकेली रहती, थोड़ी देर टी. वी. देखती। थोड़ी देर समाचार पत्र या पत्रिकाएं पढ़ती। थोड़ी देर लेट कर सो जाती। चूंकि नगर में पड़ोसियों में वार्तालाप बहुधा नहीं के बराबर होता है इसलिए यशोदा का जैसे दम घुट जाता। कभी बरामदे पर बैठ खिड़की से सड़क की ओर ताकती रहती। आने जाने वाले पथिकों, मोटरों आदि का निरीक्षण करती हुई ऊब मिटाती।
शाम को जब रघु, लीला और बच्चा लौट आते तो वे सीधे ऊपरी मंजिल पर चले जाते। हां, यशोदा को समय-समय पर चाय, नाश्ता, भोजन आदि मिल जाता था। रघु इस का पूरा ध्यान रखता पर अकेलापन उसे बुरी तरह अखरता।
एक दिन पड़ोसी संघ के सचिव और कुछ कार्यकर्ता रघु के घर आए। वार्तालाप से जब उन्हें मालूम हुआ कि यशोदा समाज विज्ञान में एम. ए. उत्तीर्ण हैं और घर में अकेली बैठी सुस्ता रही है तो उन्होंने पूछा आप क्यों नहीं पड़ोसी संघ की समिति में शामिल होती? हमें तो आप की जैसी एक महिला की जरूरत है संयुक्त सचिव के पद पर। दिन में एक दो घंटे का काम है। पड़ोस के घरों में जाना उनसे मिलना, कुशल मंगल पूछना कोई समस्या हो तो उस के संबंध में जानकारी प्राप्त करके समिति की बैठक में प्रस्तुत करना, बाल संगम का संचालन करने में मदद करना, इसमें बच्चों को कहानियां, कविताएं आदि सुनाना आदि।
यशोदा ने पहले संकोचवश असहमति प्रकट की तो भी बेटे और बहू द्वारा प्रोत्साहित किए जाने पर बाद में तैयार हो गई।
अब तो यशोदा पूरा समय पड़ोसी संघ के कार्यों में शारीरिक या मानसिक रूप से लगी रहती है। अकेलेपन को वह अलविदा कह चुकी हैं।
-के. जी. बालकृष्ण पिल्लै

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