औरतें जल्दी क्यों टूट जाती हैं

औरतें जल्दी क्यों टूट जाती हैं

हमारे यहां किसी को शारीरिक रोग हो तो उसे लोगों की सहानुभूति मिल जाएगी लेकिन अगर किसी को मानसिक समस्या हो तो वह केवल हंसी का पात्र बनकर रह जाएगा जब कि यह बात हम अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसी समस्याएं होती हैं।
औरतें चूंकि भावुक प्रकृति की होती हैं अत: वे किसी भी मानसिक आघात को आसानी से झेल नहीं पाती। उनके शीघ्र टूटने के चांस ज्यादा होते हैं बनिस्बत पुरूषों के। शहर की औरतों के साथ समस्याएं भी ज्यादा हैं। वे पढ़ी लिखी, नौकरीपेशा व जागरूक हैं तो इसका खमियाजा उन्हें कई तरह से भुगतना पड़ता है।
औरतों में अवसाद की बीमारी बहुत कॉमन है। वे इस बात को मानकर चलती हैं कि यह एक औरताना बीमारी है और यह भी कि इसमें आखिरी सहारा आंसू बहाना है। महिलायें अक्सर काल्पनिक असफलताओं को सोचकर परेशान रहती हैं। दांपत्य की असफलता, नौकरी से बरखास्तगी का डर, बच्चा पैदा करना, उसे ठीक से पालने की जहमत से लेकर अन्य कई छोटी छोटी रोजमर्रा की बातों से संबंधित हो सकती हैं।
बड़े शहरों में औरत चाहे नौकरीपेशा हो या गृहिणी, हर सूरत में वह ढेरों तनाव लेकर जीती है। लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलाने में अभिभावकों को काफी रूपया खर्चना पड़ता है। इसके बाद स्वाभाविक है कि वे दहेज के लिए पैसा देने की स्थिति में नहीं होते, इसलिये वे चाहते हैं कि लड़की खुद ही अपनी पसंद से बिना दान दहेज के विवाह कर ले।
अगर लड़की किसी लड़के को फंसाने में असमर्थ होती है या कोई लड़का उसके जज्बातों से खेल कर बाद में उसे छोड़ देता है तो उसकी बढ़ती उम्र मां बाप की चिंता का कारण बन जाती है। लड़की अपने को घरवालों पर बोझ समझने लगती है जो वास्तविकता भी होती है।
भाइयों के विवाह होने पर उसकी उपस्थिति गैरजरूरी हो जाती है। ननद भाभी के झगड़े में भाभी की गलती होने पर भी मां बेटी का पक्ष नहीं लेती क्योंकि रहना उसे बहू के ही साथ है। ऐसे में लड़की को अकेलेपन और अनचाहे होने की त्रासद स्थिति घोर अवसाद से भर देती है।
विवाह अन्तिम सत्य भले ही न हो किंतु निस्संदेह एक औरत के लिए जीने की सुगम राह है। विकास की प्रक्रिया में जहां हर तरफ बदलाव आया है वहीं जीवनशैली व नैतिक मूल्य भी बदल गए हैं। अब मध्यवर्गीय व निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में लड़की की कमाई लेना आम बात हो गई है। हालांकि समाज में इसे आज भी बुरा समझा जाता है लेकिन हर बुराई की तरह इसे भी स्वीकार लिया गया है।
इससे लड़की में फ्रस्टे्रशन पैदा होता है क्योंकि हर लड़की की तरह उसके भी पति के साथ सुखी पारिवारिक जीवन बिताने के मन में अरमान होते हैं। अगर वह स्वतंत्र सोच रखते हुए अपना निर्णय स्वयं लेने को क्षमता रखती है तो वह अपनी पसंद से विवाह कर माता-पिता का घर छोड़ देती है और इस तरह संभावित मन की टूटन और बिखराव से बच जाती है।
इसके विपरीत अत्यंत महत्त्वाकांक्षी, कैरियर के प्रति सजग लड़कियां मां बाप द्वारा तय किए गए विवाह को लेकर विद्रोह कर विवाह को टाल न पाने या पूरी तरह इसे नकार देने का साहस न दिखा पाने की स्थिति में गहरे अवसाद में डूब जाती है। अगर कोई लड़की दृढ़ रहकर विवाह को नकार भी देती है तो वह बुढ़ापे में एकाकीपन और अलगाव झेलते हुए टूट और बिखर सकती है।
इसके अलावा भारतीय नारियों में खासकर पुत्र की चाह बलवती होती है और उसके पूरा न होने पर वे असुरक्षा की भावना से भयभीत रहने लगती हैं। यह भय उनके क्षुब्ध व्यवहार के रूप में प्रकट होता है। वे किसी को खुश नहीं रख पाती। पति सहनशील हुआ तो झेल लेता है, न होने की स्थिति में यह औरत के लिए दुष्चक्र बन जाता है।
अक्सर नौकरीपेशा महिलायें बच्चों की देखभाल को लेकर अपराध बोध से ग्रस्त रहती हैं। ये अपराध अक्सर काल्पनिक ही होते हैं क्योंकि कठोर वास्तविकता यह है कि वे दोनों जगह न्याय नहीं कर सकती।
पति की उपेक्षा भी पत्नी को तोड़कर रख देती है। पति का प्यार औरत की सबसे बड़ी शक्ति है। इसी के दम से वह बड़े से बड़ा दुख झेल सकती है। इसके अभाव में वह मुरझाने लगती है। उसके स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। उसमें बीमारियों से लडऩे की शक्ति कम हो सकती है और वह बीमार रहने लगती है। यह बीमारी कभी शारीरिक रूप में या कभी मानसिक रूप में प्रकट होती है।
नौकरीपेशा महिलाओं के साथ जहां कुछ कर पाने का सुखद अनुभव होता है, उन्हें कई कठिन समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। कई बार स्थितियां असहनीय होने लगती हैं। उच्च उपलब्धियों को प्राप्त करने वाली एक नौकरी पेशा महिला के लिए यह अत्यंत दुखद स्थिति होती है कि उसे उसकी योग्यता के लिए कार्यस्थल पर जहां सराहा जाता है, वहीं घर पर उसे घर सुचारू ढंग से न चला पाने के लिए कोसा जाता है जबकि वह जानती है कि यह बात तर्कंसंगत नहीं।
अगर वह नौकरी छोड़कर घर बैठती है तो उसे सारा जीवन एक कांटे सा चुभता है कि उसके पास स्वयं की उपलब्धि के नाम पर कुछ भी नहीं है। नौकरी करते रहने की सूरत में हो सकता है उसका विवाह ही टूट जाए लेकिन तब एक ब्रोकन मैरिज के साथ जुड़ी बदनामी और अकेले रहने की त्रासदी उसकी नियति बन जाती है। यह भी संभव है कि वह नौकरी करती रहे और कार्यस्थल की सराहना और घर पर मिलने वाली कटु आलोचनाओं के बीच पेंडुलम की तरह झूलती रहे, तब तक जब तक एक दिन उसका मेंटल ब्रेकडाउन होने पर उसे लगे कि हर रास्ता बंद हो चुका है।
निराशा से ही आशा का संचार होता है। जीवन में चुनौतियां न हों तो जीवन नीरस हो जाएगा, यही मानकर महिलाएं चलें तो दुश्वारियों का सामना दृढ़तापूर्वक किया जा सकता है। मानव मस्तिष्क में एक इनबिल्ट मेकेनिज्म होता है जो उसकी देखभाल सुचारू ढंग से करता है। यही कारण है कि संसार भर की स्त्रियां आज पागल नहीं हो गई जबकि कारण तो नई सभ्यता के साथ बढ़ते ही जा रहे हैं।
- उषा जैन 'शीरीं'

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