बाजारू दूध न पिलाकर माताएं स्तनपान कराएं

बाजारू दूध न पिलाकर माताएं स्तनपान कराएं

मां का दूध पहले छ: माह में शिशु के लिए सर्वोतम आहार और पेय है। मां का दूध सुपाच्य होता है और उसमें शिशु के पोषण के आवश्यक सभी तत्व होते हैं।
शिशु के जन्म के पश्चात जितना जल्दी हो सके, मां को अपने शिशु को स्तनपान कराना शुरू कर देना चाहिए। हर मां अपने शिशु को स्तनपान करा सकती है। गर्म और शुष्क मौसम में मां का दूध शिशु के पानी की आवश्यकता को पूरा कर देता है। शिशु की प्यास को बुझाने के लिए उसे पानी या किसी अन्य पेय की जरूरत नहीं पड़ती।
ऊपरी दूध के रूप में शिशु को पिलाया जानेवाला गाय का दूध या दूध के पाउडर का घोल मां के दूध की अपेक्षा घटिया और शिशु के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इन दूधों के पीने से बच्चा कई गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाता है जबकि मां के दूध से बच्चे की खांसी, जुकाम, दस्त, तथा अन्य कई बीमारियों से सुरक्षा होती है। यदि शिशु को प्रथम 4-6 महीने केवल मां का दूध पिलाया जाये तो बच्चे के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। मां को जब तक दूध उतरे, बच्चे को स्तनपान कराना चाहिए।
स्तनपान कराते समय शिशु को सही स्थिति में गोद में लेना चाहिए। शिशु को गलत स्थिति में लेकर स्तनपान कराने से स्तनों में पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं उतरता। यदि स्तनपान कराते समय शिशु को सही स्थिति में लिया गया है तो मां की तरफ होता है। मां के चुचुक में दर्द नहीं होता और बच्चा आराम से और खुशी-खुशी स्तनपान करता है।
बोतल से दूध पिलाना शिशु के लिए हानिकारक होता है। कभी-कभी बच्चा गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाता है। बोतल से दिये जानेवाले आहार शिशु को बीमारियों से सुरक्षा प्रदान नहंीं करते। बोतल से दूध पिलाने से बोतल व निप्पल को उबले पानी से धो लेना, आहार बनाने के पानी को खूब उबाल लेना जरूरी होता है अन्यथा बच्चे को दस्त लग सकते हैं। बीमार बच्चा कुपोषण का शिकार हो जाता है। जिन इलाकों में पीने का पानी साफ नहीं होता वहां जन्म से चार-छ: महीनों तक स्तनपान करने वाले बच्चों की तुलना में बोतल से दूध पीनेवाले बच्चे के दस्त से मरने का खतरा कई गुना अधिक होता है।
जो बच्चा किसी कारण से स्तनपान नहीं कर सकता, उसे मां के स्तन से निकाला हुआ दूध चम्मच से पिलाना चाहिए। दूध को पिलाने से पहले चम्मच और पात्र को अच्छी तरह उबाल लेना चाहिए। यदि किसी कारणवश किसी बच्चे को मां का दूध नहीं मिल सके तो उसे किसी अन्य मां का दूध मिल सके तो पिलाना उत्तम होगा।
यदि ऊपरी दूध देना पड़े तो चम्मच से पिलाना चाहिए। पाउडर का दूध बनाना हो तो पानी को उबालकर ठंडा कर लेना चाहिए। यदि गाय या भैंस के दूध को कमरे के तापमान पर रखा जाय तो वह कुछ ही घंटों में खराब हो जाता है जबकि मां का दूध कमरे के तापमान पर कम से कम आठ घंटे तक खराब नहीं होता।
मां का दूध शक्ति और प्रोटीन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। मां को चाहिए कि दूसरे वर्ष में भी या जब तक उसके स्तनों में दूध उतरे, बच्चे को पिलाए। दूसरे वर्ष में भी मां का दूध बच्चे को कई बीमारियों से बचाता है। बच्चा जब घुटनों के बल चलने लगता है तब वह बार-बार बीमार पड़ता है।
इस समय बच्चे को अन्य आहार से अरूचि हो जाती है। ऐसी स्थिति में मां का दूध उसके लिए बहुत लाभदायक होता है। मां को भी अपना धर्म समझकर और बच्चे की सेहत को ध्यान में रखकर स्तनपान करना चाहिए। किसी भ्रम में पड़कर अपने बच्चे को अनुपम उपहार (मां का दूध) से वंचित करना उचित नहीं।
-अर्पिता तालुकदार

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