बहुएं अब सास को दबाने लगी हैं

बहुएं अब सास को दबाने लगी हैं

नई बहू आजकल प्राय: परिपक्व उम्र की व सीखी सिखाई ब्याह कर आती है। कई बार अमीर घर के लड़के को फंसा कर या लव मैरिज कर के अपना उल्लू सीधा कर जब वे ससुराल आती हैं तो उनसे संस्कारशील होने की उम्मीद रखना आज के हिसाब से बेमानी है।
पहले क्या था, सास बहू में झगड़े जरूर होते थे लेकिन बहू को अपनी पोजीशन का अहसास रहता था। वह छोटी है तो छोटी बनकर रहे, यह बात वह नहीं भूलती थी। लड़ाई सत्ता की न होकर दूसरी छोटी मोटी बातों की हुआ करती थी। सास बहू का हर समय का साथ उन्हें एक डोर से बांधे रहता था। बहू सास के बगैऱ घर की कल्पना नहीं कर सकती थी।
समय के बदलाव ने बहू की सोच को नकारात्मकता की ओर मोड़ दिया है जबकि सास उसके प्रति ज्यादा स्नेहिल और संवेदनशील हो गई है। दहेज हत्या की बात छोड़ दें।
परिपक्व बहू सास के आगे झुकना नहीं चाहती। उसे उनके पैर मजबूरी में दिखावे को छूने भी पड़ें तो उसे कोफ्त ही होती है। श्रद्धा का पूर्ण अभाव रहता है यहां। सास डरी रहती है कि बहू का न जाने कैसा रूप देखना पड़े। ज्यादातर पीहरवालों की शह पाकर ही बहू सास से उलझती है। आर्थिक मामलों में वह सास से ज्यादा होशियार हैं। सी.ए., एम.बी.ए., एम.ए.इकोनोमिक्स, एम.एस.सी(मैथ्स), आंकड़ों से खेलने वाली बहू घर की आर्थिक स्थिति को लेकर अनुचित औत्सुक्य दर्शाती है। पैसे की बढ़ती इच्छा आज की नई पीढ़ी की खास पहचान है। बहू भी इसी नई पीढ़ी की है। सास के गहनों और ससुर के बैंक बैलेंस पर उसकी गिद्ध दृष्टि रहती है। कितना भी लड़ाई झगड़ा हो, घर में यहां उसका आत्मसम्मान गायब रहता है।
यह तो हुई समृद्ध सास की बात। अगर सास गरीब है, तब तो वह आंख की किरकिरी बन जाती है, बिल्कुल अनचाही गैरज़रूरी औरत जिसकी उपस्थिति तक बहू को सहन नहीं होती। यहां वह सत्ता का खेल खेले भी तो कैसे। 'मनी इज पावरÓ। बगैर पैसे सास भी सत्ताहीन है।
घर की सत्ता पाने के लिए बहू को अपने में धैर्य तो लाना ही होगा। सत्ता बिन अनुभव के यूं ही नहीं संभाली जाती। चाहे वह कितनी पड़ी लिखी क्यूं न हो, फिर भी सीखने की गुंजाइश तो रहती ही है। घर चला पाना इतना आसान नहीं होता जितना बहू को लगता है। छीनने के बजाय वह सास को स्वयं धीरे-धीरे उसे सत्ता सौंपने दें। यह सास बहू दोनों के हक में ठीक होगा।
सास को भी उदार मन से अपने हक बहू के साथ बांट लेने चाहिए। उसे भी घर की बातों में धीरे-धीरे इन्वॉल्व कर उसकी राय भी जान लेनी चाहिए ताकि उसमें घर के प्रति जिम्मेदारी का अहसास पैदा हो। बेटे के जो काम अब तक उसने किये, अब बहू को करने दें।
सास के लिये तो यह अच्छा ही है। उसे अब आराम की जरूरत भी है। इसे कुदरत का नियम समझ वह बेटे की जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है। 'ओल्ड ऑर्डर चेंजेथ यील्डिंग प्लेस टू न्यू'। टेनीसन की यह उक्ति ध्यान में रखते हुए यह घर के शासन में बदलाव के लिए तैयार रहें।
- उषा जैन 'शीरीं'

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