संस्कृति एवं इतिहास के आइने में साड़ी

संस्कृति एवं इतिहास के आइने में साड़ी

भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के साथ साड़ी का अटूट रिश्ता है। आज इसी परिप्रेक्ष्य में साड़ी हमारी समृद्ध परम्परा का प्रतीक बन गयी है। वेदों तथा पुराणों तक में इसका विभिन्न नामों से उल्लेख मिलता है। वस्तुत: नारी और साड़ी एक दूसरे के पर्याय बन गये हैं तथा साड़ी को ही प्राय: सर्वाधिक सुसंस्कृत तथा शालीन पहनावा माना जाता है।
मानव जीवन के उद्गम काल में उसे वस्त्र की आवश्यकता कैसे हुई, यह अनुसंधानकर्ताओं के लिए शोध का विषय है परन्तु संभवत: लज्जा तथा शील के साथ साथ प्राकृतिक परिवर्तनों में शरीर को सामान्य बनाये रखने के लिए वस्त्रों की आवश्यकता महसूस की गई होगी।
प्रारंभ में हमें मानव द्वारा वृक्षों की छाल के प्रयोग का उल्लेख इतिहास में मिलता है। गुफाओं पर बने भांति-भांति के चित्रों में भी मानव शरीर को विविध माध्यमों से आवृत करने के प्रमाण मिलते हैं। नारी शरीर की बनावट पुरूष से भिन्न है तथा कई कारणों से उसे स्वयं को शील की सीमा में आबद्ध रखने के लिए तथा अपनी कोमलता और सौन्दर्य को अधिक आकर्षक तथा सौम्य बनाने के लिए अपेक्षाकृत अधिक वस्त्रों की आवश्यकता पड़ती है।
संभवत: इसी आवश्यकता तथा शारीरिक बनावट को दृष्टिगत रखते हुए साड़ी का प्रादुर्भाव हुआ होगा। वैसे विश्व के विविध देशों में तथा भारत के ही अनेक प्रांतों में अन्य कई परिधान प्राचीन काल से ही प्रचलित हैं परन्तु साड़ी में एक विशेषता है जो उसकी पौराणिकता का आभास दिलाती है।
हम गौर करें तो दो चार मूलभूत बातें काफी रोचक हैं। एक तो यह साड़ी की बनावट नहीं है अर्थात सिवाय साढ़े पांच छ: मीटर लम्बे कपड़े के टुकड़े के साड़ी में सिलाई कटाई का झंझट नहीं है। दूसरे साड़ी ही एक ऐसा परिधान है जो अपने साथ किसी पूरक वस्त्र की मांग नहीं करता भले ही आज साड़ी के साथ विविध अंतर्वस्त्र तथा ब्लाउज का प्रचलन है।
इसका एक उदाहरण हमें आज भी इसकी प्राचीनता और संस्कृति के साथ जुड़ाव का द्योतक दिखता है। हमें आज भी अपने छोटा नागपुर क्षेत्र में ही अनेक आदिवासी महिलाएं मात्र एक साड़ी लपेटे दिख जाती हैं। साड़ी की खासियत देखिये कि इसमें और धोती में फर्क न होने पर पहनने के तरीके से ही साड़ी साड़ी है और धोती धोती।
समय के साथ साथ भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य शैली का प्रभाव पड़ा और पूर्व में भी मुगल आदि विविध सभ्यताओं के सभी दौरों से गुजरते हुए आज भी साड़ी अपने उसी आकार में अपनी पहचान बनाये हुए है। हमारे देश की भौगोलिक स्थिति से इसकी समवयता भी इसका कारण है।
इन परिवर्तनों के काल में कई पीढिय़ों ने साड़ी के स्थान पर कुर्ता, कमीज सलवार, लहंगा, घाघरा आदि का प्रयोग किया जो कि आज भी हमारे देश की बहुरंगी परम्परा के अंग हैं। इतना ही नहीं, पाश्चात्य प्रभाव के कारण नारी के शरीर से उतरी साड़ी का स्थान जींस, स्कर्ट तथा मिडी और शर्ट आदि ने ले लिया। यह पाश्चात्य परिधान हमें आज राह चलती आधुनिकाओं के शरीर पर दिखते हैं परन्तु एक बात तो सत्य है कि जो शालीनता और सौम्यता साड़ी धारी नारी में है, वह इनमें नहीं होती।
फैशन के नाम पर अंधी दौड़ हमारी समृद्धि से परिपूर्ण संस्कृति के हृास का परिचायक है। कई युवतियां साड़ी का त्याग देखा देखी करती हैं परन्तु उन्हें भी आभास रहता जरूर है कि साड़ी हमारे पारिवारिक परिस्थितियों के जितना करीब और माकूल है, उतना अन्य वस्त्र या परिधान नहीं।
साड़ी आज भारत और भारतीय की सीमा लांघकर ब्रिटेन और अमेरिका की सड़कों पर दिख रही है। देश में विविध गुणवता और आकर्षण वाली 200 रूपये से लेकर तीस हजार रूपये तक की साडिय़ां बाजारों में उपलब्ध हैं जो हमारे लिए गर्म की बात है।
साड़ी उद्योग में अनेक बदलाव आये हैं और नारी की पसंद भी विविधता लिए हुए है। आज बाजार में सूती, सिल्क, कोटा, रूबिया, रेशमी, खादी, बनारसी, शिफान, जार्जेट, कोटा सिल्क, तांत सिल्क, टाई एंड डाई, हैण्डलूम तथा अन्य कई किस्मों की साडिय़ां मौजूद हैं जिन्हें पहनकर नारी का रूप उसकी सौम्यता और निखर जाती है।
पुरूष को लुभाने की नारी जाति की पुरातन मानसिकता में भी साड़ी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। वस्तुत: विविध आयामों से गुजरकर साड़ी आज भी अपने मूल रूप में विद्यमान है और हमारी परिधान परंपरा का अभिन्न अंग है।
-अरूण कुमार पाण्डेय

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